नारायणपुर पुलिस द्वारा फिल्मांकित हल्बी गीत ‘‘प्रशासन करे दे रक्षा’’ रिलिज, सोशल मीडिया में जमकर हो रहा है वायरल, देखने के लिए अभी क्लिक करें.........


‘‘प्रशासन करे दे रक्षा’’ एक हल्बी गीत है, जिसे नारायणपुर पुलिस द्वारा तैयार कराया गया है। इस गीत के गीतकार श्री मोहित गर्ग (आईपीएस) पुलिस अधीक्षक, नारायणपुर हैं। इस गीत के माध्यम से सरकार और पुलिस द्वारा आम नागरिकों के लिए उपलब्ध कराये जा रहे मूलभूत कल्याणकारी सेवाएं जैसे राशन, चिकित्सा, शिक्षा, बिजली, पानी, सड़क और सुरक्षा सहित पुलिस तथा केन्द्रीय बलों द्वारा सिविक एक्शन के तहत नक्सल प्रभावित क्षेत्र के लोगों को उपलब्ध कराये जा रहे आवश्यक संसाधनों को फिल्मांकित किया गया है।

आपसे अनुरोध है कि इस विडियो को सोशल मीडिया के माध्यम से अधिक से अधिक लोगों को शेयर करें, ताकि नक्सलियों को आत्मसमर्पण के माध्यम से समाज के मुख्यधारा में जोडने का हमारा प्रयास सार्थक हो सके।

उल्लेखनीय है कि इस गीत के निदेशक प्रवीण सलाम और उनके साथी अमित सरकार, स्वाती पट्टावी और दिलीप निर्मलकर हैं तथा गायक-गायिका दीपक, सुखदेव, राजू बघेल, रस्सु, प्रियंका और शिवानी हैं। गीत में केमरामेन नागेश मण्डावी है और म्यूजिक परवेज खान का है। गीत रचना में शानू, संतोष और राजू ने श्री गर्ग का सहयोग किया है। वहीं मुख्य कलाकार के रूप में कन्हैया वैष्णव और निकिता उर्वशा ने अपना रोल निभाया है सहयोगी कलाकार के रूप में जीत बघेल, हरिश उईके, पिताम्बर, दिव्यांशू, दिमेश्वरी यादव, दिव्या मानिकपुरी, प्रियंका उसेण्डी, सीखा साहू, बेबी यादव, अर्पण, आदि और शांतनु ने भी काम किया गया है।





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जीवन का रिसेट बटन नहीं होता और न तो टाइम मशीन जैसी कोई मशीन होती है इसलिए जीवन के सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता में रखें..... प्लीज Covid-19, कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने का प्रयास करें : HP Joshi

जीवन का रिसेट बटन नहीं होता और न तो टाइम मशीन जैसी कोई मशीन होती है इसलिए जीवन के सुरक्षा को प्रथम प्राथमिकता में रखें..... प्लीज Covid-19, कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने का प्रयास करें : HP Joshi

साथियों जैसा कि आपको ज्ञात है इस बार के Covid-19 कोरोना वायरस पिछले बार के कोरोना वायरस से अधिक घातक है जो पिछले बार के वायरस से अधिक तीव्र गति से प्रसार कर रहा है। इसका मतलब ये कि हमें पिछली बार से अधिक सतर्क रहने की जरूरत है, हम सबने पिछले बार वायरस संक्रमण के प्रसार को रोकने के लिए अपना अहम भूमिका निभाते हुए खुद को इसके संक्रमण से बचाया। आप सबने आपदा को अवसर न बनाते हुए जरूरतमंद लोगों की सहायता भी की थी इसबार भी हमें इसके लिए तैयार रहना होगा।

"जान है तो जहान है।" इस बात को गांठ बांध कर रख लीजिए क्योंकि अभी इस संक्रमण काल में इससे बड़ा धार्मिक नियम, शिक्षा, ज्ञान और संयम कुछ भी नहीं है।

मेरे प्यारे देशवासियों आपसे अनुरोध है प्लीज वायरस के संक्रमण से खुद बचें और दूसरों को भी बचने के लिए अपील करिए। चिन्हांकित अस्पताल में Covid-19 से बचाव के लिए टीकाकरण हो रहा है, जब भी आपकी बारी आए टीकाकरण जरूर कराएं। साथियों भारत में बने टीकाकरण अत्यंत सुरक्षित है, टीकाकरण करवाने के बाद आप Covid-19 के संक्रमण से लड़ने में सक्षम हो सकते हैं, संभव है आपको कोरोना संक्रमण भी न हो।

