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बुधवार, अगस्त 05, 2026

कानून नहीं, जागरूक समाज ही बचाएगा बचपन; पॉक्सो के बढ़ते मामलों के बीच संविधान, न्यायपालिका और समाज की साझा जिम्मेदारी - अधिवक्ता डी.पी. जोशी



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कानून नहीं, जागरूक समाज ही बचाएगा बचपन; पॉक्सो के बढ़ते मामलों के बीच संविधान, न्यायपालिका और समाज की साझा जिम्मेदारी - अधिवक्ता डी.पी. जोशी
It is an aware society, not just the law, that will safeguard childhood; amidst rising POCSO cases, the Constitution, the judiciary, and society share a collective responsibility – Advocate D.P. Joshi.

एक नज़र में
* बच्चों की सुरक्षा केवल कठोर कानूनों से नहीं, बल्कि जागरूक परिवार, उत्तरदायी समाज और संवेदनशील संस्थाओं से सुनिश्चित होगी।
* भारतीय संविधान, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) तथा पॉक्सो अधिनियम प्रत्येक बच्चे को गरिमा, सुरक्षा और भयमुक्त बचपन का अधिकार प्रदान करते हैं।
* सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पॉक्सो कानून का मूल उद्देश्य बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) की रक्षा करते हुए पीड़ित-अनुकूल न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
* डिजिटल युग में साइबर ग्रूमिंग, ऑनलाइन शोषण और सोशल मीडिया बच्चों की सुरक्षा के लिए नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं।
* परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया, पुलिस और न्यायपालिका की साझी जिम्मेदारी से ही सुरक्षित बचपन और सशक्त भारत का निर्माण संभव है।

देश में बालकों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) अर्थात पॉक्सो कानून के अंतर्गत दर्ज मामलों की बढ़ती संख्या स्वाभाविक रूप से चिंता उत्पन्न करती है। किंतु इस वृद्धि को केवल अपराधों की बढ़ोतरी के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि जिन घटनाओं पर कभी सामाजिक भय, पारिवारिक दबाव और बदनामी के कारण पर्दा डाल दिया जाता था, वे अब कानून और समाज की बढ़ती जागरूकता के कारण सामने आने लगी हैं। यह परिवर्तन इस दृष्टि से सकारात्मक है कि अब पीड़ितों को न्याय पाने का साहस मिल रहा है। फिर भी यह स्थिति हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि क्या केवल कठोर कानून बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।

भारत का संविधान बच्चों की गरिमा और सुरक्षा को सर्वोच्च संवैधानिक मूल्यों में स्थान देता है। अनुच्छेद 15(3) राज्य को बच्चों के हित में विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक विकास को भी शामिल किया गया है। अनुच्छेद 21ए शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 39(e) एवं 39(f) बच्चों के शोषण की रोकथाम और उनके स्वस्थ विकास का दायित्व राज्य पर डालते हैं। अनुच्छेद 45 तथा अनुच्छेद 51A(k) भी बच्चों के समुचित पालन-पोषण और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं।

भारत संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) का पक्षकार है। इसके अनुच्छेद 3 के अनुसार प्रत्येक निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि होगा। अनुच्छेद 19 बच्चों को सभी प्रकार की हिंसा और दुर्व्यवहार से सुरक्षा प्रदान करने तथा अनुच्छेद 34 उन्हें यौन शोषण से बचाने का दायित्व राज्यों पर निर्धारित करता है। इस प्रकार पॉक्सो अधिनियम केवल एक दंड कानून नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का प्रभावी क्रियान्वयन है।

सर्वोच्च न्यायालय ने Sakshi v. Union of India (2004) में बाल यौन शोषण के मामलों में पीड़ित-अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि न्यायालय स्वयं बच्चे के लिए मानसिक आघात का कारण न बने। Alakh Alok Srivastava v. Union of India (2018) में न्यायालय ने राज्यों को पॉक्सो मामलों की त्वरित जांच, शीघ्र सुनवाई तथा विशेष न्यायालयों की प्रभावी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इन निर्णयों से स्पष्ट है कि बच्चों की गरिमा, गोपनीयता और मानसिक सुरक्षा न्याय प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं।

विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी यह प्रतिपादित किया है कि पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को अधिकतम संरक्षण प्रदान करना है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले की निष्पक्ष, वैज्ञानिक और संवेदनशील जांच आवश्यक है। किसी भी शिकायत को हल्के में लेना उतना ही अनुचित है, जितना बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि पीड़ित को संरक्षण मिले और प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त रहे।

आज बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में डिजिटल संसार भी शामिल हो चुका है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और इंटरनेट ने अवसरों के साथ अनेक खतरे भी उत्पन्न किए हैं। साइबर ग्रूमिंग, फर्जी पहचान, ऑनलाइन ब्लैकमेल, अश्लील सामग्री तथा डिजिटल शोषण जैसी घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इसलिए डिजिटल सुरक्षा अब केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि बाल संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।

किशोरावस्था जीवन का अत्यंत संवेदनशील दौर है। इस अवस्था में भावनात्मक परिवर्तन स्वाभाविक हैं, किंतु कानून बच्चों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है। इसलिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में जीवन कौशल, लैंगिक संवेदनशीलता, साइबर सुरक्षा, सम्मानजनक व्यवहार और कानूनी साक्षरता पर नियमित प्रशिक्षण आवश्यक है। बच्चों को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि किसी भी अनुचित व्यवहार की सूचना देना साहस, आत्मसम्मान और आत्मरक्षा का परिचायक है।

परिवार इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि माता-पिता बच्चों के साथ खुलकर संवाद करें, उनकी भावनाओं को समझें और ऐसा वातावरण निर्मित करें जहाँ बच्चा बिना भय के अपनी बात कह सके, तो अनेक संभावित अपराध प्रारंभिक स्तर पर ही रोके जा सकते हैं। केवल नियंत्रण पर्याप्त नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और सतत मार्गदर्शन ही वास्तविक सुरक्षा का आधार हैं।

समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस, न्यायालय या सरकार का दायित्व नहीं है। शिक्षक, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया, स्थानीय समुदाय और प्रत्येक नागरिक इस उत्तरदायित्व में समान भागीदार हैं। जन-जागरूकता अभियान, कानूनी साक्षरता, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण तथा विद्यालय आधारित बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

पॉक्सो जैसे संवेदनशील विषय पर समाज को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। प्रत्येक शिकायत का गंभीरता, संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ परीक्षण होना चाहिए। पीड़ित की गरिमा और गोपनीयता की रक्षा हो, वहीं विधिसम्मत प्रक्रिया और निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का भी पूर्ण पालन हो। यही संवैधानिक शासन और न्याय व्यवस्था की पहचान है।

अंततः, किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के सुरक्षित वर्तमान में निहित होता है। पॉक्सो कानून की वास्तविक सफलता केवल दर्ज मामलों, दोषसिद्धि की दर या न्यायालयों के निर्णयों से नहीं मापी जाएगी, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि हम अपने बच्चों को कितना सुरक्षित, जागरूक, आत्मविश्वासी और सम्मानपूर्ण वातावरण उपलब्ध करा सके। संविधान, न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय दायित्व हमें एक ही संदेश देते हैं—सुरक्षित बचपन कोई विकल्प नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है। कानून आवश्यक है, परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है एक जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज। जब समाज स्वयं बच्चों की सुरक्षा का प्रहरी बनेगा, तभी सुरक्षित बचपन और सशक्त भारत का सपना वास्तविकता में बदल सकेगा।

— अधिवक्ता डी.पी. जोशी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो.: 9893354327

शुक्रवार, जुलाई 31, 2026

सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी

सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी
The Right to Information will be meaningful only when there is accountability for false and misleading information: Advocate D.P. Joshi

#एक नज़र में
• लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना देना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की भावना के विपरीत है।
• सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के अंतर्गत दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
• धारा 20(2) के तहत सूचना आयोग संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।
• प्रत्येक गलत सूचना दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है जब यह सिद्ध हो कि सूचना जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण अथवा अभिलेखों के विपरीत दी गई है।
• रिकॉर्ड छिपाना, सूचना नष्ट करना या जानबूझकर गुमराह करना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
• पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही सूचना है, जबकि भ्रामक सूचना लोकतंत्र और विधि के शासन पर जनता के विश्वास को कमजोर करती है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है जिसने शासन को जनता के प्रति अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जवाबदेह बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम केवल सूचना प्राप्त करने का कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है। नागरिकों को सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक कार्यवाही तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के अभिलेखों तक वैधानिक पहुँच प्रदान करना इसका मूल उद्देश्य है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब सरकार के कार्य जनता की निगरानी के दायरे में हों और जनता को सही एवं प्रमाणिक जानकारी समय पर प्राप्त हो।

इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer – PIO) होता है। उसकी जिम्मेदारी केवल सूचना भेज देना नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सही, पूर्ण, प्रमाणिक और समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर गलत, अपूर्ण अथवा भ्रामक सूचना देता है, रिकॉर्ड के विपरीत उत्तर देता है, सूचना छिपाता है या सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करता है, तो वह केवल एक नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को भी आघात पहुँचाता है।

इसी उद्देश्य से अधिनियम की धारा 20 में दंडात्मक व्यवस्था की गई है। यदि केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग यह पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार किया, निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई, जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना दी, सूचना नष्ट कर दी अथवा सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न की, तो आयोग उस अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 20(2) के अंतर्गत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।

