"जीवन बचाओ मुहिम"

हत्यारा और मांसाहार नहीं बल्कि जीवों की रक्षा करने वाला बनो।

मंगलवार, जून 30, 2020

सुविचार - मानवता का सिद्धांत

मानवता: "जो स्वयं को श्रेष्ठ घोषित कर अन्य को किसी भी आधार पर छोटा/नीच मानता है उसका यह अनैतिक कृत्य उसे अमानवीय बना देता है जबकि जो मनुष्य किसी अन्य को महान/श्रेष्ठ मानकर उसे पूजता है वह स्वयं ही श्रेष्ठ बन जाता है। परन्तु इसका तात्पर्य यह कदापि नही कि वह स्वयं को नीच/छोटा समझकर सामने वाले को पूजाता हो, यदि वह ऐसा करता है तो उसका यह विचार उसे पतन की ओर ले जाता है।" 
- HP Joshi

मनखे-मनखे एक समान 
कोई नीच न है कोई महान


सोमवार, जून 29, 2020

क्या आप जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं? - श्री हुलेश्वर जोशी

क्या आप जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं? - श्री हुलेश्वर जोशी

  • "यदि आप सुंदरता का मतलब गोरी चमड़ी को मानते हैं तो आपसे अधिक अमानवीय सोच वाला इंसान पूरे विश्व में कोई और नहीं होगा।"
  • यदि आप हिंसा या आत्महत्या कर रहे हैं तो आपसे बड़ा दुष्ट कंश भी नहीं रहा होगा। आप रामायण से सीखिए "मारने अथवा मरने से अच्छा त्यागना"
  • सबसे उच्च जाति के कौन है? जवाब आया - कोई नहीं, ये जाति धर्म का विभाजन केवल फुट डालो और राजकरो का सिद्धांत है।
  • मानवता को जानने के लिए, धर्म को समझने के लिए केवल आप "मनखे मनखे एक समान" और "सत्य ही मानव का आभूषण है" यह जानकर जीवन जिएं 
  • जाति और धर्म के विभाजनकारी सिद्धांत को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है सभी जाति धर्म के बीच रोटी बेटी का सहज संबंध स्थापित करना। 
यदि आप स्वयं के लिए अथवा अपने संतान के लिए जीवनसाथी की तलाश कर रहे हैं तो यह लेख आपका मार्गदर्शन कर सकता है। सबसे पहले आपको यह जान लेना आवश्यक है कि "हर लड़की - लड़का योग्य है, योग्यता किसी में कम या अधिक नहीं। बस किसी भी लड़के या लड़की के लिए उसके टाइप का, उसके समानांतर जीवनसाथी चाहिए होता है।" यह बात आपको पचने वाला नहीं है मगर यही सत्य है, मगर जो आपको देखने समझने में कुछ कम ज्यादा लग रहा है वह केवल अवसर की असमानता के कारण है।

हो सकता है आप बैचलर हों, मास्टर हों, एडवोकेट हों, सीए हों, इंजीनियर हों, डॉक्टरेट किये हों और सामने जिसे देख रहे हैं वह साक्षर भी न हों, तो इसका मतलब यह नहीं कि सामने वाले योग्य नहीं है। बस अवसर की असमानता जिसमें आपको अच्छा अवसर मिला और उन्हें अच्छे अवसर या माहौल ही नहीं मिल पाया हो। हो सकता है आप आईएएस हों, आईपीएस हों, मजिस्ट्रेट हों, वैज्ञानिक हों, प्रोफेसर हों, बड़े व्यवसायी हों या आप किसी विशालकाय सीमा में राजनीति के प्रमुख शक्तिकेन्द्र हों, तो इसका एक मात्र कारण "अवसर" हो सकता है।

आपसे अनुरोध है कि आप अपने हिसाब से सामान अवसर मिलने वाले से ही नही बल्कि सदैव कम अवसर मिलने वाले से विवाह करिए, सम्भव है ऐसे जीवनसाथी आपको ईश्वर से अधिक महान जान सकेंगे। जबकि समांतर जीवन साथी के नजर में आप योग्य दिखेंगे मगर इसकी कोई गारंटी नहीं है कि वे आपका अच्छा खासा सम्मान करेंगे।

अक्सर देखने मे आता है कि पुरूष वर्ग जब लड़की देखने जाते हैं तो सामने वाली लड़की की सुंदरता और शिक्षा को देखते हैं कुछ लोग जो स्वयं अच्छे पद में रहते हैं वे भी समांतर पद की लड़की ही खोजते हैं या अपने से अधिक शैक्षणिक योग्यता वाली लड़की देखते हैं ताकि वे उनसे रोज़गार करवा सकें, प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से बराबर या अपने स्वयं से अधिक उचे दर्जे का पदवी पा सके। अधिक हद तक ऐसे विचार सबके भीतर है, न्यायसंगत भी प्रतीत होता है मगर आप सार्वभौमिक रूप से सोचेंगे तो पाएंगे कि समाज मे असमानता का सबसे प्रमुख कारण यही सोच है। एक वर्ग अधिक शक्तिशाली हो रहा है, एक वर्ग अधिक धनवान हो रहा है एक वर्ग अधिक दिमाक वाला हो रहा है जिसके कारण शक्ति और धन आबादी की 70% से अधिक जनसंख्या के हिस्से कुछ नहीं है। यही असमानता किसी भी सीमाक्षेत्र में वर्गसंघर्ष को जन्म देती है। यह संघर्ष ही समानता और आत्मीयता का दुश्मन है इसके कारण ही अधिकतर लोग बराबर अवसर अर्थात बराबर शिक्षा, सम्मान, ओहदा, धन से परे रहकर जीवन जीने को मजबूर हैं। एक हिस्सा बड़े मजे से बहुसंख्यक समुदाय के हिस्से में मजा ले रहा है तो बहुसंख्यक समुदाय अपने मूलभूत जरूरत से वंचित अस्थिरता पूर्ण जीवन जीने को मजबूर है।