यदि आपने Covid-19 टीकाकरण करा लिया है तब भी सुरक्षा मापदंडों का पालन अवश्य करें क्योंकि संभव है इसके बाद आपको संक्रमण न हो अथवा होने पर भी ये वायरस आपके लिए जानलेवा न भी हो मगर आपको इस बात का ख्याल रखना होगा कि यदि आप संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आएंगे तो कोरोना वायरस के वाहक के रूप में काम करते हुए अन्य लोगों जिसमें आपके पारिवारिक सदस्य, नजदीकी रिश्तेदार और कार्यालयीन स्टाफ शामिल हैं के लिये खतरनाक हो सकते हैं।

Covid-19 के संबंध में सरकार और विशेषज्ञों द्वारा जारी सुरक्षा मापदंडों का अनिवार्य रूप से पालन करें, सोशल मीडिया साइट्स में उपलब्ध अफवाहों के झांसे में आकर इसे हल्के में न लें अथवा एक्सपेरिमेंट न करें; क्योंकि ऐसा करना न सिर्फ आपके लिए बल्कि आपके परिवार के अन्य सदस्य और स्टाफ के लिए जानलेवा साबित होगा।

अंत में एक बार फिर से अनुरोध है कृपया Physical Distancing का पालन करें, Face Mask पहनें और साबुन अथवा Sanitizer से हाथों का Sensitization करते रहें।

HP Joshi
Narayanpur (Chhattisgarh)
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बस्तर के मेरे प्यारे नक्सली भाईयों प्लीज क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर...... आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनो, देश के शीर्ष अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनो: श्री एच.पी. जोशी

बस्तर के मेरे प्यारे नक्सली भाईयों प्लीज क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर...... आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनो, देश के शीर्ष अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनो: श्री एच.पी. जोशी

दोस्तों आपको बता दूं कि ‘‘लोकतंत्र में हथियार उठाना कायरता की मिशाल है।’’ आपके शीर्ष लीडर अपने नाम बदलकर अरबपति का जीवन जी रहे हैं और उनके बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं जबकि आप जैसे आम जनता को ये लागे गुमराह करके आपके शोषण करते हैं..... आपको सरकार में होना चाहिए और ये आपको ही सरकार के खिलाफ नक्सली बना रहे हैं।

वास्तव में हथियार उठाना कायरता और बुझदिली की निशानी हैं इसलिए आपसे निवेदन है कि आप आत्मसमर्पण करें और लोकतंत्र में भागीदार बनकर सिस्टम सुधार के जनक बनें। नक्सलवाद को बढ़ावा देने वालों का सदैव आरोप रहता है कि सरकारी तंत्र उन्हें उपेक्षित रखता हैं उन्हें समुचित संवैधानिक अधिकार नहीं देता तो यह झूठ है क्योंकि संविधान में सरकार का दायित्व निर्धारित कर दिया गया है कि सरकार देश के सभी नागरिकों को उनके अधिकारों को प्रदान करे, इसके लिए बाकायदा न्यायालय और मानव अधिकार आयोग भी है जो नागरिकों के सभी अधिकार को समान रूप से संरक्षित करते हैं, यदि आपको भी कोई समस्या है तो आम जनता की भांति न्यायालय की शरण में चलो।

खूनी आतंक के पर्याय बन चुके नक्सलियों के शीर्ष नेताओं को पता है कि इन हिंसा और उपद्रव से उन्हें आर्थिक लाभ मिलता रहेगा इसलिए नीचे के छोटे मोटे नक्सली अर्थात हथियारबंद नक्सलियों को देश के वीर जवानों के खिलाफ छल कपट से लड़ने के लिए उकसाते हैं।

आपके बड़े लीडर के बच्चे विदेशों में पढ़ते हैं, गोपनीय और अनगिनत नामों से नक्सली बनकर न केवल आम जनता को बल्कि आपको भी लूटने वाले ये लोग अरबपति बनकर बड़े ठाठ की जिंदगी जी रहे हैं आपका ब्रेनवॉश करके ये आपका शोषण कर रहे हैं और आपको आपके ही हाथों मानव अधिकारों से वंचित रहने को मजबूर कर रहे हैं। आपको बता देना चाहता हूं कि आप आत्म समर्पण करके सबसे अच्छे, सुविधायुक्त और ठाठ के जीवन जी सकते हैं जिसपर आपका पूरा अधिकार है, संभव है आपको मेरे बातों पर विश्वास न हों इसलिए आपसे विनती है अपने आसपास के आत्म समर्पित नक्सलियों और आपके जीवन की तुलना करके देख लीजिए। कभी आपके साथ घोर जंगल, पहाडी में भटकने वाला इंसान सुख से अपने परिवार के साथ अपना जीवन व्यतित कर रहे हैं।