हालाँकि, कानून का उद्देश्य प्रत्येक त्रुटि पर दंड देना नहीं है। न्याय का मूल सिद्धांत है कि दंड तभी लगाया जाए जब यह प्रमाणित हो कि अधिकारी ने दुर्भावना से कार्य किया, उपलब्ध अभिलेखों के विपरीत उत्तर दिया या जानबूझकर सत्य तथ्यों को छिपाया। इसलिए प्रत्येक मामले में सूचना आयोग तथ्यों, अभिलेखों और परिस्थितियों का स्वतंत्र परीक्षण करता है।

भारतीय न्यायपालिका ने भी सूचना के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना है। सर्वोच्च न्यायालय ने State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (1975) में स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनता को शासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि सरकार अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी है। इसी प्रकार S.P. Gupta v. Union of India (1981) में न्यायालय ने कहा कि खुलापन (Openness) लोकतांत्रिक शासन का अनिवार्य तत्व है और गोपनीयता अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।

बाद में CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना है, किन्तु इसका प्रयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक व्यवस्था अनावश्यक रूप से बाधित हो जाए। यह निर्णय नागरिकों के अधिकार और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इसी प्रकार Manohar v. State of Maharashtra (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सूचना आयोगों को अधिनियम के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए तथा जहाँ आवश्यक हो, वहाँ दंडात्मक प्रावधानों का उपयोग भी करना चाहिए। यह निर्णय इस सिद्धांत को बल देता है कि सूचना का अधिकार तभी प्रभावी होगा जब उसके उल्लंघन पर उत्तरदायित्व भी तय किया जाए।

आज अनेक मामलों में देखा जाता है कि सूचना मांगने वाले नागरिकों को गोलमोल, अधूरी या विषय से असंबंधित जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद "सूचना उपलब्ध नहीं है" कह दिया जाता है या ऐसे उत्तर दिए जाते हैं जिनसे वास्तविक तथ्य छिप जाएँ। ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं करतीं, बल्कि पूरे सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। यदि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह जाएगा।

दूसरी ओर, नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सूचना का अधिकार प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनहित और पारदर्शिता का संवैधानिक साधन है। यदि उन्हें प्राप्त सूचना गलत या भ्रामक प्रतीत होती है, तो उन्हें अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर प्रथम अपील, द्वितीय अपील अथवा सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए। प्रमाण-आधारित आपत्ति ही न्यायिक और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक प्रभावी होती है।

आज आवश्यकता केवल सूचना उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सही सूचना उपलब्ध कराने की है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच विश्वास का आधार सत्य, प्रमाणिक और पारदर्शी सूचना होती है। इसलिए ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोक सूचना अधिकारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के प्रावधानों का निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यही सुशासन की पहचान, लोकतंत्र की मजबूती और विधि के शासन का वास्तविक सम्मान है।

अधिवक्ता डी.पी. जोशी
एल.एल.बी., एल.एल.एम. (क्रिमिनल लॉ)
मोबाइल नंबर : 9893354327

गुरुवार, जुलाई 23, 2026

क्या है आपका अधिकार ? जानें क्या कहता है "भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क)"


क्या है आपका अधिकार ? जानें क्या कहता है "भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क)"

# लोकतंत्र की आत्मा : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार
{आलेख : एच.पी. जोशी}

What are your rights? Find out what "Article 19(1)(a) of the Indian Constitution" says.
भारतीय संविधान विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक संविधानों में से एक माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल शासन की संरचना निर्धारित नहीं करता, बल्कि प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता, गरिमा और मौलिक अधिकारों का भी संरक्षण करता है। संविधान के भाग-III में वर्णित मूल अधिकार व्यक्ति और राज्य के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं तथा यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की शक्तियाँ नागरिकों की स्वतंत्रता का अनुचित हनन न कर सकें।

इन्हीं मूल अधिकारों में अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार केवल बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लिखने, प्रकाशित करने, विचार व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सूचना के आदान-प्रदान, कला, साहित्य, पत्रकारिता तथा अन्य शांतिपूर्ण माध्यमों से अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितनी निर्भीकता से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों द्वारा इस अधिकार की संवैधानिक महत्ता को स्पष्ट किया है।

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स समिति, पश्चिम बंगाल के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि भारतीय संविधान के भाग तीन द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार नैसर्गिक अधिकार है और उसे किसी संवैधानिक संशोधन या अन्य अधिनियम के तहत समाप्त नहीं किया जा सकता है।

भाग 3 में दिए गए अधिकार राज्य की शक्ति के विरोध गारंटी है, न कि सामान्य व्यक्तियों के अवैध कृत्यों के विरुद्ध।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि "अनुच्छेद 19(1)(क)" में प्रदत्त अधिकारों को अब केवल देश पर युद्ध या बाह्य आक्रमण के कारण देश की सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न होने की दशा में ही निलंबित किया जा सकता है। "सशस्त्र विद्रोह" के आधार पर मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।

इसी प्रकार ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक के मामले में उच्चतम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह अभिनिर्धारित किया है कि न्यायालय ऐसे आदेश या निर्देश नहीं दे सकता है जो नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) प्रत्येक नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने का अधिकार प्रदान करता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में यह अधिकार नागरिकों को अपने विचार सामूहिक रूप से रखने, जनमत निर्माण करने तथा संविधान सम्मत तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार लोकतंत्र के दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर उत्तरदायी शासन व्यवस्था आधारित रहती है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अनुच्छेद 19(1)(क) द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसावे जैसे आधारों पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्र चेतना, तर्कशीलता, असहमति को सम्मान देने की संस्कृति तथा शासन की उत्तरदायित्वपूर्ण समीक्षा में निहित होती है। जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बनकर रह जाता है।

मेरा विश्वास है कि जिस प्रकार धर्म केवल उच्च आदर्शों, मानवीय मूल्यों और कर्तव्यों से नहीं वरन् तर्क और विज्ञान की कसौटियों पर खरा उतरने से महान होता है ठीक उसी प्रकार से कोई देश कितना महान है ये इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिकों को सरकार के विरुद्ध कितना अधिक कारगर तरीके से बोलने और अभिव्यक्ति रखने की आजादी मिलती है। यदि किसी राष्ट्र में नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी; शांतिपूर्ण और बिना हथियार सम्मेलन का अधिकार; शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार; और गरिमामय जीवन जीने का अधिकार प्राप्त नहीं है तो ये प्रमाणित है कि वो राष्ट्र वास्तव में राजतंत्र है और वहां के नागरिक गुलाम।

भारतीय संविधान का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, समान अवसर और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सके। संविधान की यही भावना भारत को एक सशक्त, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाती है।

"जब तक नागरिक निर्भय होकर सत्य बोल सकते हैं, तब तक लोकतंत्र जीवित रहता है; और जब सत्य बोलना अपराध बन जाए, तब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।"

(H.P. Joshi)
लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी
श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी मानव अधिकारों के जानकार और "मानव अधिकार के अनछुए पहलू" के लेखक हैं।

मंगलवार, जुलाई 21, 2026

बरसात : जीवनदायिनी या बीमारियों और मौत का सौदागर ?


बरसात : जीवनदायिनी 'या' बीमारियों और मौत का सौदागर ?
@जानें बरसात में स्वस्थ और निरोगी रहने के उपाय
लेखक : एच.पी. जोशी

भारत में बरसात केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। जैसे ही काले बादल आसमान में छाते हैं और पहली वर्षा की बूंदें धरती को स्पर्श करती हैं, वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। सूखी धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, खेतों में नई उम्मीदें अंकुरित होती हैं, नदियाँ और तालाब जीवन से भर उठते हैं तथा पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक सभी वर्षा का स्वागत करते हैं। भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था, जैव विविधता और पेयजल का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में वर्षा को सदैव जीवनदायिनी, समृद्धि की दूत और प्रकृति का अमूल्य उपहार माना गया है। किन्तु प्रकृति का यही वरदान यदि लापरवाही, गंदगी और वैज्ञानिक जागरूकता की कमी के साथ जुड़ जाए, तो यही मौसम अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। कहीं डेंगू और मलेरिया के रोगी भर्ती होते हैं, कहीं टाइफाइड, हैजा और डायरिया के मामले सामने आते हैं, तो कहीं वायरल बुखार, निमोनिया और त्वचा संक्रमण लोगों को परेशान करने लगते हैं। अनेक परिवारों में यह मौसम खुशियाँ लेकर आता है, तो कई परिवारों के लिए चिंता, आर्थिक बोझ और कभी-कभी अपूरणीय क्षति का कारण भी बन जाता है। हर वर्ष लाखों लोग मानसून से जुड़ी बीमारियों से प्रभावित होते हैं। इनमें सबसे अधिक जोखिम छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों तथा पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को होता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि समस्या स्वयं वर्षा नहीं, बल्कि वर्षा के बाद बनने वाली परिस्थितियाँ हैं।