मनकी, अब मुंगेली जिला का एक गाँव है यहाँ एक मंडल हुआ करते थे संभु मंडल, पुरा नाम था श्री संभुदास जांगड़े। आसपास के बुद्धजीवी लोगों में उनका ओहदा बड़ा था आसपास के लोग उनसे सलाह मशविरा करने आते थे और सामाजिक, गैर सामाजिक मामलों के बैठकों में उनके तर्क और पक्ष का तोड़ कम ही मिलता था। मेरा बचपन खासकर गर्मी का दिन उन्ही के सानिध्य में गुजरता था, उनके द्वारा लगाए गस्ती और पीपल का वृक्ष ही गाँव का सबसे बड़ा सभास्थल हुआ करता था। वे अपने जीवन की 50% से अधिक समय इसी गस्ती के छांव में व्यतीत किए, एक बार की बात है मेरे एक मित्र के बड़े भैया की विवाह के लिए लड़की खोजने की बात चल रही थी उस दौरान उन्होंने कहा था "यदि आप सुंदरता का मतलब गोरी चमड़ी को मानते हैं तो आपसे अधिक अमानवीय सोच वाला इंसान पूरे विश्व में कोई और नहीं होगा।" उन्होंने आगे कहा था हमारे समय मे तो गर्भ के भीतर ही वैवाहिक अथवा मैत्री संबंधों की नींव रख दी जाती थी और ऐसे संबंध अधिक सफल रहे। आज हम लोकतंत्र के नागरिक हैं हमारे लाखों अधिकार हैं एक अच्छा खासा सिस्टम हमारे लिए हमारे अच्छे जीवन के लिए काम कर रहा है। अब लड़के और लड़की के लिए निर्धारित आयुसीमा तय है मतलब दोनो ही परिवार चलाने में सक्षम हैं ऐसे में तो विवाह को और भी अधिक सफल होना चाहिए मगर नहीं! पता है इसका कारण? इसका कारण है तीव्र इच्छाशक्ति, ऐला चाकंव कि ओला चाकंव वाले मन। अकेले आप मन, दिल या दिमाक से काम लेंगे या इनके योग से भी निर्णय लेंगे तो वह अमानवीय अथवा असफलता का कारक ही होगा इसलिये मनुष्य को अपनी आत्मा की सुनना चाहिए अंतरात्मा की बात सुनिए, अंतरात्मा से लिए गए निर्णय भी कतिपय मामलों में गलत हो सकते हैं यदि गलत है और सुधारने योग्य तो सुधारिए। मैंने इतिहास से लेकर अपने जीवन के शुरुआती दिनों तक राजपाठ के लिए हिंसा होते देखा, आज छोटी मोटी बातों के लिए लोग खून के प्यासे हो चले हैं। हिंसा और हत्या किसी भी शर्त में अच्छा या मानवीय नहीं हो सकता, चाहे इंसान की हो या अमुक पशु पक्षियों की। मैंने लगभग सभी धर्मों का धार्मिक पुस्तक पढ़ा है, रामायण के उस प्रसंग की बात बताना चाहता हूं जिसमें राजा राम और काल की वार्तालाप के समय शर्त उल्लंघन होने पर शर्त के अनुसार लक्ष्मण की हत्या करना था। विकल्प निकाला गया "मारने से अच्छा त्यागना" यदि किसी कारण से वैवाहिक जीवन सुखमय न रहा तो उसे सुखमय और सफल बनाया जा सकता है। इसके बावजूद लोग एकाकी परिवार की ओर बढ़ने के कारण इस विकल्प से वंचित होते जा रहे हैं यही वजह है पति पत्नी में आपसी विवाद और हिंसा, ये हिंसा और प्रताड़ना घोर अमानवीय और अव्यवहारिक है। यदि आप अपने जीवन सुखमय नहीं बना सकते हैं तो आपको विवाह विच्छेद का रास्ता अपनाना चाहिए यदि आप हिंसा या आत्महत्या कर रहे हैं तो आपसे बड़ा दुष्ट कंश भी नहीं रहा होगा। आप रामायण से सीखिए "मारने अथवा मरने से अच्छा त्यागना"

एक दिन की बात है दोपहर में मैं अपने अनन्य मित्र बीरेंद्र, श्री बीरेंद्र कुमार कुर्रे के साथ गस्ती के पास गए, खेल रहे थे और भी कुछ लोग थे मगर संभु मंडल वहां नही थे। कोई कुछ उल्टा सीधा बोल रहा था मगर उसके घर जाकर देखने की हिम्मत किसी में नही था। लोगों का कहना था उसे पिछले दिन 2-3 बार खार बाहिर जाते देखे हैं कहीं मंडल टपक तो नही गया? वे लगभग 115 साल के रहे होंगे, इसलिये उनके मृत्यु के बारे में सोचना सहज था। संभु मंडल नहीं मरेंगे यह मेरा विश्वास था, क्योंकि वे अमर हैं। मेरा पूरा परिवार उन्हें अमर जानते हैं, वह किसी धर्मगुरु अथवा महात्मा से कम नहीं थे, फर्जी और ढोंगी नहीं बल्कि सच्चे वाले महात्मा, सचमुच का धर्मगुरु। संभु मंडल का विश्वास था जब तक उनका रुपया लोगों के पास है लोग उनके कर्जदार रहेंगे तब तक वे जिंदा रहेंगे। इसलिए वे लोगों से उनके खेत, घर, सायकल, गाय- भैस या अन्य स्वर्ण आभूषण या बर्तन को गहना लिखवाकर रुपये दे दिया करते थे। ख्याल रखिए वे इन धरोहर की चीजों को अपने पास नही रखते बल्कि मूल मालिक के पास ही छोड़ देते थे। ब्याज नहीं बल्कि पिलारि लेते थे, पिलारि मतलब महीने के ब्याज को हर महीने मांग लेता जब तक वे जिंदा हैं तभी तक आप उनके कर्जदार हैं यदि उनकी मृत्यु हो गई तो कर्ज माफ, उनके वारिस को कर्ज वशूलने या मांगने का कोई अधिकार नही होगा। आप किसी महीने पिलारि नहीं दे पाते तब भी कोई बात नहीं, अगले महीने दे दीजिए अगले महीने भी नही देंगे तो कोई बात नहीं अपने दुःख या कारण बता दीजिए। जब वे पिलारि लेने आएं तो आदर से आसन दे दीजिए, चाय पानी या भोजन के लिए पूछ लीजिए फिर वे हलि भली पूछकर चले जायेंगे, पिलारि भी नहीं मांगेंगे, यदि आपका प्रेम और सम्मान सच्चा नही है तो वे न तो आपके घर पानी पियेंगे न बैठेंगे, बल्कि तगादा करके चले जायेंगे आप अगली संभावित तिथि बता दीजिए या इस महीने के पिलारि के लिए माफी मांग लीजिये। आप उनके सामने बेईमान हूँ कहकर भी उनके कर्ज के बोझ से मुक्त हो सकते हैं। मनकी के 40% से अधिक गरीब परिवार उधारी लेते थे, उधारी देने की शुरुआत उन्होंने अपने 50 या 70 वर्ष के उम्र होने के साथ ही कर दिया था।