मेरे बस्तर के मूल निवासी भाईयों आप लोगों को समझना होगा कि किस तरह से ये लोग आपके शोषण करने में लगे हैं और कैसे बड़े चालाकी से आपको आपके परिवार, समाज और देश के खिलाफ कर चूके हैं। आपको समझना होगा, आपको जागरूक होना होगा, जितना जल्दी हो सके आपको अपने शीर्ष लीडर के चालाकी और मानसिकता की समीक्षा करके आत्मसमर्पण करना होगा और लोकतंत्र में भागीदार बनकर, चुनाव लड़कर, स्थानीय जनप्रतिनिधि, विधायक, सांसद और मंत्री बनकर अपने लोगों को विकास की नई दिशा दिखाना होगा उन्हें शिक्षा और उच्च शिक्षा के माध्यम से स्वयं और अपने बच्चों को आईएएस, आईपीएस जैसे शीर्ष अधिकारी बनाना होगा।

आपको पता होनी चाहिए कि नक्सली बनकर आप बेहतर जीवन की कल्पना भी नहीं कर पा रहे हैं जबकि आमतौर पर हर नागरिक को बेहतर जीवन के लिए सारे आवश्यक अवसर उपलब्ध हैं। सरकारी तंत्र हर प्रकार के सुविधाओं जैसे निःशुल्क आवास, निःशुल्क राशन, निःशुल्क चिकित्सा, निःशुल्क शिक्षा, निःशुल्क स्कील, निःशुल्क सुरक्षा और निःशुल्क कानूनी संरक्षण उपलब्ध कराता है जबकि आप नक्सली बनकर अपने इन अधिकार से वंचित दशहत, डर और भययुक्त जीवन को अपना साथी समझ बैठे हैं। आप सिस्टम में वापस आईये फिर आपको यदि लगेगा कि आपके साथ आपके लोगों के साथ अन्याय हो रहा है तो अभिव्यक्ति की आजादी का लाभ उठाईये, सरकार से लोकतांत्रिक तरीके से मांग करिए।

आपको गुरू घासीदास बाबा के बारे में जानना होगा जिन्होने कहा है कि सभी मनुष्य एक समान हैं। आपको इस बात को भी जानना होगा कि हर मनुष्य भाई बहन के समान हैं। मैं आपसे फिर से अपील करता हूं कि आओ, लोकतंत्र में अपनी सक्रिय भूमिका का निर्वहन करते हुए अपने हक और अधिकार को हासिल करो, मरना या मारना इसका कोई विकल्प ही नहीं है। आप जिन सशस्त्र बल, पुलिस और सहायक सशस्त्र बल के जवानों से लड़ रहे हो, जिन्हें शहादत के लिए मजबूर कर रहे हो वे सब आपके बचपन के साथी या भाई ही हैं। आपके सामने ऐसे दर्जनों अवसर भी आये हैं जब आपके बंदूक के निशाने पर आपके ही भाई बहन होते हैं, आपके नक्सली लीडर आपके परिवार के सदस्यों के ऊपर मुखबिर होने का झूठा आरोप लगाकर आपसे ही मरवा देते हैं और आप उनके झांसे में आकर आपके अपने परिवार और रिश्तेदारों की भी कत्ल कर जाते हैं। आपको एक बार अपने आंखों के चश्मे उतारकर अपने और आम जनता के जीवन शैली की समीक्षा करनी होगी, तब समझ में आएगा कि उन्होनें आपको कितने गहरे पानी रखे हैं। थोड़ा अपने घर परिवार को झांक कर तो देखो और बताओ आपके पास कितने मोबाइल फोन है, कितने लेपटॉप है, कितने टेलीविजन है, कितने सोफा, कितना पलंग, कितने दीवान, कितने आलमारी और कितने लॉकर है?