# क्या वास्तव में बारिश बीमारियाँ फैलाती है ?
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या बारिश होने से लोग बीमार पड़ते हैं? विज्ञान इसका उत्तर स्पष्ट रूप से "नहीं" देता है। क्योंकि वर्षा स्वयं किसी रोग का कारण नहीं होती। बीमारी तब फैलती है जब वर्षा के कारण वातावरण में ऐसे परिवर्तन होते हैं जो बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद, परजीवी और रोग फैलाने वाले मच्छरों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कर देते हैं। मानसून के दौरान वायु में आर्द्रता बढ़ जाती है, तापमान में परिवर्तन होता है, अनेक स्थानों पर जलभराव हो जाता है, नालियाँ उफनने लगती हैं, सीवर का पानी पेयजल स्रोतों में मिल सकता है और भोजन अपेक्षाकृत जल्दी खराब होने लगता है। यही परिस्थितियाँ संक्रामक रोगों के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) तथा भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय प्रत्येक वर्ष मानसून के दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह देता है, क्योंकि यह मौसम जलजनित, मच्छरजनित और भोजनजनित रोगों के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है

# जानें क्या है वर्षा और सूक्ष्मजीवों का विज्ञान ?
हमारे चारों ओर लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं। इनमें बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद और परजीवी शामिल हैं। सामान्य परिस्थितियों में इनमें से अनेक सूक्ष्मजीव लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते, लेकिन नमी और मध्यम तापमान इनके विकास के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करते हैं। बारिश के बाद वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया और फफूंद तेजी से बढ़ते हैं। कई प्रकार के वायरस भी अधिक समय तक सक्रिय बने रहते हैं। दूषित जल में मौजूद रोगजनक जीवाणु भोजन और पेयजल के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यही कारण है कि मानसून में डायरिया, हैजा, टाइफाइड, पीलिया, फूड पॉइजनिंग और अन्य जलजनित रोगों की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

# जानें कैसे बढ़ता है मच्छरों का साम्राज्य ?
यदि मानसून में इंसानों और जानवरों सबसे बड़ा दुश्मन किसी एक जीव को कहा जाए, तो वह मच्छर है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार केवल पाँच से सात दिन तक जमा रहने वाला पानी मच्छरों के हजारों लार्वा विकसित करने के लिए पर्याप्त होता है। डेंगू फैलाने वाला एडीज एजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर साफ और रुके हुए पानी में पनपता है। इसके विपरीत मलेरिया फैलाने वाला एनोफिलीज (Anopheles) मच्छर विभिन्न प्रकार के जलस्रोतों में विकसित हो सकता है। चिकनगुनिया भी मुख्यतः एडीज मच्छर के माध्यम से फैलता है। कूलर, पानी की टंकियाँ, गमलों की तश्तरियाँ, पुराने टायर, टूटे बर्तन, नारियल के खोल और छत पर जमा पानी मच्छरों के सबसे सुरक्षित प्रजनन स्थल बन जाते हैं।

@ क्या आप जानते हैं?
* डेंगू फैलाने वाला मच्छर सामान्यतः दिन में अधिक सक्रिय रहता है।
* केवल एक चम्मच जितना रुका हुआ पानी भी मच्छरों के अंडे देने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
* घर के भीतर जमा साफ पानी भी डेंगू का बड़ा कारण बन सकता है।

# जानें सबसे अधिक खतरा किसे ?
बरसात का मौसम सभी के लिए समान रूप से जोखिमपूर्ण नहीं होता। कुछ वर्गों में संक्रमण की संभावना और जटिलताएँ अधिक होती हैं।
@ बच्चे : बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती। वे स्कूल, खेल और सामूहिक गतिविधियों के कारण जल्दी संक्रमण की चपेट में आते हैं। डायरिया, वायरल बुखार, डेंगू और निमोनिया उनके लिए गंभीर रूप ले सकते हैं।
@ गर्भवती महिलाएँ : गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई जैविक परिवर्तन होते हैं। संक्रमण होने पर माँ और गर्भस्थ शिशु दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को दूषित भोजन, संक्रमित पानी और मच्छरों से विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
@ बुजुर्ग : बढ़ती उम्र के साथ प्रतिरक्षा क्षमता कम होने लगती है। यदि मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, अस्थमा या गुर्दे की बीमारी पहले से मौजूद हो, तो साधारण संक्रमण भी गंभीर जटिलताओं में बदल सकता है।
@ दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित व्यक्ति : कैंसर, एचआईवी, प्रतिरक्षा-दमित रोगी, स्टेरॉयड लेने वाले मरीज और प्रत्यारोपण (Transplant) करा चुके लोगों में संक्रमण का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक होता है।

# बरसात में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ कौन कौन सी हैं ?
1. डेंगू : डेंगू एक वायरल रोग है, जो एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से फैलता है। यह मच्छर प्रायः सुबह और शाम के समय अधिक सक्रिय रहता है तथा साफ और रुके हुए पानी में अंडे देता है।
इसके प्रमुख लक्षण हैं—
- तेज बुखार
- सिर एवं आँखों के पीछे दर्द
- शरीर और जोड़ों में तीव्र दर्द
- त्वचा पर लाल चकत्ते
- कमजोरी और प्लेटलेट्स की संख्या में कमी
अधिकांश रोगी सामान्य उपचार से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में डेंगू रक्तस्रावी (Hemorrhagic Dengue) या डेंगू शॉक सिंड्रोम का रूप लेकर जानलेवा बन सकता है। इसलिए तेज बुखार होने पर स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना आवश्यक है।

2. मलेरिया : मलेरिया प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से होता है, जो एनोफिलीज मच्छर द्वारा फैलता है। इसके लक्षणों में ठंड लगकर तेज बुखार आना, अत्यधिक पसीना आना, सिरदर्द, उल्टी और कमजोरी शामिल हैं। समय पर उपचार न मिलने पर यह मस्तिष्क, यकृत और गुर्दों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

3. चिकनगुनिया : यह भी मच्छरों से फैलने वाला वायरल रोग है। इसमें तेज बुखार के साथ जोड़ों में इतना अधिक दर्द हो सकता है कि कई रोगियों को महीनों तक चलने-फिरने में कठिनाई होती है। कुछ लोगों में यह दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है।

4. टाइफाइड : दूषित पानी और भोजन के माध्यम से फैलने वाला यह रोग साल्मोनेला टाइफी जीवाणु के कारण होता है। यदि समय पर उपचार न मिले तो आंतों में गंभीर संक्रमण और अन्य जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

5. डायरिया और हैजा : बरसात में दूषित पानी पीना अनेक जलजनित रोगों का सबसे बड़ा कारण है। डायरिया और हैजा शरीर में पानी और लवणों की गंभीर कमी (डिहाइड्रेशन) पैदा कर सकते हैं, जो विशेष रूप से छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत खतरनाक है।

6. लेप्टोस्पायरोसिस : यह बीमारी संक्रमित पशुओं के मूत्र से दूषित पानी या कीचड़ के संपर्क में आने से फैलती है। बारिश के दौरान जलभराव वाले क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों को इसका खतरा अधिक रहता है।

7. वायरल हेपेटाइटिस (पीलिया) : दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलने वाले हेपेटाइटिस A और E मानसून के दौरान अधिक देखने को मिलते हैं। इससे यकृत (लीवर) प्रभावित होता है और रोगी को पीलिया, कमजोरी, उल्टी तथा भूख न लगने जैसी समस्याएँ होती हैं।

बरसात में क्या करें?
✔️ केवल गर्म और ताजा भोजन ही खाएं।
✔️ केवल स्वच्छ और सुरक्षित पानी पिएँ। यदि पानी की शुद्धता संदिग्ध हो, तो उसे उबालकर ही उपयोग करें।
✔️ घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कम से कम सप्ताह में एक बार कूलर, गमले और पानी के बर्तनों की सफाई करें।
✔️ मच्छरदानी लगाएं, पूरी बाँह के कपड़े पहने और यथा संभव मच्छररोधी क्रीम का उपयोग करें।
✔️ घर का बना ताज़ा और गर्म भोजन ही खाएँ। तिल, मूंगफली और जचकी लड्डू खाएं।
✔️ गुड़ को अपने भोजन में शामिल करें।
✔️ फल और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर उपयोग करें।
✔️ बच्चों को खुले में रखे खाद्य पदार्थ खाने से रोकें।
✔️ नियमित रूप से साबुन से हाथ धोने की आदत डालें।
✔️ बुखार, उल्टी, दस्त या सांस लेने में कठिनाई होने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।
✔️ अपनी हेल्थ के अनुसार पानी में भींगने से बचें। खासकर हल्की फुहारों से बचाव के लिए टोपी जरूर पहनें।
✔️ यदि भींगने से एलर्जी हो छतरी, रेनकोट हेलमेट, मास्क लगाएं।
✔️ विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए आवश्यक है कि रात्रि में अथवा सोने के समय शरीर को गर्म रखने के लिए सॉफ्ट और मोटे ब्लैंकेट का उपयोग करें।

 बरसात में क्या न करें?
✘ सड़क किनारे खुले खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
✘ बासी रोटी, भोजन इत्यादि न खाएँ।
✘ तेज बुखार में बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या दर्दनाशक दवाएँ न लें।
✘ डेंगू की आशंका होने पर बिना चिकित्सकीय सलाह के ऐसी दर्दनिवारक दवाओं से बचें जो रक्तस्राव का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
✘ घर के आसपास कचरा या पानी जमा न रहने दें।
✘ बीमारी के शुरुआती लक्षणों को हल्के में न लें तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाएं


जानें क्या है मिथक ?