मैं और बीरेंद्र संभु मंडल के घर गए, वे दरवाजा बंद किये हुए थे, बीरेंद्र ने दरवाजा खटखटाया उन्होंने आवाज दी, कौन झमलु? मैंने आवाज दी हव बबा। खोल रहा हूँ बेटा... उन्होंने दरवाजा खोलकर बोला खाना खाए हो कि नहीं? हमने कहा खा लिए हैं। पुनः कहा बासी बचे हे, तय खा ले बीरेंद्र। बीरेंद्र ने बताया कि वह जब अभी कुछ समय पहले खा रहा था तभी मैं उनके घर आया था। बीरेंद्र अधिक सीधा सच्चा आदमी था, बबा आपको तो अनपढ़ हैं बोलते हैं फिर ये इतने सारे पुस्तक आपके पास? आप अंग्रेजी के किताब को खोलकर क्या कर रहे हैं? वे हँसने लगे, और बोले बेटा बीरेंद्र, ये सारे पुस्तक अलग अलग धर्मों के धार्मिक पुस्तक हैं जिसके माध्यम से कुछ कुछ समझने और जानने में सहायता मिलती है। उनके पास हिन्दू, मुश्लिम, ईसाई और फारसी के धार्मिक पुस्तक थे। बीरेंद्र ने पूछा सबसे उच्च जाति के कौन है? जवाब आया - कोई नहीं, ये जाति धर्म का विभाजन केवल फुट डालो और राजकरो का सिद्धांत है। उन्होंने जाति धर्म के सिद्धांत का विरोध करते हुए कहा था बेटा यदि आप इसके विभाजनकारी सिद्धांतों के झांसे में आओगे तो मनुष्य नहीं बन पाओगे। सभी मनुष्य को गुरु घासीदास बाबा के बताए बात "मनखे मनखे एक समान" को जानने और उसके अनुसार जीवन जीने की जरूरत है। आप सतनामी हैं या सतनामी नहीं हैं फिर भी आपको गुरु घासीदास बाबा के बताए अनुसार जीवन के विकल्प का चुनाव करना चाहिए। यदि आप गुरु घासीदास बाबा के रास्ते नहीं चलेंगे तो आप भी केवल सतनामी होकर रह जाओगे, मनुष्य नहीं बन पाओगे। मनुष्य को किसी जाति या धर्म का होने की नही बल्कि मनुष्य होने की जरूरत है, मेरा मानना है कोई भी सामाजिक धार्मिक सिद्धांत अपने आप में पूर्ण और श्रेष्ठ नही हो सकतामानवता को जानने के लिए, धर्म को समझने के लिए केवल आप "मनखे मनखे एक समान" और "सत्य ही मानव का आभूषण है" यह जानकर जीवन जिएं यदि आप इससे अपरिचित हैं आप मेरे बातों से सहमत नही हैं तो आपको चाहिए कि आप मेरी तरह सभी धर्म के पुस्तकें पढ़कर समझें फिर जान पाएंगे कि कौन से धर्म के कौन से बात सही है और कौन से बात झूठ हैं। अपना दीपक खुद जलाओ अपने अंदर के अंधेरे को मिटाओ। मैं जब से अपना होश संभाला हूँ तब से धार्मिक विभाजन के खिलाफ हूँ परंतु जातिगत व्यवस्था के पक्षधर रहा हूँ अब भारत के आजाद होने के साथ ही जातिव्यवस्था को समाप्त करने योग्य जान चुका हूं।

प्रिय पाठक, अब तक आप संभुमण्डल की जाति धर्म के संबंध में विचार को समझ चुके होंगे, सम्भव है आप इस लेख को पढ़ने के पहले ही जाति और धर्म के सिद्धान्तों को समझ चुके होंगे। यदि नहीं तो अब समझने का प्रयास करिए, जाति और धर्म के विभाजनकारी सिद्धांत को तोड़ने का सबसे अच्छा तरीका है सभी जाति धर्म के बीच रोटी बेटी का सहज संबंध स्थापित करना। अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करिए अपने संतान के लिए जाति धर्म के भेद मिटाकर लड़का या लड़की खोजिए। सम्भव है कुंठा से ग्रसित कुछ लोग आपसे दुर्व्यवहार भी कर दें मगर आप अपना काम करिए, मानवता के अनुकूल जीवनसाथी की खोज करिए। जिस दिन हम समाज को जाति धर्म के बंधन से मुक्त कर लेंगे, जिस दिन हम असमानता को समाप्त कर पाएंगे उसी दिन यह धरती उस काल्पनिक स्वर्ग का वास्तविक आकार ले लेगा। 

वैवाहिक जीवन की अग्रिम शुभकामनाएं.....

Image - Shri HP Joshi, Writer

मंगलवार, जून 23, 2020

हरदी या हल्दी चंदन?

हरदी या हल्दी चंदन?


"हरदी" का विच्छेद करेंगे तो थोड़े सटीक उत्तर मिलेंगे 'हर+दी' जबकि "हल्दी" का विच्छेद करने पर आपको 'हल्+दी' की प्राप्ति होगी यह भी हरदी की भांति ही उस क्रिया के निकट है मगर ख्याल रखना यहाँ हल में पूर्ण "ल" नहीं है। सायद इसीलिए हमारे पूर्वज वानप्रस्थ के लिए प्रस्थान करते थे। हरदी और हल्दी चंदन की बात किस क्रिया के लिए बोला जा रहा है यह जानने के लिए केवल इतने से संकेतों के साथ मैं आपको दिमाक खपाने का बड़ा टास्क नही दूंगा; थोड़ा आपको सहयोग मिले इसके लिए एक "क्लू" जरूर देना चाहूंगा।

क्लू: "हरदी और चंदन में कायाकल्प होने के बाद चुनौतियों के साथ बड़ा आनंद है।"

बुद्धि के थोड़े से स्तेमाल करने से ही आपको उत्तर मिल चुका होगा यदि आपको उत्तर मिल चुका होगा तो आगे जरूर पढ़िए; परंतु यदि आपको उत्तर नही मिला है तो रुकिए, फिर वापस जाकर शुरुआत से पढ़िए और समझिए कि इस लेख के माध्यम से किस क्रिया को इंगित किया गया है।

मेरा विश्वास है कि आप समझ चुके होंगे कि मैं "विवाह" के बारे में कह रहा था। इसलिए अब आगे अपना लेख पूर्ण करने का प्रयास करता हूँ....

आपको इस विषय में अधिक विचार करने की जरूरत नहीं है कि आपने उबटन में हरदी से नहाया था कि हल्दी से या आपके उबटन में हल्दी हल्दी नहीं बल्कि हलदी थी? आपके उबटन में चंदन थी कि नहीं यह बात भी महत्वपूर्ण नही, आपने हलदी हरदी या हल्दी से नहाया या नहीं यह भी विवाह के लिए कोई अनिवार्यतः मुद्दा नही है। मगर ख्याल रखना, हल्दी चंदन का लेप शरीर के लिए अत्यंत उपयोगी और आवश्यक औषधि है जिसका उपयोग केवल विवाह के लिए ही नहीं बल्कि जीवन मे जब भी आपको आवश्यक लगे लगाते रहिए आपकी प्रतिरोधक क्षमताओं के लिए लाभदायक होगा। हल्दी आपके शरीर के बाहरी भाग में रहने वाले रोगाणुओं को भी मार सकता है, आपके घांव को भी मिटा सकता है छिपा सकता है और आपको सुंदर काया भी दे सकता है। विवाह के बाद यदि बच्चे भी नाखून से काट दें तो आपके शरीर में घांव नही बनेंगे इसलिए भी हल्दी चंदन के उबटन से नहाते रहिए। शरीर में हल्दी चंदन लगने का अपना बड़ा मजा है यदि इसे आपके जीवन साथी द्वारा लगाया जाए तब तो यह मजा और भी अधिक हो जाएगा। प्रयास करिए कि उबटन लगाने की मजबूरी न हो, उबटन आपके साथी लगाए तो अच्छी बात है मगर साथी के कारण लगाना पड़े तो आप दोनों ही नहीं बल्कि पूरे परिवार और समाज के लिए हानिकारक होगा।