नक्सली भाइयों मेरा आपसे कुछ प्रश्न है :-
1- क्या कभी आपने बिना भय के जीवन जीया है?
2- क्या कभी बिना हथियार के खुद को सुरक्षित पाते हो?
3- क्या आप नक्सली बनने के बाद सुख, चैन के साथ परिवार के साथ जीवन का आनंद ले पाते हो?
4- क्या आपके नक्सली लीडर आपको वैवाहिक जीवन, परिवार और अच्छे आवास की व्यवस्था उपलब्ध करा सकते हैं?
5- क्या आपने कभी अच्छे और मनचाहे कपड़े कभी पहना है?
6- क्या कभी मनचाहे पर्यटकों में घूमने का अवसर पाया है?
7- क्या कभी शहरों में जाकर मॉल, शॉपिंग मॉल, सिनेमाघर, सर्कस, मेला, उद्यान और चौक चौपाटी में जीवन का आनंद लिया है?
8- क्या कभी आप अपने परिवार और समाज के साथ कहीं पिकनिक या टूर में गया है?
9- क्या नक्सली बनने के बाद आपको किसी पारिवारिक सदस्यों, समाज या सरकार ने कभी सम्मानित किया है?
10- क्या आपको नहीं लगता कि आप भी मंत्री बनें, संसद या विधायक बनें?
11- क्या कभी आपने अपने परिवार के साथ एसी, कूलर लगे घर जिसमें सोफा हो, बड़ा सा महाराजा सेट वाला पलंग और लाइव टेलीकास्ट हो रहे टेलीविजन के सामने अपने परिवार के साथ मिलकर चाय नाश्ता और भोजन किया है?
12- क्या कभी आपने परिवार के साथ कुछ फ़िल्म, कुछ सीरियल, रोमांटिक गानें और मजेदार चुटकुले सुना है?
13- क्या आपको आपके लीडर जैसे सुविधाएं मिलती है; क्या आपके बच्चे आपके लीडर के बच्चों के बराबर उनके साथ उनके स्कूल कॉलेज में पढ़ते हैं?
14- क्या आपको और आपके बच्चों को विभिन्न भाषाओं को पढ़ना लिखना आता है? पढ़ना लिखना नहीं आता इसीलिए तो आपके लीडर आपको बेवकूफ बनाकर मजा कर रहे हैं।

मुझे विश्वास है इन चंद प्रश्नों के लिए आपका हर जवाब 'नहीं' में होगा, मैं जानता हूँ आपसे सैकड़ों ही नहीं हजारों प्रश्न भी करूँगा तो भी आपके सारे जवाब 'नहीं' में ही रहेगा। इसलिए यदि आपको जीवन का असली आनंद लेना हो तो आओ हिंसा को त्याग कर हमारे साथ जीवन का आंनद लीजिए... सुखद जीवन के लिए हिंसा का रास्ता छोड़ दो, प्रेम और सद्भावना को अपने जीवन में स्थान दो। आपके ईश्वर ने आपके आराध्य ने और आपके माता पिता ने आपको सुख सुविधाओं से युक्त सुखद जीवन जीने के लिए जन्म दिया है इसलिए जीने का आनंद लो। आइए क्रूरता, हत्या और मृत्यु का रास्ता छोड़कर, नक्सली लीडरों के चमचागिरी को त्यागकर अच्छे जीवन का विकल्प चुने...... आत्मसमर्पण करके आम नागरिक बनें, अधिकारी, जनप्रतिनिधि, मंत्री और जज बनें।
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वन्य क्षेत्रों में जल की उपलब्धता पर आधारित "मंकी सिंह की कहानी"

बंदर मंकी सिंह की आपबीती कहीं आपकी न हो जाए, इसलिए जल का संरक्षण करें... वन्य जीवों के लिए पर्याप्त जल और वृक्षों की उपलब्धता किस तरह सुनिश्चित किया जाए इसे जानने के लिए मातृका दीदी की सुझाव जरूर पढ़िए...

"मंकी सिंह की कहानी"

एक बार की बात है दो बहनें मातृका और दुर्गम्या Morning Walk पर जा रही थी तभी उन्होंने देखा सड़क किनारे बंदर मंकी सिंह अलसाया हुआ, दुःखी और निराश बैठा है।

मातृका दीदी बंदर के पास जाकर पूछती है: क्यों भाई मंकी सिंह आप परेशान और चिंतित क्यों बैठे हैं?

मंकी सिंह ने जवाब दिया: मातृका दीदी, "क्या आपको पता कि जंगलों से सारे फलदार और इमारती ही नहीं वरन अन्य वृक्षों को भी काटकर समाप्त कर दिया गया है जिसके कारण जंगलों के लगभग सारे जलस्रोत भी सूख चुके हैं।" भोजन और पानी के अभाव में जंगल के सारे जीवों के जीवन खतरे में पड़ गया है, यदि यही स्थिति रही तो सारे जंगली जानवर जल्दी ही मर जायेंगे।

मातृका दीदी: ओह! आप ये क्या कह रहे हैं मंकी सिंह?