बारिश में भीगने से ही बुखार आता है।
सत्य: बीमारी का कारण संक्रमण है, केवल भीगना नहीं।

डेंगू का मच्छर केवल गंदे पानी में पनपता है।
सत्य: यह साफ और रुके हुए पानी में भी पनपता है।

हर बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी है।
सत्य: वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक प्रभावी नहीं होती।

केवल गरीब बस्तियों में डेंगू होता है।
सत्य: डेंगू किसी भी क्षेत्र में फैल सकता है यदि मच्छरों के प्रजनन की परिस्थितियाँ मौजूद हों।


क्या आप जानते हैं?
- विश्व में मच्छर सबसे अधिक मानव मृत्यु से जुड़े जीवों में गिने जाते हैं।
- केवल 20 सेकंड तक साबुन से हाथ धोने की आदत अनेक संक्रामक रोगों के प्रसार को काफी हद तक रोक सकती है।
- अधिकांश मानसूनी बीमारियों की रोकथाम स्वच्छता, सुरक्षित पानी और मच्छर नियंत्रण से संभव है।

अंततः हम इस निष्कर्ष में पहुंचते हैं कि बरसात जीवनदायिनी तो है किंतु बीमारियों और मौत का सौदागर नहीं! यह प्रकृति का अनुपम उपहार है, जो मानव जीवन, कृषि, पर्यावरण और जल संसाधनों का आधार है। किंतु जब स्वच्छता की अनदेखी होती है, दूषित जल का उपयोग किया जाता है, मच्छरों को पनपने दिया जाता है और बीमारी के प्रारंभिक लक्षणों की उपेक्षा की जाती है, तब यही मौसम अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है। ऐसी स्थिति में हम बरसात को दोषारोप करते हुए कह सकते हैं कि बरसात केवल जीवनदायिनी नहीं बल्कि बीमारियों और मौत का सौदागर भी है। विज्ञान हमें बताता है कि मानसून का आनंद और सुरक्षा दोनों साथ-साथ संभव हैं। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक स्वच्छता को जीवनशैली का हिस्सा बनाए, सुरक्षित पेयजल का उपयोग करे, संतुलित आहार ले, मच्छरों के प्रजनन को रोके और बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त करे। बरसात हमें केवल प्रकृति की सुंदरता का अनुभव ही नहीं कराती, बल्कि यह भी सिखाती है कि जीवन की रक्षा के लिए जागरूकता, अनुशासन और वैज्ञानिक सोच कितनी आवश्यक है।

"बारिश प्रकृति का आशीर्वाद है; इसे अभिशाप केवल हमारी अर्थात इंसानों की लापरवाही ही बनाती है। आइए, इस मानसून स्वच्छता अपनाएँ, मच्छरों को पनपने से रोकें, सुरक्षित भोजन और स्वच्छ पानी का उपयोग करें तथा स्वयं, अपने परिवार और समाज को स्वस्थ रखने का संकल्प लें।"

(एच.पी. जोशी)
लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी

मंगलवार, मार्च 31, 2026

नक्सल मुक्त हुआ अबूझमाड; 01 लाख रुपये का एक आखिरी ईनामी शस्त्र माओवादी कैडर ने पुलिस अधीक्षक श्री रोबिनसन गुड़िया के समक्ष हिंसा त्यागकर किया आत्मसमर्पण

नक्सल मुक्त हुआ अबूझमाड; 01 लाख रुपये का एक आखिरी ईनामी शस्त्र माओवादी कैडर ने पुलिस अधीक्षक श्री रोबिनसन गुड़िया के समक्ष हिंसा त्यागकर किया आत्मसमर्पण

“माड़ बचाओ अभियान” के तहत नारायणपुर पुलिस को मिली बड़ी सफलता – पुलिस, डीआरजी और केंद्रीय सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई में भारी मात्रा में हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक सामग्री एवं दैनिक उपयोग की वस्तुएं बरामद

🔰 ग्रामीणों के सहयोग एवं सुदृढ़ आसूचना तंत्र से सफलता
🔰 नारायणपुर पुलिस, डीआरजी, आईटीबीपी एवं बीएसएफ़ की संयुक्त कार्यवाही
🔰 संयुक्त कार्यवाही में विभिन्न प्रकार के 59 हथियार बरामद
🔰 1856 जिंदा राउंड (गोला-बारूद); खराब/खोखा सहित कुल 1908 नग बरामद
🔰 विस्फोटक एवं आईईडी से संबंधित 581 नग सामग्री बरामद
🔰 बीजीएल राउंड एवं लॉन्चर सहित कुल 330 नग सामग्री बरामद


🟪  “पूना मारगेम : पुनर्वास से पुनर्जीवन” पहल के अंतर्गत आज दिनांक 31-03-2026 को जिला नारायणपुर में एक महत्त्वपूर्ण एवं निर्णायक उपलब्धि दर्ज हुई, जहाँ 01 लाख रुपये ईनामी एक पुरुष माओवादी उत्तर-पश्चिम संयुक्त सब-जोनल ब्यूरो टीडी टीम पार्टी सदस्य बिजलू मण्डावी पिता श्री बोगा राम मण्डावी उम्र 26 वर्ष जाति माड़िया निवासी + पंचायत तुषवाल थाना बारसुर जिला बीजापुर (छ.ग.) ने पुलिस अधीक्षक श्री रोबिनसन गुड़िया के समक्ष हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया।

🟪 पुलिस अधीक्षक नारायणपुर श्री रोबिनसन गुड़िया ने जानकारी दी कि आज की कार्रवाई के बाद वर्ष 2025-26 में जिले में कुल 302 माओवादी कैडर हिंसा त्यागकर मुख्यधारा में शामिल हो चुके हैं, वहीं इस अवधि में 270 हथियारों की रिकवरी हुई है। यह आँकड़ा बताता है कि क्षेत्र में विश्वास, शांति और विकास की प्रक्रिया लगातार गति पकड़ रही है।

🟪 भारत सरकार एवं छत्तीसगढ़ शासन की मंशानुसार 31 मार्च 2026 तक सम्पूर्ण राज्य को नक्सल मुक्त घोषित करने के लक्ष्य के अनुरूप, जिला नारायणपुर में पुलिस द्वारा “माड़ बचाओ अभियान” के तहत विशेष नक्सल उन्मूलन अभियान निरंतर संचालित किया गया। इसी परिप्रेक्ष्य में विगत एक महीने तक जिला नारायणपुर पुलिस, डीआरजी, आईटीबीपी एवं बीएसएफ़ के संयुक्त दलों द्वारा सुदूर एवं संवेदनशील क्षेत्रों में सघन सर्चिंग एवं एरिया डोमिनेशन अभियान चलाया गया। ग्रामीणों के सक्रिय सहयोग एवं सुदृढ़ आसूचना तंत्र के माध्यम से विभिन्न स्थानों पर नक्सलियों द्वारा छिपाकर रखे गए डम्प का पता लगाकर कार्यवाही की गई।

🟪 जिला नारायणपुर में तैनात सुरक्षा बलों को ग्रामीणों के सहयोग एवं सुदृढ़ आसूचना तंत्र के आधार पर संचालित संयुक्त कार्यवाही में आज उल्लेखनीय और निर्णायक सफलता प्राप्त हुई है। इस अभियान के दौरान विभिन्न प्रकार के 59 हथियार बरामद किए गए, साथ ही 1856 जिंदा राउंड (गोला-बारूद) जब्त किए गए, जो खराब/खोखा सहित कुल 1908 नग हैं। यह कार्यवाही नारायणपुर पुलिस, डीआरजी, आईटीबीपी एवं बीएसएफ़ के संयुक्त प्रयासों से सफलतापूर्वक संपन्न की गई, जो क्षेत्र में सुरक्षा व्यवस्था सुदृढ़ करने और नक्सल गतिविधियों पर प्रभावी नियंत्रण की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

🟪 संयुक्त कार्यवाही में विस्फोटक एवं आईईडी से संबंधित 36 सामग्री तथा बीजीएल राउंड एवं लॉन्चर सहित कुल 330 नग सामग्री सहित कुल 113 नग डेटोनेटर (इलेक्ट्रिक एवं नॉन-इलेक्ट्रिक सहित), 300 मीटर कार्डेक्स/इलेक्ट्रिक वायर एवं 20 से अधिक इकाई प्राइमा कॉर्ड, लगभग 55+ किलोग्राम विस्फोटक पाउडर/रसायन (बारूद, सल्फर, यूरिया आदि), बम/IED/ग्रेनेड, दैनिक उपयोग की सामग्री तथा बैटरी एवं अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण बरामद किया गया है।

🟪 उक्त कार्यवाही से नक्सलियों की लॉजिस्टिक, हथियार आपूर्ति एवं आईईडी निर्माण क्षमता को गंभीर आघात पहुंचा है। यह सफलता नक्सल उन्मूलन अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। जिला नारायणपुर पुलिस द्वारा भविष्य में भी इसी प्रकार के अभियान लगातार जारी रखे जाएंगे।

🟪 पुलिस, डीआरजी और केंद्रीय सुरक्षा बलों की संयुक्त कार्रवाई, मुस्तैदी और बलिदान के फलस्वरूप जिला नारायणपुर नक्सलमुक्त हो रही है। मारे गए नक्सलियों के द्वारा अबूझमाड की जंगलों में छिपाए गए हथियार, विस्फोटक पदार्थ और दैनिक उपयोग की वस्तुएं मिलने की संभावना है। अतः आम जनता एवं ग्रामीणों से अपील है कि वे सुरक्षा बलों का सहयोग करते हुए संदिग्ध सामग्रियों की सूचना पुलिस एवं केन्द्रीय बल को अवश्य दें।