आपके विवाह के लिए तैयार किए गए उबटन चंदन या चंदन पाउडर के योग से बना था या नहीं यह भी महत्वपूर्ण नहीं है मगर आपके आचरण में चंदन के गुण का होना अत्यंत आवश्यक है। यदि आपके जीवन में, आपके आचरण में, आपके व्यवहार में चंदन का गुण न हो तो आपके जीवन मे लू लग जाएंगे फिर तो आपको हर क्षण ख्याल रखना पड़ेगा कि कहीं कोई बवंडर न आ जाये, कोई बीड़ी या सिगरेट पीकर ठूठी या बिना बुझे माचिस की तीली आपके आसपास न फेक दे। यदि ऐसा हुआ तो आपका पूरा जीवन तबाह हो सकता है।

जब आपने शुरुआती लेख पढ़ा तो आपको व्यंग पढ़ने में चाहे मजा आया हो या फिर चाहे गुस्सा, मगर "लॉ ऑफ बेजाकब्जा" के कारण आपको हर+दी जाती है; जबकि आपके संकट और उलझनों के लिए हल+दी जाती है शर्त केवल इतनी सी है कि आपके आचरण में चंदन का गुण हो।

अंत में, अपने उबटन को हलदी और चंदन के योग से तैयार की गई प्रमाणित करिए, मुस्कराइए, हँसिए मगर खुश रहिए। हरदी और हल्दी का भी बड़ा मजा है केवल परंपरा के निर्वाह के लिए नहीं, जीवन को एन्जॉय करने के लिए विवाह करिए और चुनौतियों के साथ जीने का लुफ़्त उठाएं। विवाह कर चुके हैं तो बधाई हो नहीं किए हैं तो तैयार हो जाइए हलदी चंदन के योग से तैयार उबटन से नहाने के लिए, आप अपने पसंद के अनुसार लेप में दूध, दही, घी और मीठे गुड़ या शक्कर भी मिला लीजिए तब भी कोई बात नहीं मगर नमक मिर्च मिलाने की कोशिश कतई मत करना। सब्जी और सलाद में शामिल संतुलित मात्रा की नमक और मिर्च आपके सुखमय जीवन के लिए पर्याप्त रहेंगे।

शुक्रवार, जून 19, 2020

आज भी ब्रांडेड खरीदेंगे? आत्मनिर्भर भारत के दुश्मन! - Writer HP Joshi

भारत आत्मनिर्भर कब बनेगा?

आत्मनिर्भर होना हर व्यक्ति, हर समाज, हर प्रदेश और हर देश के लिए अत्यंत आवश्यक है। यह संभव है अत्यंत आसान भी, केवल आपकी इच्छाशक्ति होनी चाहिए आत्मनिर्भर बनने की; अन्यथा किसी भी शर्त में आप आत्मनिर्भर नहीं हो सकते। हमें हर स्तर में आत्मनिर्भर बनने का साझा प्रयास करना होगा, इसके लिए हमें अपने आसपास के अपने क्षेत्र के व्यवसायी, अतिलघु और लघु उद्यमियों को बढ़ावा देने की जरूरत है। यदि आप ऐसा नही कर रहे इसका तात्पर्य यह है कि आप आत्मनिर्भर भारत के सपने के खिलाफ काम कर रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है मैं अपने बच्चों के लिए जूते सैंडल खरीद रहा था। दुकान वाली लड़की किसी नए कंपनी के जूते सैंडल दिखा रही थी यह देखकर मैंने कुछ ब्रांड का नाम लिया और कहा इनमें से किसी ब्रांड का दिखाइए। मेरी पत्नी अचानक कह उठी "आज भी ब्रांडेड खरीदेंगे? आत्मनिर्भर भारत के दुश्मन!" मैं असहज हो गया, सभी असहज हो गए, कुछ अन्य ग्राहक भी मेरी पत्नी को देखने लगे। वह समझाने में सफल रही और सभी समझने को राजी हुए। इसके बावजूद कुछ मामलों में आज भी मुझपर ब्रांडेड का भूत सवार है।

सोशल मीडिया में कई वर्षों से चीनी सामग्री की बहिष्कार करने का अभियान चलाया जाता है। केवल एक देश से निर्मित वस्तुओं का विरोध करना अत्यंत खेदजनक है, ऐसे अभियान चलाने की जरूरत ही नहीं है। हमें केवल चीन निर्मित ही नहीं बल्कि हर विदेशी, हर ब्रांडेड वस्तुओं को खरीदने से बचना चाहिए जो लघु, अतिलघु और मध्यम उद्यमियों द्वारा स्वदेश में तैयार हो रहा है। इससे न केवल स्वदेशी को बढ़ावा मिलेगा वरन आत्मनिर्भर बनने का हमारा लक्ष्य पूरा भी होगा। 

आइए, हम सब मिलकर आत्मनिर्भर बनने बनाने का साझा प्रयास शुरू करें, यदि आप बेरोजगार हैं तो छोटे से छोटे काम से भी अपना रोजगार शुरू कर सकते हैं। गृहउद्योग अथवा बिल्कुल छोटे आकार के फुटपाथ अथवा आंगन में दुकान खोलने के लिए आप 500-5000 रुपये के लागत से भी अपना रोजगार शुरू कर लें, मगर आत्मनिर्भर रहें। यदि आप सक्षम या ग्राहक हैं तो ऐसे लोगों का सहयोग करिए अपनी जरूरत की सामग्री ऐसे लोगों से ही खरीदिए। देशभक्त होने का यह भी एक अच्छा तरीका है देश के लिए आप बार्डर में जाकर लड़ नहीं सकते तो भी आत्मग्लानि की कोई बात नहीं, अपने लोगों के लिए उनसे समान खरीदिए, बेरोजगार लोगों को उनका अपना रोजगार स्थापित करने के लिए आर्थिक सहयोग करिए, फोकट में नहीं तो सही उधारी में कुछ रुपये दीजिये या न्यूनतम ब्याज में रुपए दिलाइए। तभी आपका भारत आपका देश आत्मनिर्भर होगा, तभी आप और आपके आसपास के आपके अपने लोग खुशहाल जीवन जीने का आंनद उठा सकेंगे।