मंकी सिंह: सही बता रहा हूँ मातृका दीदी, मेरा ही दुर्भाग्य देखिए भूख प्यास के कारण मेरे माता-पिता, पत्नी और बच्चे सहित मेरा पूरा परिवार मर गया है, इसलिए मैं दुःखी हूँ।

दुर्गम्या अपने बैग से Bottle निकालती है और मंकी सिंह को पीने के लिए देते हुए कहती है: मंकी सिंह आप भी बहुत भूखे प्यासे लग रहे हैं, थोड़ा पानी पी लीजिए फिर मेरे घर चलकर मेरे साथ भोजन ग्रहण कर लेना।

मंकी सिंह Bottle वापस करते हुए कहता है: नहीं दुर्गम्या दीदी मेरे परिवार के सारे सदस्य तो मर गए हैं फिर मैं जी कर क्या करूँगा कहते हुए फफककर रो पड़ता है।

मातृका दीदी मंकी सिंह के आँसू पोछती है और उसके शिर में हाथ फेरकर उन्हें समझाते हुए कहती है: भाई मंकी सिंह हम आपके परिवार तो आपको लौटा नहीं सकते मगर हम पर भरोसा रखो, हम प्रयास करेंगे कि अब जंगल के कोई भी जीव भूख और प्यास के कारण नहीं मरेगा और जंगल में फिर से खुशहाली वापस लौट आएगी।

दुर्गम्या दीदी मातृका दीदी के बातों का समर्थन करते हुए कहती है: भाई मंकी सिंह, हम प्रयास करेंगे कि जंगल फिर से आप सबके रहने योग्य और सुरक्षित हो जाए।

ये सुनकर थोड़ी ही देर में मंकी सिंह Bottle का ढक्कन खोलता है और एक ही घुट में पूरे पानी ढक कर जाता है और बोलता है: ThankYou दीदी।

तभी दुर्गम्या दीदी नौटंकी करते हुए कहती है: देखो न मातृका दीदी भाई मंकी सिंह ने तो मेरे Bottle के सारे पानी पी लिया.... उहू उहुँ कहते हुए रोने लगती है।

दुर्गम्या दीदी के नखरे देखकर मंकी सिंह और मातृका दीदी जोर से हस पड़ते हैं,उसके बाद तीनों वापस घर आ जाते हैं, आंगन में लगे आम फल की लालच मंकी सिंह को पेड़ में चढ़ने पर मजबूर कर देता है, मंकी सिंह आज खूब आम खाया और उसके बाद उछल कूद मचाते हुए कुछ आम नीचे आंगन में ही गिरा देता है इसे देखकर दुर्गम्या दीदी गुस्से में आ जाती है और बोलती है मंकी सिंह आखिर तुम बंदर ही रहोगे..... गुलाटी मारना कभी नहीं छोड़ोगे.....। मंकी सिंह नीचे आकर माफ़ी के भाव से बोलता है: Sorry Durgamya Joshi, फिर तीनों घर के भीतर प्रवेश करते हैं Cooler चालू करके चर्चा करने लग जाते हैं कि कैसे हम जंगलों में पर्याप्त मात्रा में पानी और जंगली जानवरों के लिए भोजन सुनिश्चित कर सकते हैं।

दुर्गम्या दीदी चर्चा का शुरुआत करते हुए बोलती है: हम सरकार से आग्रह करेंगे कि सरकार वन क्षेत्र में अधिक से अधिक बांध और चेकडैम बनवाये, जहाँ बांध और चेकडैम संभव न हो वहां पर तालाब अथवा डबरी का निर्माण करवाए।

मंकी सिंह: दुर्गम्या दीदी यह सबसे बेहतर उपाय है परंतु इसमें तो सरकार को भारी लागत लगाना पड़ेगा, ऊपर से अधिकतर बांध और चेकडैम विवादित भी हो जाते हैं। बांध बन भी गया तो लोग बांध के चोरों तरफ पिकनिक स्पॉट बनाकर जंगली जानवरों के लिए फिर से उसे प्रतिबंधित कर देते हैं। कुछ तालाब और डबरी तो शिकारी जानवरों के ही कब्जा में होता है जिसके कारण भूख प्यास मिटाने के नाम पर अधिकतर जीव उन शिकारी जानवरों के भोजन बन जाते हैं।

दुर्गम्या दीदी: तो हम इसके लिए बेहतर विकल्प के रूप में क्या कर सकते हैं मातृका दीदी?

मातृका दीदी: अच्छा है, कोई बात नहीं, हमारे पास इससे सरल, सहज, सस्ते और आसान परन्तु बेहतर उपाय है जिससे हम जंगल के हर स्थान में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं।

दुर्गम्या दीदी: वो कैसे दीदी?