🟪 विगत एक महिना में जनसहयोग से रिकवर किये गए हथियार, गोला-बारूद, विस्फोटक, रसायन, इलेक्ट्रॉनिक्स, आईईडी के पुर्ज़े, लॉन्चर एवं अन्य सामग्रियों की संक्षिप्त जानकारी :
01 इंसास एलएमजी - 01 नग
02 स्टेनगन - 02 नग
03 303 रायफल - 02 नग
04 9 एम.एम. पिस्टल - 01 नग
05 रिवॉल्वर - 01 नग
06 315 रायफल - 11 नग
07 12 बोर बंदूक - 07 नग
08 बीजीएल लाँचर - 06 नग
09 भरमार बंदूक - 25 नग
10 एसएलआर रायफल मैगजीन - 03 नग
11 कार्बाईन मैगजीन - 03 नग
12 303 रायफल मैगजीन - 09 नग
13 303 एलएमजी मैगजीन - 02 नग
14 इन्सास रायफल मोडीफाई लोहा मैगजीन - 02 नग
15 कार्बाईन मैगजीन - 05 नग
16 303 रायफल मैगजीन - 09 नग
17 एके 47 रायफल जिंदा राउण्ड - 40 नग
18 7.62 एसएलआर जिंदा राउण्ड - 136 नग
19 5.56 इन्सास जिंदा राउण्ड - 137 नग
20 9 एमएम पिस्टल जिंदा राउण्ड - 264 नग
21 303 रायफल जिंदा राउण्ड - 680 नग
22 315 रायफल जिंदा राउण्ड - 188 नग
23 12 बोर बंदूक जिंदा राउण्ड - 150 नग
24 एस.एल.जी. कारतूस - 08 नग
25 बीजीएल सेल (बड़ा)- 60 नग
26 बीजीएल सेल (मीडियम) - 100 नग
27 बीजीएल सेल (छोटा) - 150 नग
28 हथगोला - 36 नग
29 12 बोर बंदूक खराब राउण्ड - 33 नग
30 12 बोर बंदूक खाली खोखा - 19 नग
31 315 रायफल ब्रोकन - 02 नग
32 एस.एल.जी. - 01 नग
33 डेटोनेटर (इलेक्ट्रिक एवं नॉन-इलेक्ट्रिक सहित)
34 कार्डेक्स/इलेक्ट्रिक










शुक्रवार, मार्च 27, 2026

मानवता की मिसाल : ITBP जवानों ने किया गर्भवती महिला का सफल रेस्क्यू; जच्चा बच्चा दोनों सुरक्षित



मानवता की मिसाल : ITBP जवानों ने किया गर्भवती महिला का सफल रेस्क्यू; जच्चा बच्चा दोनों सुरक्षित

🔺 ITBP जवानों ने इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान के सुदूर ग्राम बोटेर (Boter) से गर्भवती महिला का सुरक्षित रेस्क्यू किया।
🔺 लगभग 5 किलोमीटर दुर्गम जंगल एवं पहाड़ी मार्ग पर स्ट्रेचर से ले जाकर बचाई जान।
🔺 समय पर उपचार हेतु महिला को CHC ओरछा पहुंचाया गया, मां एवं शिशु दोनों सुरक्षित।

दिनांक 27 मार्च 2026 को जिला नारायणपुर के अतिदुर्गम एवं संवेदनशील क्षेत्र इंद्रावती राष्ट्रीय उद्यान अंतर्गत ग्राम बोटेर (Boter) से एक गर्भवती महिला का सफल रेस्क्यू अभियान संपन्न किया गया। यह अभियान Indo-Tibetan Border Police (ITBP) की 29वीं बटालियन एवं नारायणपुर पुलिस के समन्वय से संचालित किया गया।

प्राप्त सूचना के अनुसार, महिला की स्थिति गंभीर होने के कारण तत्काल चिकित्सा सहायता आवश्यक थी। सूचना मिलते ही ITBP 29वीं बटालियन के कमांडेंट के निर्देशन में सहायक कमांडेंट अनिल कुमार के नेतृत्व में एक त्वरित कार्रवाई दल (QRT) को ग्राम बोटेर (Boter) के लिए रवाना किया गया। साथ ही COB ओरछा से एंबुलेंस को तैयार स्थिति में रखा गया।

दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों, सड़कों के अभाव एवं घने जंगलों के बीच ITBP जवानों ने असाधारण साहस एवं धैर्य का परिचय देते हुए अस्थायी स्ट्रेचर तैयार कर महिला को लगभग 5 किलोमीटर तक पैदल सुरक्षित निकाला। इस दौरान टीम ने ऊबड़-खाबड़ रास्तों, खड़ी चढ़ाइयों एवं कठिन परिस्थितियों को पार किया।

रेस्क्यू टीम द्वारा महिला को बोटेर (Boter) एवं कुदमेल के मध्य निर्धारित प्वाइंट तक लाया गया, जहां पहले से मौजूद एंबुलेंस द्वारा उसे तत्काल सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC), ओरछा पहुंचाया गया। वर्तमान में महिला एवं उसका शिशु दोनों सुरक्षित हैं तथा उनका उपचार जारी है।

यह सफल अभियान ITBP जवानों एवं नारायणपुर पुलिस के उत्कृष्ट समन्वय, कर्तव्यपरायणता एवं मानवीय संवेदनशीलता का प्रतीक है। विपरीत परिस्थितियों में भी आम नागरिकों की सुरक्षा एवं सहायता के प्रति सुरक्षा बलों की प्रतिबद्धता सराहनीय है।






रविवार, मार्च 22, 2026

“नारायणपुर पुलिस ने ‘कुमनार’ में खोली अंतिम नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप; अब निर्भीक होकर तिरंगा फहराएंगे अबूझमाड लोग; लोकतंत्र के दुश्मनों का खौफ़ समाप्त”


“नारायणपुर पुलिस ने ‘कुमनार’ में खोली अंतिम नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप; अब निर्भीक होकर तिरंगा फहराएंगे अबूझमाड लोग; लोकतंत्र के दुश्मनों का खौफ़ समाप्त”


🔹 नारायणपुर पुलिस ने ओरछा के रास्ते कुमनार से भैरमगढ़ (जिला बीजापुर) तक बनाई डायरेक्ट रोड़ कनेक्टिविटी, वर्ष 2025 के पहले तक ओरछा के भीतर था माओवादियों का अघोषित साम्राज्य
🔹 नारायणपुर पुलिस ने माओवादियों की सेंट्रल कमेटी की सेफजोन "कुमनार" में खोली अंतिम नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप; ये वही एरिया है जहां कुख्यात माओवादी बसवा राजू हुआ था ढेर
🔹 "शांतिपूर्ण एवं समृद्व नारायणपुर” के लक्ष्य आधारित नक्सलमुक्त अबूझमाड की दिशा में नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2026 की आठवीं और अंतिम कैम्प खोली “कुमनार” में
🔹 माड़ बचाव अभियान के अन्तर्गत थाना ओरछा क्षेत्रांतर्गत ग्राम कुमनार में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप।
🔹 दशकों से अलग थलग और अछूते अबूझमाड़ के इस क्षेत्र को मिलेगा मुख्य धारा का संपर्क।
🔹 नारायणपुर पुलिस, डीआरजी और बस्तर फॉईटर एवं आईटीबीपी के 38वीं वाहिनी, 44वीं वाहिनी, 41वीं वाहिनी, 45वीं वाहिनी, 53वीं वाहिनी और 29वीं वाहिनी ने खोला कुमनार में जन सुविधा एवं सुरक्षा कैम्प।

🟪 नारायणपुर पुलिस ने माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के शीर्ष लीडर और मेंबर्स के लिए सेफजोन माने जाने वाली बीहड़ और बेहद दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र "कुमनार" में नवीन कैंप स्थापित की है। विदित हो कि ये ये वही एरिया है जहां डीआरजी, पुलिस बल और केंद्रीय फोर्स के जवानों ने कुख्यात माओवादी बसवा राजू सहित कई कुख्यात माओवादियों को इतिहास के पन्नों में दफन किया है।

🟪 वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में नारायणपुर पुलिस द्वारा नक्सल मुक्त सशक्त बस्तर की कल्पना को साकार रूप देने हेतु क्षेत्र में लगातार नक्सल विरोधी ‘‘माड़ बचाओ’’ अभियान संचालित किया जा रहा है। साथ ही अबूझमाड़ में लगातार नवीन कैम्प स्थापित करते हुए सड़क पुल-पुलिया निर्माण सहित अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं को अंदरूनी गांव तक पहुंचाये जाने में सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

🟪 इसी कड़ी में थाना ओरछा के ग्राम कुमनार क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों एवं कांदुलनार -ओरछा-एडजुम-इडवाया-आदेर-कुडमेल-बोटेर-दिवालूर-कुमनार एक्सिस तक सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा प्रदान करने एवं विकास कार्यो में सहयोग पहुंचाने के उद्देश्य से दिनांक 22-03-2026 को नारायणपुर पुलिस ने घोर नक्सल प्रभावित माड़ क्षेत्र माओवादियों के आश्रय स्थल ग्राम कुमनार में नवीन कैम्प स्थापित किया गया है। ग्राम कुमनार में नवीन कैम्प स्थापित होने से क्षेत्र के ग्रामीणों में काफी उत्साह एवं सुरक्षा का माहौल बना हुआ है। नवीन कैम्प कुमनार थाना ओरछा क्षेत्रान्तर्गत स्थित है तथा जिला मुख्यालय नारायणपुर से 102 किलोमीटर थाना ओरछा से 42 किलोमीटर, आदेर से 24 किलोमीटर और कैम्प दिवालुर से 06 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