संक्षेप में, आपसे कुछ अनुरोध........
# ब्रांडेड वस्तुओं के बजाय गृहउद्योग, अतिलघु, लघु अथवा मझोले उद्यम से निर्मित अथवा फुटपाथ में बिकने वाली सामग्री खरीदिए।
# हर वह सामग्री जो स्वदेश में तैयार हो रहा है स्वदेशी ही खरीदिए।
# आत्मनिर्भर भारत के लिए अपना योगदान दीजिए, ऐसा करना देशभक्त होने का अच्छा और आसान तरीका है।

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माफीनामाः- इस लेख को लिखने के पीछे किसी भी व्यक्ति को आहत पहुंचाना नही है, बल्कि देशवासियों को आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करने का प्रयास करना है। यदि किसी व्यक्ति को इस लेख से बुरा लगे तो लेखक पूर्व से क्षमाप्रार्थी है। - HP Joshi

सूचना:- उपर दिये गये चित्र सांकेतिक है। जिसे घर के भीतर ही बच्चों को नाटक और स्कील सीखाने के लिए फोटो खीचा गया था। बच्चों को व्यवसाय में लगाना अनुचित और अवैधानिक हो सकता है।

लेखक सरकारी कर्मचारी होने के बावजूद समाज में शैक्षणिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक सुधार के लिए कार्यरत है। श्री एच पी जोशी, वर्तमान में नवा रायपुर छत्तीसगढ़ में निवास कर रहे हैं।

मंगलवार, जून 02, 2020

अपने हिस्से के सारे निर्णय मैं ही लूँगा। अपनी धर्म, अपने धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू व अपना आराध्य मैं स्वयं तय करूँगा।


अपने हिस्से के सारे निर्णय मैं ही लूँगा। अपनी धर्म, अपने धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू व अपना आराध्य मैं स्वयं तय करूँगा

“अपने हिस्से के सारे निर्णय मैं ही लूँगा। अपनी धर्म, अपने धार्मिक और आध्यात्मिक गुरू व अपना आराध्य मैं स्वयं तय करूँगा।” क्योंकि मुझ पर हजारों सालों से बोझ लाद दिया गया है। मुझे गेरवा से बाँध दिया गया है। इतने में मन नहीं भरा तो मेरे पीछे एक काल्पनिक लाठी लगा दिया गया है तब से जब मेरा जन्म भी नहीं हुआ था। मेरे माता-पिता का भी जन्म नहीं हुआ था। मेरे दादा-दादी का भी जन्म नहीं हुआ था। मेरे परदादा-परदादी और उनके भी सैकड़ों परदादाओं- परदादियों का जन्म नहीं हुआ था। उनके जन्म लेने के पहले से आज तक मुझे बोझ से लादा ही जा रहा है। मेरी बुद्धि और शक्ति को नियंत्रित करनें का प्रयास निरंतर जारी है।

          उसी ठीक गेरवा से मुझे भी बुरी तरह से जकड़कर बाँध दिया गया है जिससे मैं अपनी कारी को बाँधता था। आपको अपने बचपन की एक कहानी बताना चाहूँगा क्योंकि इस कहानी को जानना आपके लिए बेहद आवश्यक है।

          मैं कारी को लंबे दिनों तक बहन मानता रहा फिर अचानक वह माँ हो गई थी क्योंकि कारी मेरी गाय का नाम है। कारी मेरी बहन थी या फिर क्यों वह माँ थी। जो भी हो वह बाँधी क्यों जाती थी? मैं जब बच्चा था तब समझ में नहीं रहा था।

          अब कारी बुधवरिया को जन्म दे चुकी है। वह बुधवरिया से बहुत प्रेम करने लगी है। पेउस निकालने के बाद कारी और बुधवरिया को ढील दिया गया है। आँगन में दोनों विचरण कर रही हैं। मैं कुएँ से स्नान करके घर रहा हूँ। मैंने देखा कि सूर्य के मीठे धूप में कारी और बुधवरिया बहुत अच्छी लग रही हैं इसलिए मैं बुधवरिया को प्रेम करने के लिए जैसे ही उसे पकड़ा कारी मुझे मारने के लिए दौड़ाने लगी। सारे लाड़-प्यार और ममता का आज THE END हो गया।

          इस घटना के बाद जब भी दोनों एक साथ खुले होते हैं मैं कभी भी उनसे प्रेम करने नहीं जाता हूँ। कई बार बुधवरिया के साथ खेलने के लिए एक डंडा रख लेता हूँ ताकि कारी मुझे मारने दौड़ा सके। कारी और बुधवरिया ही नहीं सारे भैंस और उनके पड़वा पड़रु पन्द्रह-सोलह घंटे से कुछ अधिक समय तक गेरवा से बाँधे जाते हैं। उसके बाद जब उन्हें घाँस चराने जाते हैं तब भी लाठी लेकर उन्हें नियंत्रित रखते हैं। मतलब सारे पशुओं को सदैव नियंत्रण में ही रखा जाता है। एक समय सीमा के भीतर उन्हें थोड़ी आज़ादी मिलती है। होलिका दहन के बाद से बोवारा शुरू होने तक उन्हें उरला छोड़ दिया जाता है। फिर भी मैं लाठी लेकर बाहरा, नरवा या नदिया के आसपास ही रहता हूँ। क्योंकि उनके कहीं अन्य स्थान में भागने का, गुम होने का संदेह बना होता है। ये नियंत्रण केवल कारी, बुधवरिया, भूरी, मुरली और अन्य पशुओं पर ही लागू नहीं है बल्कि मुझ पर भी बराबर लागू है। यह बात अलग है कि मेरे गले की गेरवा और मेरे पीछे लगा लाठी आपको दिखाई नहीं दे रहा है मगर वास्तविकता दिखाई देने से भिन्न है।

          गले की गेरवा और मेरे पीछे लगा लाठी मेरे लिए, समाज के लिए या तथाकथित धर्म के लिए कितना आवश्यक है इसकी समीक्षा करना संभव है किसी सौ-पाँच सौ पन्नों की ग्रँथ में भी लिखा जा सके। समीक्षा के बावजूद सही निष्कर्ष निकलना भी शायद कठिन और विवादास्प्रद हो अर्थात सर्वमान्य हो। इसलिए गले की गेरवा और लाठी के सहारे नियंत्रित जीवन को बेहतर मान लेना मेरे लिए ही नहीं बल्कि आपके लिए भी अच्छा खासा मजबूरी है। मगर ख़्याल रखना मैं तो इस गेरवा और लाठी जैसे नियंत्रणकारी सिद्धांतों को कमजोर करने की सोच रहा हूँ। मेरा प्रयास है कि ये नियंत्रण मेरे मर्जी के बिना मुझ पर काम करे अर्थात “जिस बिंदु तक किसी दूसरे मनुष्य अथवा जीव-जंतु के अधिकारों का हनन होना संभाव्य है ठीक उसके पहले तक मुझे पूरी आज़ादी चाहिए।”