मातृका दीदी: आप सबको तो पता है कि वन क्षेत्र में भी पहले से ही पर्याप्त संख्या में तालाब, डबरी और छोटे बड़े नाला उपलब्ध है; हम उन सारे स्थानों में ट्यूबवेल खोदाई करके उसमें सोलर पंप लगवा कर पानी की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं फिर प्यास के कारण कोई भी जीव मरेगा नहीं।

मंकी सिंह: ये तो बेहतर उपाय है मातृका दीदी। मगर एक समस्या उन जीवों के लिए स्थिर बनी रहेगी जो अधिकतर समय पर्वतों में रहते हैं। जब गर्मी के दिनों में उन्हें प्यास लगती है तो वे नीचे आकर पानी पीते उसके पहले ही उनके जान गले से आ निकलती है, मुश्किल से प्यास बुझ भी गई तो फिर से पहाड़ी के ऊपर चढ़ने में उन्हें पुनः प्यास लग जाती है। मातृका दीदी कई जंगली जानवर तो पर्वत श्रृंखलाओं के उस पार होते हैं उनके लिए क्या कुछ बेहतर व्यवस्था सोची जा सकती है?

मातृका दीदी: क्यों नहीं; हम ऐसे पर्वत श्रृंखलाओं के बीच वाले पर्वत के ऊपर ही ट्यूबवेल और सोलर एनर्जी के माध्यम से पानी उपलब्ध करवा सकते हैं जो नीचे की ओर छोटी सी झरना की भांति झरती रहेगी फलस्वरूप अलग अलग श्रेणी के जानवर एक ही समय में पानी पी सकेंगे इसके साथ ही पर्वतीय क्षेत्रों के वृक्षों को भी जीवित रखने में लाभदायक हो सकेगा।

दुर्गम्या दीदी: मातृका दीदी हम मंकी सिंह के लिए उन स्थानों में आम और अन्य फलदार वृक्ष जरूर लगाएंगे; ताकि मंकी सिंह हमारे घर, आंगन, बाड़ी और खेतों के फसल, फल और पेड़ को बर्बाद करने न आएं।

मंकी सिंहः दुर्गम्या दीदी, हम जानवर तो खुद को जंगलों में ही सुरक्षित और बेहतर समझते हैं, आबादी क्षेत्र में आना हमारे लिए अत्यंत खतरनाक और जानलेवा होता है क्योंकि कई गांव और शहर में हमारे साथी जानवरों को भरमार बंदूक का शिकार होना पड़ता है।

चर्चा समाप्ति के बाद मातृका दीदी टेबल में रखे अपने स्मार्टफोन को उठाती है और सोशल मीडिया साइट्स के माध्यम से दोस्तों और सरकार से अपील करती है : "प्लीज सर.... प्लीज दोस्तों.... वनों और पर्वतीय क्षेत्रों में जल की उपलब्धता सुनिश्चित करने में अपना योगदान दीजिए, क्योंकि जंगलों और पर्वतों में पानी और फलदार वृक्षों की जरूरत न सिर्फ मंकी सिंह और अन्य जंगली जीव के आवश्यक है वरन समान रूप से हम सभी मनुष्यों के लिए भी आवश्यक है।" आपको याद दिला देना चाहती हूँ कि पारिस्थितिकी तंत्र के सारे जीव के लिए सबसे पहली प्राथमिकता जल और भोजन है, सबसे खास बात तो ये है कि जैव विविधता के बिना हम मनुष्यों के जीवन की भी कल्पना नहीं की जा सकती।

वृक्ष, वन और जल एक दूसरे के पूरक और एक दूसरे पर निर्भर है, आप सबको तो पता ही है कि जल बिना किसी भी जीव की जीवन संभव नहीं है इसलिए प्लीज आज ही संकल्प लीजिए कि अपने घर, परिवार, वार्ड, मोहल्ले, गांव और शहर से पहले जंगलों में पर्याप्त पानी की उपलब्धता और वृक्षारोपण सुनिश्चित करेंगे। आप सबको ज्ञात है कि हर साल दर साल गर्मी बढ़ती जा रही है जिसके कारण हम Cooler, AC और Fridge के आदी होते जा रहे हैं जबकि ये हमारे जीवन के लिए घातक भी है इसलिए आपसे निवेदन है अपने घर, महल या Building को बड़ा बनाने के बजाय उसे छोटा बनाइये मगर अपने आंगन, बाड़ी, खेत और सड़क में पौधरोपण जरूर करिए इससे न सिर्फ धरती की तापमान कम होगी बल्कि हम Cooler, AC और Fridge के निर्भरता से भी उबर सकेंगे।

प्लीज सर..... प्लीज पाठक साथियों.... प्लीज मीडिया बंधुओं..... आप भी जल संरक्षण के लिए अपने हिस्से का पहल करिए ताकि मंकी सिंह की कहानी आपके साथ न दोहरा जाए।