🟪 कुमनार में नवीन कैम्प स्थापित होने से आसपास के क्षेत्र लेकवाडा, नेडअट्टे, डोडूम, ईदवाडा, आंगमेटा और कुमनार में सड़क, पुल-पुलिया, शिक्षा, चिकित्सा, मोबाईल नेटवर्क कनेक्टिविटी एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं का तेजी से विस्तार होगा। अब क्षेत्र में सुरक्षा के निगरानी में सड़क निर्माण सहित अन्य सुविधाओं को आम जनता तक पहुंचाये जाने में सहयोग प्रदान किया जायेगा।

🟪 दशकों से अलग थलग और अछूते अबूझमाड़ के इस क्षेत्र को मिलेगा मुख्य धारा का संपर्क। कुमनार से सोनपुर के मार्ग भैरमगढ़ (जिला बीजापुर) से सीधे सड़क कनेक्टिविटी होगी जिससे आम नागरिकों को सड़क सुविधा के माध्यम से अलग-अलग सुविधाओं के साथ आवागमन की सुलभता प्राप्त होगी।

🟪 नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2025 में नक्सलियों के अघोषित राजधानी कुतुल सहित कोडलियार, बेड़माकोटी, पदमकोट, कंडुलपार, नेलांगुर, पांगूड़, रायनार, एडजूम, ईदवाया, आदेर, कुड़मेल, कोंगे, सितरम, तोके, जाटलूर, धोबे, डोडीमरका, पदमेटा, लंका, परियादी, काकुर, बालेबेड़ा, कोडेनार, कोडनार, आदिनपार और मन्दोड़ा में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप स्थापित किया गया है।

🟪 नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2026 में जटवर, वाड़ापेंदा, कुरसकोड़ो, हच्चेकोटी, आदनार, बोटेर, दिवालूर और कुमनार में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप स्थापित किया है।

🟪 श्री पी. सुन्दराज पुलिस महानिरीक्षक बस्तर रेंज जगदलपुर, श्री रोबिनसन गुरिया पुलिस अधीक्षक नारायणपुर, सेनानी श्री रोशन सिंह ओसवाल, 38 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री दुष्यंत राज जायसवाल, 29 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री राजीव गुप्ता, 45 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री पी पी सिद्दकी, 44 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री संजय कुमार, 53 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री नरेंद्र सिंह, 41 वीं वाहिनी आईटीबीपी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री अक्षय प्रमोद साबद्रा, अनुविभागीय पुलिस अधिकारी श्री अभिषेक केसरी, उप पुलिस अधीक्षक श्री अरविन्द किशोर खलखो, उप पुलिस अधीक्षक श्री मनोज मंडावी, उप पुलिस अधीक्षक श्री आशीष नेताम, उप पुलिस अधीक्षक श्री अविनाश कंवर, उप पुलिस अधीक्षक श्री कुलदीप बंजारे, उप पुलिस अधीक्षक श्री अजय कुमार सिंह, और रक्षित निरीक्षक श्री सोनू वर्मा के नेतृत्व एवं निर्देशन में नवीन कैम्प स्थापना में नारायणपुर पुलिस, डीआरजी और बस्तर फॉईटर एवं आईटीबीपी के 38वीं वाहिनी, 44वीं वाहिनी, 41वीं वाहिनी, 45वीं वाहिनी, 53 वीं वाहिनी और 29वीं वाहिनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

मंगलवार, मार्च 17, 2026

नारायणपुर पुलिस ने माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के शीर्ष लीडर और मेंबर्स के सेफजोन और बेहद दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र "दिवालुर" में खोली नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप; ये वही एरिया है जहां कुख्यात माओवादी बसवा राजू हुआ था ढेर


नारायणपुर पुलिस ने माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के शीर्ष लीडर और मेंबर्स के सेफजोन और बेहद दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र "दिवालुर" में खोली नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप; ये वही एरिया है जहां कुख्यात माओवादी बसवा राजू हुआ था ढेर

🔹 "शांतिपूर्ण एवं समृद्व नारायणपुर” के लक्ष्य आधारित नक्सलमुक्त अबूझमाड की दिशा में अंतिम कील ठोंकती नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2026 की सातवीं कैम्प खोली “दिवालूर” में
🔹 माड़ बचाव अभियान के अन्तर्गत थाना ओरछा क्षेत्रांतर्गत ग्राम दिवालूर में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप।
🔹 दशकों से अलग थलग और अछूते अबूझमाड़ के इस क्षेत्र को मिलेगा मुख्य धारा का संपर्क।
🔹 नारायणपुर पुलिस, डीआरजी और बस्तर फॉईटर एवं आईटीबीपी के 38वीं वाहिनी, 44वीं वाहिनी, 41वीं वाहिनी, 45वीं वाहिनी, 53वीं वाहिनी और 29वीं वाहिनी ने खोला बोटेर में जन सुविधा एवं सुरक्षा कैम्प।



🟪 नारायणपुर पुलिस ने माओवादियों की सेंट्रल कमेटी के शीर्ष लीडर और मेंबर्स के लिए सेफजोन माने जाने वाली बीहड़ और बेहद दुर्गम पर्वतीय क्षेत्र "दिवालुर" में नवीन कैंप स्थापित की है। विदित हो कि ये ये वही एरिया है जहां डीआरजी, पुलिस बल और केंद्रीय फोर्स के जवानों ने कुख्यात माओवादी बसवा राजू सहित कई कुख्यात माओवादियों को इतिहास के पन्नों में दफन किया है।

🟪 वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशन में नारायणपुर पुलिस द्वारा नक्सल मुक्त सशक्त बस्तर की कल्पना को साकार रूप देने हेतु क्षेत्र में लगातार नक्सल विरोधी ‘‘माड़ बचाओ’’ अभियान संचालित किया जा रहा है। साथ ही अबूझमाड़ में लगातार नवीन कैम्प स्थापित करते हुए सड़क पुल-पुलिया निर्माण सहित अन्य जन कल्याणकारी योजनाओं को अंदरूनी गांव तक पहुंचाये जाने में सहयोग प्रदान किया जा रहा है।

🟪 इसी कड़ी में थाना ओरछा के ग्राम दिवालूर क्षेत्र में नक्सल विरोधी अभियानों एवं कांदुलनार -ओरछा-एडजुम-इडवाया-आदेर-कुडमेल-बोटेर-दिवालूर-कुमनार एक्सिस तक सड़क निर्माण कार्य में सुरक्षा प्रदान करने एवं विकास कार्यो में सहयोग पहुंचाने के उद्देश्य से दिनांक 16-03-2026 को नारायणपुर पुलिस ने घोर नक्सल प्रभावित माड़ क्षेत्र माओवादियों के आश्रय स्थल ग्राम दिवालूर में नवीन कैम्प स्थापित किया गया है। ग्राम दिवालूर में नवीन कैम्प स्थापित होने से क्षेत्र के ग्रामीणों में काफी उत्साह एवं सुरक्षा का माहौल बना हुआ है। नवीन कैम्प दिवालूर थाना ओरछा क्षेत्रान्तर्गत स्थित है तथा जिला मुख्यालय नारायणपुर से 96 किलोमीटर थाना ओरछा से 36 किलोमीटर, आदेर से 21 किलोमीटर और कैम्प बोटेर से 06 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

🟪 दिवालूर में नवीन कैम्प स्थापित होने से आसपास के क्षेत्र रेकापारा, कुमनार, गुण्डेकोट, लेकवाडा, नेडअट्टे और दिवालूर में सड़क, पुल-पुलिया, शिक्षा, चिकित्सा, मोबाईल नेटवर्क कनेक्टिविटी एवं अन्य मूलभूत सुविधाओं का तेजी से विस्तार होगा। अब क्षेत्र में सुरक्षा के निगरानी में सड़क निर्माण सहित अन्य सुविधाओं को आम जनता तक पहुंचाये जाने में सहयोग प्रदान किया जायेगा।

🟪 दशकों से अलग थलग और अछूते अबूझमाड़ के इस क्षेत्र को मिलेगा मुख्य धारा का संपर्क। कुमनार से सोनपुर के मार्ग भैरमगढ़ (जिला बीजापुर) से सीधे सड़क कनेक्टिविटी होगी जिससे आम नागरिकों को सड़क सुविधा के माध्यम से अलग-अलग सुविधाओं के साथ आवागमन की सुलभता प्राप्त होगी।

🟪 नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2025 में नक्सलियों के अघोषित राजधानी कुतुल सहित कोडलियार, बेड़माकोटी, पदमकोट, कंडुलपार, नेलांगुर, पांगूड़, रायनार, एडजूम, ईदवाया, आदेर, कुड़मेल, कोंगे, सितरम, तोके, जाटलूर, धोबे, डोडीमरका, पदमेटा, लंका, परियादी, काकुर, बालेबेड़ा, कोडेनार, कोडनार, आदिनपार और मन्दोड़ा में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप स्थापित किया गया है।

🟪 नारायणपुर पुलिस ने वर्ष 2026 में जटवर, वाड़ापेंदा, कुरसकोड़ो, हच्चेकोटी, आदनार, बोटेर और दिवालूर में नवीन सुरक्षा एवं जन सुविधा कैंप स्थापित किया है।