          आपको आश्चर्य हो रहा होगा कि मैं अपनी आज़ादी से परिचित नहीं हूँ मगर ऐसा क़दापि नहीं है। कुछ हद तक मैं अपनी आज़ादी जानता हूँ। मैं सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक रुप से आज़ाद हूँ, इसके अलावा मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी संविधान ने आज़ादी दी है अर्थात जितना आवश्यक है मुझे पूरी आज़ादी मिली है। मेरा मानना है भारतीय संविधान लागू होने के पहले मुझे, आपको और हमारे पूर्वजों को आधा प्रतिशत भी आज़ादी नहीं थी। स्वाभिमान से जीवन जीने के अधिकार की कल्पना करना भी प्रतिबंधित था। कबीला प्रमुख अथवा राजाओं के प्रसाद पर्यन्त ही हम सबका जीवन संभव था। भारतीय संविधान के माध्यम से अनेकों अत्यावश्यक आज़ादी मिलने के बावजूद मुझ पर, मेरी अज्ञानता और मूर्खता के कारण ग़ुलामी की कुछ बेड़ियाँ लगी हुई है। मेरी ये ग़ुलामी कुछ धुर्त लोगों की सोची समझी साजिश के तहत् है। जब तक आप समीक्षा नहीं करेंगे ग़ुलामी की ये बेडियाँ आपको दिखाई नहीं देगी। इसलिए थोड़ा समीक्षा जरूर करिये, ताकि आपको भी पता चले कि आप भी मेरी तरह ही ग़ुलामी की जंजीर से जकड़े हुए हैं।

          यदि मैं इन बेड़ियों का नाम उजागर करूँगा तो मुझ पर ये आरोप लगेंगे कि मैंने कुछ लोगों के आस्था को आघात पहुचाया है। इसलिए आपके किसी भी संदेह या प्रश्न का सीधा सच्चा जवाब नहीं दे रहा हूँ। आपके प्रश्नों का जवाब नहीं देना ही मेरे हिस्से का निर्णय है, यही मेरी सच्ची आज़ादी भी है। जबकि जिस कारण से जवाब नहीं दे पा रहा हूँ ये मेरी मानसिक ग़ुलामी का साक्ष्य भी है।

          मर्यादाओं के भीतर रहकर मुझे अपने बारे में बताने और समीक्षा करने का अधिकार है। इसके बावजूद यदि कोई कहे कि उनके आस्था और विश्वास को आघात पहुचा है तो ये बेड़ियाँ ही तो लगी है मुझ पर। ये ग़ुलामी ही तो है जो हमें दिखाई नहीं दे रही है।

          चलिए अपने आस्था और विश्वास के बारे में आपको कुछ बातें बताने का प्रयास करता हूँ। प्रयास इसलिए क्योंकि इसमें पूरी ईमानदारी है इसके बावजूद अधूरी समीक्षा आपसे शेयर कर रहा हूँ :-

          “मैं माता श्यामा देवी को जो मेरी जननी है, कुल देवी और गुरु मानता हूँ।” निःसंदेह यह सही और जायज है। आप भी इन्हें गुरु मान सकते हैं। क्योंकि इन्होंने हमें अनेकों बात सिखाई है जिसमें एक प्रमुख शिक्षा है “शिक्षा ग्रहण पहले और भोजन ग्रहण नहले।”

          अब यदि मैं माता श्यामा देवी को लेकर यह कहूँ कि माता श्यामा देवी आपकी भी कुलदेवी है। आपकी भी गुरु है। और आपकी भी जननी है। तो समझिए ये जो आपके हिस्से का मैं निर्णय ले रहा हूँ वही आपके और आपके पूर्वजों के साथ अन्याय है। आपके आस्था और धर्म पर मेरा अतिक्रमण है। मेरे द्वारा अपने धार्मिक आस्था और विश्वास को आपके लिए अनिवार्य करने का मेरा प्रयास नाजायज है। क्योंकि आप उनके संतान हैं ही नहीं तो वह आपकी जननी कैसे हो सकती है? फिर भी आपके ऊपर इस बात को थोप दिया जाए और आप भी उन्हें अपनी जननी मानने को राजी या मजबूर हो जायें तो आप आज़ाद नहीं हैं। क्योंकि तब आप अपनी वास्तविक जननी की उपेक्षा कर उनके साथ अन्याय कर रहे हैं।

          ख़्याल रखना माता श्यामा देवी की एक निर्धारित सीमा थी काम करने की। महिलाओं को आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से जीने की कला सिखाने की। इसके बावजूद उनके योगदान को असीमित क्षेत्रों के लिए बताकर यदि पूरे विश्व की लोगों के ऊपर थोप दूँ तो मैं गलत हूँ। यदि आप मेरे झाँसे में जायें तो यह और अधिक गलत होगा। गलत उनके साथ जो आपके सीमा-क्षेत्र के भीतर माता श्यामा देवी जैसे, उससे कम या अधिक योगदान दिए हैं। यदि मैं इस आत्मकथा में माता श्यामा देवी का वर्णन करूँ तो यह भी अन्याय ही था। माता श्यामा देवी के प्रति मेरा अहसान फरामोशी ही होता।

          पूज्यनीय श्री मालिक जोशी मुंगेली और कबीरधाम जिले के कुछ गाँव में शांति का संदेश देते थे। जिन गाँवों में उन्होंने लोगों को उनके आपसी विवाद से मुक्त कराया। वे उन्हें पिता के समान मानते हैं अधिकांश लोग उन्हें गुरू मानते हैं। यदि ये लोग अपनी धार्मिक आज़ादी के हवाले से अपने मालिक को पूरे विश्व के मनुष्य का पिता अथवा गुरू बताने का प्रचार करने लगें और एक दिन अचानक एक जागरूक बालक जो अमेरिका से है कह दे कि मालिक केवल कुछ सीमा क्षेत्र के लोगों के भले ही उद्धारक, संरक्षक और भगवान हो सकते हैं मगर उनके, उनके समाज और समूचे विश्व के अधिकतर लोगों के लिए कुछ नहीं किये हैं इसलिए वे मालिक को अपना पिता अथवा भगवान नहीं मानते हैं तो वह बालक बिल्कुल सही कह रहा है।

          सत्य बोलने के कारण यदि आपके जी में मिर्ची लग जाए और आप उनके ऊपर अपने आस्था और विश्वास को ठेस पहुँचाने का झूठा आरोप लगा दें तो आपकी ये बेवकूफी, मुर्खता और धूर्तता उस बालक के साथ अन्याय और उनके मानव अधिकारों का हनन है।

          आप उनके हिस्से का निर्णय लेकर उनके ऊपर बोझ थोप रहे हैं। आप बेजा कब्ज़ा कर रहे हैं। गुनाहगार आप हैं। और अमेरिका के उस बेगुनाह बालक को आरोपी बना रहे हैं। आपको बता दूँ कि मुझे अमेरिकी बालक नहीं बनना है इसलिए अपने हिस्से का निर्णय स्वयं लेने का पक्षधर हूँ। आपसे भी आग्रह है कि आप बेवकूफ बनने से ख़ुद को और अपने आने वाली पीढ़ी को बचा लें।