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वास्तव में भारत के रत्न कौन? इसे जानने के लिए इस उपन्यासिका को जरूर पढ़ें.... वास्तविक राष्ट्रवाद को रेखांकित करती है किताब ‘‘भारत के रत्न’’

वास्तव में भारत के रत्न कौन? इसे जानने के लिए इस उपन्यासिका को जरूर पढ़ें.... वास्तविक राष्ट्रवाद को रेखांकित करती है 
किताब ‘‘भारत के रत्न’’

श्री नीरज चन्द्राकर द्वारा लिखित उपन्यासिका ‘‘भारत के रत्न’’ का अनेकोबार प्रसंसा सुना था, ये पुस्तक देश के शीर्ष प्रकाशक ‘‘भारतीय ज्ञानपीठ’’ द्वारा प्रकाषित है। मैं दिनांक 20 मार्च 2021 को विशेष अवकाश पर रवाना होने के पूर्व अवकाश स्वीकृति के लिए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक, नारायणपुर के कार्यालय में गया हुआ था, चर्चा के दौरान मैंने उनके उपन्यास ‘‘भारत के रत्न’’ का जिक्र किया तब उन्होने पुस्तक की एक प्रति भेंट किया था। लम्बे दिनों से साहित्य पढ़ने की आदत छूट सी गई है मगर मित्रों और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा अनेकोंबार इतना प्रसंसा सुन चूका था कि मैने सोचा उपन्यासिका ‘‘भारत के रत्न’’ को एक-दो घण्टे के मान से 3-4 दिन में पढ़ लूंगा, आज सुबह मार्निंगवाॅक के बाद लगभग 8 बजे घर पहुंचा तो देखा बाथरूम में बच्चों का कब्जा है सोचा क्यों न 20-25 मिनट तक खाली समय का उपयोग करके पुस्तक को पढ़ लूं? मैंने पढ़ना शूरू किया, ‘‘भारत के रत्न..... दिसंबर की कड़कती ठंड भरी रात के पश्चात् अलसाया हुआ भोर....’’ तो पाया कि इस उपन्यासिका में मूलतः चार हीरोज की कहानी हैं जो काका के टूटी-फूटी झोपडीनुमा चाय दूकान से अपने दिन की शुरूआत करते हैं, खेलना, मस्ती करना और अलग-अलग लक्ष्य के साथ स्ट्रगल करना ही इनका मूल धर्म है.... हम सबके युवावस्था की आम जीवन, मित्रों और परिवार के ब्यंग और घनश्याम काका के चाय पर चर्चा परिचर्चा और हास उपहास के साथ लम्बी चर्चा ने कब टाईम मशीन लाकर मुझे पुस्तक के भीतर प्रवेश देकर इसका पात्र बना दिया मुझे पता ही नहीं चला। मैं कभी संजय तो कभी हरिश, कभी जितेन्द्र तो कभी राघवेन्द्र के रूप में अपना युवापन फिर से जी गया। संजय अपने दोस्तों में सबसे अधिक आर्थिक विपन्नता भरे जीवन जी रहा है इसके बावजूद दोस्तों के द्वारा उनके आर्थिक स्थिति के प्रतिकूल उनके जन्मदिन पर घनश्याम काका को राजशाही आर्डर दिया जाना बेचारे संजय को अंतर्द्वंद में फंसा देता है मगर चोरी से दोस्त ही उसके सारे बिल चुकता कर देते हैं। देश-प्रेम की भावना से ओत-प्रोत संजय सबसे पहले भारतीय सेना में जवान बन कर अपने सपने साकार कर लेता है इसके साथ ही आर्थिक आजादी को हासिल भी कर लेता है इसके साथ ही सभी दोस्त अपने सपने के शीर्ष में पहुंच चूके हैं। संजय की शादी का तय होना और इसमें दोस्तों और बहन अलका द्वारा संजय को ढ़केलने का प्रयास करना। संजय के विवाह के दौरान संजय की अनदेखी और उनके दोस्तों फिल्म स्टार जितेन्द्र और क्रिकेटर हरीश को व्हीआईपी ट्रीटमेंट देना एक पल के लिए संजय को भी मानवीय व्यवहार के मानसिकता में भीतर ही भीतर आहत करने लगती है तभी उनके दोस्त उन्हें एक दिन के राजा होने के गौरव का अहसास कराने के लिए बारात से वापस आ जाते हैं तब जाकर संजय को उचित सम्मान मिल पाता है। संजय और योगिता के विवाह के माध्यम से समाज में लड़की का पिता होना किस तरह से अभिषाप माना जाता है इसे रेखांकित करने और भारत की व्हीआईपी कल्चर पर प्रहार करने का कुशलतापूर्ण प्रयास किया गया है। कुछ ही दिन बाद राघवेन्द्र भी केन्द्रीय मंत्री बन जाता है इसके साथ ही दोस्तों के हैसियत के आगे संजय कई बार खूद को बौना पाता है तो उसे उनके दोस्त गौरवान्वित भी करते हैं। संजय की पोस्टिंग पुलवामा बार्डर में हो जाता है, उसके बटालियन के पोस्ट में आतंकी हमला हो जाता है और वह पुरे बहादूरी के साथ आतंकवादियों का सफाया करते हुए अंततः अपने साथी जवान को गोला बारूद उपलब्ध कराने के दौरान शहादत को प्राप्त हो जाता है। तिरंगा में लिपटे शहीद संजय के पार्थिव शरीर के सम्मान के लिए लाखों की संख्या में आज भीड उमडी हुई है उसे पुष्पचक्र और पुष्पार्पित करने के लिए आज उनके तीनो दोस्त केन्द्रीय मंत्री, फिल्म स्टार और क्रिकेटर सहित प्रदेश के मंत्रीगण, सैकड़ों जनप्रतिनिधि और आईएएस, आपीएस अधिकारी उपस्थित हैं मगर आज भीड़ की प्राथमिकता केवल और केवल शहीद संजय का पार्थिव शरीर है; ये पहला अवसर है जब पहलीबार लाखों के भीड में कोई व्हीव्हीआईपी या व्हीआईपी नहीं है बल्कि सबके सब बराबर और समान हैं आम दर्शक। इसी बीच शहादत और श्रद्धांजलि के ठीक दूसरे-तीसरे दिन योगिता का तबियत खराब हो गया है उसे अस्पताल ले जाया गया है वहां पता चलता है कि योगिता गर्भवती है, अलका से सूचना पाकर संजय के तीनों व्हीआईपी दोस्त योगिता को बधाई देने आए हुए हैं तीनो अपने योगिता भाभी से बारी-बारी से पुछते हैं कि आपके भावी संतान मेरी तरह क्रिकेटर, केन्द्रीय मंत्री या फिल्म स्टार बनेंगे न भाभी, मगर योगिता खुली और दमदार आवाज में बोल पड़ती है - संजय जैसे ही भारत मां का अनमोल रत्न ‘‘भारत रत्न’’ और फिर फूट-फूटकर रोने लगती है।