🟪 श्री पी. सुन्दराज पुलिस महानिरीक्षक बस्तर रेंज जगदलपुर, श्री रोबिनसन गुरिया पुलिस अधीक्षक नारायणपुर, सेनानी श्री रोशन सिंह ओसवाल, 38 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री दुष्यंत राज जायसवाल, 29 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री राजीव गुप्ता, 45 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री पी पी सिद्दकी, 44 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री संजय कुमार, 53 वीं वाहिनी आईटीबीपी, सेनानी श्री नरेंद्र सिंह, 41 वीं वाहिनी आईटीबीपी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री अक्षय प्रमोद साबद्रा, अनुविभागीय पुलिस अधिकारी श्री अभिषेक केसरी, उप पुलिस अधीक्षक श्री अरविन्द किशोर खलखो, उप पुलिस अधीक्षक श्री मनोज मंडावी, उप पुलिस अधीक्षक श्री आशीष नेताम, उप पुलिस अधीक्षक श्री अविनाश कंवर, उप पुलिस अधीक्षक श्री कुलदीप बंजारे, उप पुलिस अधीक्षक श्री अजय कुमार सिंह, रक्षित निरीक्षक मो मोहसिन खान और रक्षित निरीक्षक श्री सोनू वर्मा के नेतृत्व एवं निर्देशन में नवीन कैम्प स्थापना में नारायणपुर पुलिस, डीआरजी और बस्तर फॉईटर एवं आईटीबीपी के 38वीं वाहिनी, 44वीं वाहिनी, 41वीं वाहिनी, 45वीं वाहिनी, 53 वीं वाहिनी और 29वीं वाहिनी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

गुरुवार, मार्च 12, 2026

“भारतीय परिप्रेक्ष्य में बढ़ते वजन के कारण, दुष्प्रभाव और रोकथाम के उपाय” : चिंतन श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी


भारतीय परिप्रेक्ष्य में बढ़ते वजन के कारण, दुष्प्रभाव और रोकथाम के उपाय”
(श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी की चिंतन पर आधारित आलेख)


भारत एक प्राचीन सभ्यता वाला देश है, जहाँ जीवन की मूल अवधारणा संतुलन, संयम और स्वास्थ्य पर आधारित रही है। आयुर्वेद में कहा गया है—“समदोषः समाग्निश्च समधातु मलक्रियः। प्रसन्नात्मेन्द्रिय मनः स्वस्थ इत्यभिधीयते॥” अर्थात जब शरीर, मन और इंद्रियाँ संतुलित अवस्था में हों, तभी मनुष्य वास्तव में स्वस्थ कहलाता है। किंतु आधुनिक समय में बदलती जीवनशैली, असंतुलित आहार और शारीरिक श्रम की कमी के कारण मोटापा या बढ़ता हुआ वजन एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर रहा है।

भारतीय समाज में पहले मोटापा उतना व्यापक नहीं था जितना आज दिखाई देता है। पहले के समय में लोग अधिक श्रम करते थे, प्राकृतिक भोजन ग्रहण करते थे और जीवनशैली अपेक्षाकृत सरल थी। आज तकनीकी विकास, शहरीकरण और सुविधाओं के विस्तार ने जीवन को आरामदायक तो बना दिया है, किंतु इसके साथ कई स्वास्थ्य चुनौतियाँ भी सामने आई हैं। बढ़ता हुआ वजन उन्हीं चुनौतियों में से एक है।

🟪 बढ़ते वजन के मुख्य कारण
भारतीय परिप्रेक्ष्य में वजन बढ़ने के कई कारण हैं। इनमें से सबसे प्रमुख कारण है बदलती जीवनशैली। आज अधिकांश लोग कार्यालयों में लंबे समय तक बैठकर काम करते हैं। कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य डिजिटल उपकरणों के उपयोग ने शारीरिक गतिविधि को बहुत कम कर दिया है। पहले लोग पैदल चलना, साइकिल चलाना या खेतों में काम करना जैसे श्रमसाध्य कार्य करते थे, जिससे शरीर सक्रिय रहता था।

दूसरा महत्वपूर्ण कारण है भोजन की बदलती प्रवृत्ति। पारंपरिक भारतीय भोजन संतुलित और पौष्टिक होता था जिसमें दाल, चावल, रोटी, सब्जियाँ और फल शामिल होते थे। किंतु वर्तमान समय में फास्ट फूड, जंक फूड, अधिक तैलीय और मीठे पदार्थों का सेवन बढ़ गया है। पिज्जा, बर्गर, कोल्ड ड्रिंक, पैकेज्ड स्नैक्स और मिठाइयाँ स्वाद में आकर्षक तो होती हैं, परंतु इनमें कैलोरी की मात्रा अधिक होती है और पोषण कम होता है।

तीसरा कारण है मानसिक तनाव। आधुनिक जीवन में प्रतिस्पर्धा और कार्यभार बढ़ने से लोग तनावग्रस्त रहते हैं। कई लोग तनाव कम करने के लिए अधिक भोजन करते हैं, जिसे “इमोशनल ईटिंग” कहा जाता है। इससे अनावश्यक कैलोरी शरीर में जमा होने लगती है और वजन बढ़ने लगता है।

इसके अतिरिक्त पर्याप्त नींद का अभाव भी मोटापे का एक कारण है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि कम नींद लेने से शरीर के हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, जिससे भूख बढ़ती है और वजन बढ़ने की संभावना अधिक हो जाती है।

🟪 सामाजिक और सांस्कृतिक पहलू
भारतीय समाज में भोजन को केवल पोषण का साधन ही नहीं बल्कि संस्कृति और परंपरा का हिस्सा भी माना जाता है। त्योहारों, विवाह और सामाजिक समारोहों में अत्यधिक भोजन का प्रचलन होता है। कई बार लोग आवश्यकता से अधिक भोजन कर लेते हैं, जो धीरे-धीरे वजन बढ़ने का कारण बनता है।

कुछ स्थानों पर मोटे शरीर को समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक भी माना जाता रहा है। हालांकि यह धारणा वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं है। स्वस्थ शरीर वही है जो संतुलित हो, न कि अत्यधिक मोटा या अत्यधिक दुबला।

🟪 बढ़ते वजन के दुष्प्रभाव
मोटापा केवल बाहरी रूप को प्रभावित करने वाली समस्या नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। बढ़ते वजन के कारण शरीर में चर्बी जमा होने लगती है, जिससे हृदय पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इससे हृदय रोगों का खतरा बढ़ जाता है।

मोटापा मधुमेह (डायबिटीज) का भी एक प्रमुख कारण है। आज भारत को “डायबिटीज कैपिटल” कहा जाने लगा है, जिसका एक बड़ा कारण बढ़ता हुआ मोटापा है। इसके अलावा उच्च रक्तचाप, कोलेस्ट्रॉल की वृद्धि और स्ट्रोक जैसी समस्याएँ भी मोटापे से जुड़ी हुई हैं।

वजन बढ़ने का प्रभाव केवल शारीरिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता। यह मानसिक स्वास्थ्य को भी प्रभावित करता है। मोटापे से ग्रस्त व्यक्ति कई बार आत्मविश्वास की कमी महसूस करता है और सामाजिक परिस्थितियों में असहजता अनुभव करता है।

इसके अतिरिक्त जोड़ों का दर्द, घुटनों में समस्या और सांस लेने में कठिनाई भी मोटापे के कारण उत्पन्न हो सकती है। बच्चों और किशोरों में बढ़ता वजन भविष्य में गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का आधार बन सकता है।

🟪 भारतीय जीवनदर्शन और स्वास्थ्य
भारतीय दर्शन में “मध्यम मार्ग” और “संयम” का विशेष महत्व है। भगवान बुद्ध ने भी जीवन में संतुलन और संयम को आवश्यक बताया है। इसी प्रकार योग और आयुर्वेद में भी संतुलित आहार, नियमित व्यायाम और मानसिक शांति को स्वस्थ जीवन का आधार माना गया है।

योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं है बल्कि यह शरीर, मन और आत्मा के संतुलन का विज्ञान है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से योगाभ्यास करता है, तो न केवल उसका वजन नियंत्रित रहता है बल्कि मानसिक शांति भी प्राप्त होती है।

🟪 श्रम और शिक्षा पर आधारित स्वास्थ्य दृष्टि : संत परंपरा का संदेश
भारतीय समाज में संतों और महान विभूतियों ने जीवन के व्यावहारिक पक्ष को सरल शब्दों में समझाया है। छत्तीसगढ़ की संत परंपरा में भी ऐसे विचार मिलते हैं जो आधुनिक स्वास्थ्य समस्याओं के समाधान में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।

संत परंपरा के महान समाजसुधारक गुरु घासीदास बाबा ने कहा था—“मेहनत ह सुख के आधार आय।” यह वाक्य केवल सामाजिक या आर्थिक जीवन के लिए ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण संदेश देता है। यदि हम इस दर्शन को आधुनिक जीवनशैली के संदर्भ में देखें, तो स्पष्ट होता है कि श्रम और शारीरिक सक्रियता ही स्वस्थ जीवन का आधार है।

आज के समय में मोटापे का एक बड़ा कारण शारीरिक श्रम की कमी है। मशीनों और तकनीक ने मनुष्य के श्रम को कम कर दिया है। परिणामस्वरूप शरीर में ऊर्जा खर्च कम होती है और अतिरिक्त ऊर्जा वसा के रूप में जमा होने लगती है। गुरु घासीदास बाबा का यह संदेश हमें स्मरण कराता है कि श्रम केवल जीवनयापन का साधन नहीं बल्कि स्वास्थ्य का भी आधार है। यदि व्यक्ति नियमित रूप से परिश्रम करता है—चाहे वह खेत में काम हो, पैदल चलना हो, योगाभ्यास हो या कोई खेल—तो उसका शरीर स्वाभाविक रूप से स्वस्थ बना रहता है।