          लाला जोशी मेरे परदादा के पिता हैं। वे अत्यंत न्यायप्रिय और समानता के पक्षधर हुए। शीतलकुंडा (मुंगेली) के मालगुजार रहे। आसपास के लोग उनके धन और शक्ति से पोषित थे इसलिए आसपास के कुछ परिवार उन्हें अपना आराध्य मानते थे। जब टेसुआ नाला जो कवर्धा और मुंगेली के मध्य शीतलकुंडा के पास पड़ता है बरसात में बाढ़ आता तो वे अपने नौकरों के साथ स्वयं नाव लेकर चले जाते और लोगों को नदी पार कराते। जब नाव नहीं बनवाये थे तब वे रस्सी और बर्तन के माध्यम से नदी पार कराते थे। जो लोग बैल गाड़ी से आये होते या जिनके लिए नदी पार कर पाना संभव होता ऐसे लोगों को रात रुकने के लिए आश्रय और भोजन भी देते थे। आसपास के कुछ लोग उन्हें पालनहार, गुरु और भगवान कहते थे। मेरा भी धार्मिक आचरण उनसे प्रभावित है। इसलिए उन्हें गुरु मानता हूँ। मुझे अपने धार्मिक आस्था और विश्वास को प्रचारित करने का अधिकार है। इसलिए यदि उन्हें पालनहार और गुरु अथवा भगवान के रूप में प्रचारित करने लग जाऊँ तो आपको आपत्ति का अधिकार नहीं है।

          अच्छा प्रचार हो जाए तो संभव है कि भारत सहित अन्य देशों के कुछ लोग भी लालाराम जोशी को गुरु मानने लग जाएँ। मगर जो उन्हें नहीं मानते अथवा जो उनसे लाभान्वित अथवा प्रेरित नहीं हुए उन्हें अपने हिस्से के सत्य बोलने का भी अधिकार छीन लिया जाए तो क्या यह सही है? क्या उन्हें यह बोलने का अधिकार नहीं रहना चाहिए कि लालाराम केवल मुंगेली और कबीरधाम जिला के कुछ चंद लोगों के पालनहार थे। कुछ चंद लोगों के लिए ईश्वर थे। अधिकांश लोग उन्हें गुरु मानते हैं मगर मैं उन्हें गुरु नहीं मानूँगा क्योंकि मेरे लिए लालाराम ने कुछ नहीं किया है।

          मुझे लगता है ये तीन कहानियाँ पर्याप्त है आपके भ्रम को तोड़ने के लिये। मेरा यह विश्वास है कि आप तर्कवान हैं इसलिए ये कहानियाँ आपको समझाने में सफल रहा है कि आप अपने हिस्से के धार्मिक आध्यात्मिक सहित अधिकतर निर्णय स्वयं लें। यदि आप मुझसे असहमत हैं तो आप भी माता श्यामा देवी, मालिकराम जोशी और लालाराम जोशी को अपनी जननी, गुरू, पालनहार, भगवान और ईश्वर मानने की मुर्खता कर लीजिये। चाहे आप किसी भी सीमा क्षेत्र, देश या किसी भी ग्रह के कोई भी जीव या निर्जीव हों।

          आपको बता देना चाहता हूँ अभी ख़ासकर टेलीविजन चैनल्स और सोशल मीडिया साइट्स के कारण जो धार्मिक आस्था का कारोबार है उसका दायरा बहुत आगे और अतिशयोक्तिपूर्ण तरीके से बढ़ चुका है। इसलिए जो आपके आस्था के योग्य नहीं, कहीं वह भी आपके आस्था और विश्वास का हिस्सा तो नहीं हो गया, थोड़ा जांच लीजिए।

          कहीं दीगर देश या दीगर ग्रह में जन्में, पले बढ़े और संकुचित रहने के बावजूद आप लालाराम जोशी, माता श्यामा देवी और मालिकराम जोशी को अपना सब कुछ तो नहीं मान बैठे? यदि ऐसा है तो ज़रा समीक्षा करिये अपने आस्था और विश्वास का। मेरे द्वारा फैलाये अफ़वाह के झाँसे में मत आईए। अपने आदर्श ख़ुद चुनिए। अपना गुरु ख़ुद बनाइए। अपना ईश्वर ख़ुद तय करिये।

          अपनी जननी उन्हें मानिए जिन्होंने आपको और आपके पूर्वजों को जन्म दिया हैं। अपना गुरु उन्हें मानिए जो आपको ज्ञान दिए और देते हैं। अपना गुरु उन्हें मानिए जो आपको रास्ते दिखाते हों। अपना पालनहार उन्हें मानिए जो आपको प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भोजन, आवास अथवा अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हों। आप अपना ईश्वर उन्हें मानिए जिन्होंने आपको जन्म दिया, पाला पोसा बढ़ाया अथवा आपकी जानमाल की कभी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से रक्षा किया हो। सेना, सशस्त्र बल और पुलिस के जवान, वैज्ञानिक, किसान और डॉक्टर को अपना संरक्षक, आराध्य, भगवान, ईश्वर मानिये।

          आप आज़ाद हैं। अपने स्वयं के लिए धार्मिक सिद्धांत बनाने के लिए। आप आज़ाद हैं किसी भी दूसरे के द्वारा बनाये गये सिद्धांत को मानने के लिए। आप आज़ाद हैं मेरे झाँसे में आकर फँसने के लिए। आप आज़ाद हैं मेरे धार्मिक आस्था को अस्वीकृत करने के लिए। इसके बावजूद आपसे अनुरोध है कि आप अपने आज़ादी की भरपूर और ईमानदारी से इस्तेमाल करिये। मेरे और मुझ जैसे षड़यंत्रकारियों के बेईमानी में मत उलझिए। मेरे जैसे अनेकों लोग हैं जो अपने गणित में आपको उलझा रहे हैं। मेरे जैसे अनेकों कुटिल लोग हैं जो झूठे आदर्श और झूठे सिद्धांत से आपको लाद रहे हैं। पाट रहे हैं।

          समीक्षा करिये। जाँचिये। जो आवश्यक और उचित हों उन्हें आत्मसात करिये और जो आपको उचित नहीं लगते उन्हें त्याग दीजिये। जो तिरस्कार योग्य हैं उन्हें मत ढ़ोइये।

          दूसरे के बनावटी झूठी और अफवाह बातों में आकर मत फँसिये। अपने हिस्से के हर संभव निर्णय स्वयं लीजिये। मैं भी ऐसा ही कर रहा हूँ। मैं अपना आँख खोल रहा हूँ तो समझ में रहा है मेरे शरीर, घर और आंगन में ढेरों कचरे पड़े हुए हैं। सफाई के लिए अपना झाड़ू ख़ुद पकड़ लिया हूँ। माँ और विधि अपने-अपने हिस्से के कचरे साफ करती हैं। घर आँगन तो कचरामुक्त हो चुका है। मगर मेरे अपने शरीर के भीतर के कचरे मुझे ख़ुद ही साफ करने हैं।