इसी प्रकार सामाजिक चेतना और अनुशासन का एक महत्वपूर्ण संदेश माता श्यामा देवी के दर्शन में भी मिलता है। उनका कथन—“शिक्षा ग्रहण पहले, भोजन ग्रहण नहले”—केवल शिक्षा के महत्व को ही नहीं दर्शाता बल्कि जीवन में अनुशासन और संयम का भी संकेत देता है। यदि इस विचार को स्वास्थ्य के संदर्भ में समझा जाए, तो यह हमें यह सिखाता है कि जीवन में ज्ञान और जागरूकता का स्थान सबसे पहले होना चाहिए।

आज मोटापे की समस्या का एक कारण यह भी है कि लोग भोजन की मात्रा, पोषण और संतुलन के विषय में पर्याप्त जानकारी नहीं रखते। यदि व्यक्ति स्वास्थ्य संबंधी शिक्षा और जागरूकता को महत्व दे, तो वह अपने भोजन और जीवनशैली के प्रति अधिक सजग हो सकता है। माता श्यामा देवी का यह संदेश हमें यह भी प्रेरित करता है कि भोजन केवल स्वाद के लिए नहीं बल्कि शरीर के पोषण के लिए होना चाहिए।

इन दोनों संतविचारों को यदि आधुनिक जीवन में अपनाया जाए—एक ओर श्रम और सक्रियता को महत्व दिया जाए तथा दूसरी ओर ज्ञान और अनुशासन को—तो मोटापे जैसी समस्याओं से बचना संभव हो सकता है। यह विचार हमें यह समझाते हैं कि स्वास्थ्य केवल दवाइयों से नहीं बल्कि जीवनशैली, जागरूकता और सतत प्रयास से प्राप्त होता है।

🟪 रोकथाम के उपाय
बढ़ते वजन की समस्या से बचने के लिए सबसे पहले जीवनशैली में सुधार करना आवश्यक है। नियमित शारीरिक गतिविधि अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रतिदिन कम से कम 30 से 45 मिनट तक चलना, योग करना या कोई खेल खेलना शरीर को सक्रिय बनाए रखता है।

दूसरा महत्वपूर्ण उपाय है संतुलित आहार। भोजन में ताजे फल, हरी सब्जियाँ, दालें और साबुत अनाज शामिल होने चाहिए। अत्यधिक तैलीय और मीठे पदार्थों का सेवन सीमित करना चाहिए। पैकेज्ड और प्रोसेस्ड फूड से जितना संभव हो दूरी बनाए रखना चाहिए।

तीसरा उपाय है पर्याप्त नींद लेना। एक स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 7 से 8 घंटे की नींद लेना आवश्यक है। इससे शरीर के हार्मोन संतुलित रहते हैं और वजन नियंत्रण में रहता है।

इसके अलावा मानसिक तनाव को कम करना भी आवश्यक है। ध्यान, योग और सकारात्मक सोच तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।

🟪 परिवार और समाज की भूमिका
वजन नियंत्रण केवल व्यक्तिगत प्रयास से ही संभव नहीं है, बल्कि इसमें परिवार और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यदि परिवार में स्वस्थ भोजन की आदतें विकसित की जाएँ और बच्चों को बचपन से ही खेलकूद और शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रेरित किया जाए, तो भविष्य में मोटापे की समस्या कम हो सकती है।

विद्यालयों में भी स्वास्थ्य शिक्षा को महत्व देना चाहिए ताकि बच्चे सही जीवनशैली के बारे में जागरूक हो सकें।

सरकार और सामाजिक संस्थाओं को भी इस दिशा में कार्य करना चाहिए। सार्वजनिक स्थलों पर व्यायाम और खेलकूद की सुविधाएँ बढ़ाई जानी चाहिए। साथ ही लोगों को स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के लिए जागरूक करना भी आवश्यक है।

🟪 निष्कर्ष
बढ़ता हुआ वजन आज के समय की एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या है, जो केवल व्यक्तिगत नहीं बल्कि सामाजिक चुनौती भी बनती जा रही है। भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसका समाधान हमारी पारंपरिक जीवनशैली और आधुनिक वैज्ञानिक ज्ञान के समन्वय में निहित है। यदि हम संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, पर्याप्त नींद और मानसिक संतुलन को अपने जीवन का हिस्सा बना लें, तो मोटापे की समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।

अंततः यह समझना आवश्यक है कि स्वस्थ शरीर ही स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र की आधारशिला है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होना चाहिए और संतुलित जीवनशैली अपनाने का प्रयास करना चाहिए। स्वास्थ्य केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है। यदि हम इसे सुरक्षित रखेंगे, तभी एक सशक्त और समृद्ध भारत का निर्माण संभव होगा।

“चिंतन: श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी”

रविवार, मार्च 08, 2026

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 पर श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी : शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा की प्रेरक पहचान

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 पर श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी : शिक्षा, साहित्य और समाज सेवा की प्रेरक पहचान



अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस महिलाओं के योगदान, संघर्ष और उपलब्धियों को सम्मान देने का महत्वपूर्ण अवसर है। इस संदर्भ में श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी (नारायणपुर) का नाम एक ऐसी जागरूक और सक्रिय महिला के रूप में लिया जा सकता है, जिन्होंने शिक्षा, साहित्य और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से समाज के उत्थान में उल्लेखनीय योगदान दिया है।


श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी का जन्म 24 फरवरी 1997 को छत्तीसगढ़ के मुंगेली जिले के सारंगपुर में हुआ। प्रारंभ से ही उन्हें शिक्षा, सामाजिक सेवा और ज्ञान के प्रसार में विशेष रुचि रही। उनकी सोच यह रही है कि समाज की प्रगति जागरूकता, शिक्षा और मानवीय मूल्यों के विकास से ही संभव है।


📕 "शिक्षा और बौद्धिक पृष्ठभूमि"

श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी ने बैचलर ऑफ साइंस (B.Sc.) की शिक्षा प्राप्त की है। इसके अतिरिक्त उन्होंने स्वास्थ्य और वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में रुचि लेते हुए इलेक्ट्रो होम्योपैथी में दो वर्षीय पाठ्यक्रम भी किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें समाज और स्वास्थ्य से जुड़े विषयों को समझने तथा लोगों को जागरूक करने में सक्षम बनाती है।


📕 "The Bharat वेबसाइट का संचालन"

डिजिटल युग में ज्ञान और जागरूकता के प्रसार के उद्देश्य से श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी www.thebharat.co.in वेबसाइट का संचालन कर रही हैं। यह मंच शिक्षा, समाज, संस्कृति, साहित्य और मानवाधिकार से जुड़े विषयों पर लेख और विचार प्रकाशित करता है।


इस वेबसाइट का उद्देश्य समाज में शैक्षणिक, सामाजिक और बौद्धिक जागरूकता बढ़ाना तथा वैज्ञानिक सोच को प्रोत्साहित करना है। इसके माध्यम से लेखक, कवि और विचारक अपनी मौलिक रचनाएँ निःशुल्क प्रकाशित कर सकते हैं, जिससे नए रचनाकारों को एक महत्वपूर्ण मंच प्राप्त होता है।


📕 "साहित्य और पुस्तक प्रकाशन में योगदान"

साहित्य और ज्ञान के क्षेत्र में भी श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण पुस्तकों के प्रकाशन में भूमिका निभाई है, जिनमें प्रमुख हैं—


“लिख दूँ क्या ?” – श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी का काव्य संग्रह।

“मानव अधिकार के अनछुए पहलू” – मानव अधिकारों के सामाजिक और वैचारिक पहलुओं पर आधारित पुस्तक।


इन पुस्तकों के माध्यम से समाज में मानवता, समानता और सामाजिक न्याय के विचारों को मजबूत करने का प्रयास किया गया है।


📕 "सामाजिक जागरूकता और मानवीय सेवा"

श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी सामाजिक जागरूकता और मानव सेवा के कार्यों से भी जुड़ी रही हैं। वे शिक्षा, स्वास्थ्य, अंगदान, रक्तदान और मानव अधिकार जैसे विषयों पर लोगों को जागरूक करने के लिए लगातार प्रयास करती रही हैं।


उनका मानना है कि समाज का वास्तविक विकास तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति मानवता और सहयोग की भावना से कार्य करे।


📕 "महिला सशक्तिकरण की प्रेरक मिसाल"

श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी का व्यक्तित्व यह दर्शाता है कि एक शिक्षित और जागरूक महिला समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। वे महिलाओं और युवाओं को शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सामाजिक भागीदारी के लिए प्रेरित करती हैं।


उनके प्रयास यह संदेश देते हैं कि जब महिलाएँ ज्ञान और नेतृत्व के साथ आगे बढ़ती हैं, तो वे समाज को नई दिशा देने की क्षमता रखती हैं।


📕 "संक्षेपिका"

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस 2026 के अवसर पर श्रीमती विधि हुलेश्वर जोशी का जीवन और कार्य यह प्रेरणा देता है कि शिक्षा, साहित्य और सेवा की भावना के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।


वे एक ऐसी युवा समाजसेवी हैं जिन्होंने डिजिटल मंच, पुस्तक प्रकाशन और सामाजिक जागरूकता के माध्यम से समाज के उत्थान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। उनका कार्य आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत है और यह संदेश देता है कि एक जागरूक और सशक्त महिला पूरे समाज को सकारात्मक दिशा दे सकती है।


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