          घर के सजावट में कई बार दुर्गम्या और तत्वम् भी सहयोग करते हैं। वे सफाई के लिए झाड़ू पोछा भी पकड़ लेते हैं। मगर अपने हिस्से का सफाई मुझे ही करना है। अपने बालकनी और बरामदे में हमने कुछ हरे और फूलदार पौधे लगा रखे हैं। पीपल और तुलसी के भी पौधे लगाए हैं। आम, काजू और अनार भी लगाए हैं। पीपल और तुलसी के बारे में मुझे ऐसा जानकारी है कि ये चौबीसो घंटे ऑक्सीज़न अर्थात प्राणवायु देते हैं। अन्य पेड़-पौधों की अपेक्षाकृत वातावरण को अधिक शुद्ध करते हैं। मगर जब उनके पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं तो कचरे फैलाते हैं। इसलिए गिरे हुए पत्ते फेंक देते हैं। ठीक आम, काजू और अनार के साथ है। ये हमें फल देते हैं मगर जब फूल या पत्ते गिर जाते हैं तो गिरे हुए पत्ते और फूल हमारे लिए व्यर्थ होते हैं। आप चाहें तो इन बेकार पत्ते और फुलों से आर्गेनिक खाद बना सकते हैं, जो जीवन दायिनी साबित हो सकती है।

          सदाबहार के फूल देखने में अत्यंत मनमोहक होते हैं। हम सबको, पूरे परिवार को पसंद है। मगर जैसे ही फूल गिरकर गमले में जाये और एकाध सप्ताह उसकी सफाई किया जाए, केवल पानी ही डाला जाए तो हजारों जीवाणु पैदा हो जाते हैं। कीड़े बिनबिनाते रहते हैं। इसलिए सफाई अभियान चलाइये। सफाई करिये। अनावश्यक वस्तुओं और सिद्धांतों का त्याग करिये। अपनी उपयोगिता ख़ुद तय करिये। अपने हिस्से का निर्णय स्वयं लीजिये।

          मैं अपनी धर्म, अपनी जाति और अपना वर्ण स्वयं निर्धारित करूँगा। दूसरे के थोपे गये को नहीं अपनाऊँगा। कोई भी व्यक्ति अथवा धार्मिक नेता अपनी धार्मिक आस्था और विश्वास मुझ पर नहीं थोपेगा। क्योंकि अपनी धर्म और अपनी धार्मिक सिद्धांत तय करने में मैं सक्षम हूँ।

          वह चाहे कोई भी हो, मेरे लिए ईश्वर अथवा गुरु तय नहीं कर सकेगा। मैं उन्हें ईश्वर मानूँगा। उन्हें गुरु मानूँगा। जो वास्तव में उसके लायक मेरे दृष्टिकोण में हों। क्योंकि “मैं जानता हूँ जो मेरा पिता है, वह आपका पिता नहीं है। जो मेरी माता है वह आपकी जननी नहीं है। ठीक वैसे ही आपके आराध्य मेरे लिए आराध्य नहीं हैं। अपना ज्ञान और अपनी बुद्धि अपने लिए चलाइये मेरे लिए आपको बुद्धि खपाने की कोई जरुरत नहीं है। आपसे पुनः कह देता हूँ मैं काबिल और सक्षम हूँ इसलिए मैं अपना रास्ता खुद बना सकता हूँ अपनी धर्म, धर्मगुरु और ईश्वर भी तय कर लूंगा।” ‘मैं जानता हूँ कि मेरा बुद्धिमान और तर्कवान होना आपके लिए दुर्भाग्य की बात है क्योंकि मैं आपके षड़यंत्र का शिकार होने वाला नहीं हूँ।’         

          अंत में एक साक्ष्य और दे देता हूँ कि, आपके आराध्य मेरे आराध्य क्यों नहीं हैः- जिला मुख्यालय मुंगेली के पास ही शीतलकुंडा नामक एक गाँव है। वहाँ सड़कपारा के कुछ परिवार को छोड़ दें जिसमें दीगर जाति के कुछ लोग रहते हैं तो शेष सभी परिवार दसरू सतनामी के वंशज हैं। वर्तमान में दसरू सतनामी के वंशज मनकी और नवागांव ठेल्का में भी हैं। इसके अलावा बेटियाँ कुछ दर्जनों गाँव और शहरों में व्याह कर गई हैं जहाँ उनके हजारों संतान हैं। जिसमें से अधिकतर आज भी शीतलकुंडा आते हैं कई बार ख़ासकर दुख के कार्यक्रम में, केवल परिवार के हजारों पारिवारिक सदस्य शामिल होते हैं। वर्तमान में उन सबके लिए मेरे बड़े दादा श्री सालिक जोशी ज्येष्ठ और पूज्यनीय हैं। इसलिए भांजे-भांजी और बहुओं (रिश्ते में भाई की पत्नी) को छोड़ दें तो सारे के सारे लोग उनके चरण स्पर्श करते हैं।

          मतलब ये कि मेरे बड़े दादा सालिक जोशी हम सबके पूज्यनीय हैं। हजारों लोगों के पूज्यनीय हैं। तो क्या आप भी उन्हें पूज्यनीय मानकर मेरे जैसे दंडवत् होने पर गौरव करेंगे? उत्तर होगा- ‘‘नहीं’’ क्योंकि आप तो दसरू सतनामी के संतान हैं और तो उनके उत्तराधिकारियों के। ठीक दसरू सतनामी के 100-200 जनरेशन ऊपर के मानस मुखिया तत्वमादित्य के लाखों संतान होंगे। अर्थात् तत्वमादित्य हम लाखों संतानों के पुरखा हैं। जनक हैं। आराध्य हैं। भगवान हैं। मगर आपके नहीं। इसके बावजूद आपसे कहूँ कि तत्वमादित्य आपके भी भगवान हैं। तो क्या आप उन्हें अपना जनक, अपना पुरखा या अपना भगवान मान लेंगे? पुनः उत्तर होगा - ‘‘नहीं’’ ठीक वैसे ही ‘जिसे आप भगवान कहते हैं और भगवान समझते हैं, वो सभी मेरे लिए भगवान नहीं हैं, मेरा पुरखा नही हैं और न तो मेरे लिए पूज्यनीय हैं।’ ऐसा कहना यदि मेरी दूषित मानसिकता है। मेरा पागलपन है। तो आप धार्मिक हैं ? फिर मेरे मानस मुखिया तत्वमादित्य को, दसरू सतनामी, लालाराम जोशी, त्रिभूवन जोशी, माता श्यामा देवी और मालिक राम जोशी को अपना भगवान, अपना पुरखा, अपना जनक स्वीकार करके मेरी मानसिकता को साफ करने की शुरूआत दीजिए। 

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