ये उपन्यासिका जहां मित्रता की मिशाल प्रस्तुत करती है वहीं खिलाडियों, फिल्म स्टार और राजनेताओं को कैसे ईश्वर मान लिया जाता है और देशसेवा करने वाले जवानों को कितना तुच्छ समझा जाता है ऐसी मानसिकता पर भी प्रहार किया गया है। इसके माध्यम से कैसे देश के लिए अपने प्राणों का न्यौछावर कर देने के लिए तत्पर रहने वाले जवानों के परिवार को सीमित संसाधन में जीने को मजबूर रहना पडता है इसे भी रेखांकित करने का प्रयास किया गया है। साथियों ये उपन्यास मेरे जीवन का पहला ऐसा उपन्याय है जो मेरे आखों से अश्रुधारा बहने पर विवष कर दिया है हालांकि मै इस ग्रंथ का पात्र बनकर लगभग पूरे चार घण्टे तक पूरी तरह से सैनिक का जीवन जीया, शौर्य और पराक्रम किया। अंततः संजय के शहादत के साथ ही मेरी आखें राहेन नदी बनकर बहने लगी जो लगभग पूरे 20 मिनट तक नम ही रही है। मैं इसके माध्यम से अनुरोध करता हूं कि आप भी इस उपन्यासिका को एक बार जरूर पढ़ें...... बहुत अच्छा लगेगा, सायद आपने भी इतनी अच्छी किताब कभी और नहीं पढ़ा होगा। मेरा मानना है कि इस किताब को न सिर्फ फौजी, सशस्त्र बल के जवान औ पुलिस जवान अनिवार्य रूप से पढ़ें वरन् हर युवा और छात्र को इसका अध्ययन जरूर करना चाहिए। मेरी अपनी सिफारिश है कि इसे यूनिवसिटी के सिलेबस में शामिल कर देना चाहिए... क्योंकि वास्तव में देश के सीमा की सुरक्षा और सीमा के भीतर की सुरक्षा से ही हर नागरिक के जीवन को स्थायित्व मिलता है। आप जिसे भगवान मानने का भ्रम पाल रखे हैं आप जिन क्रिकेटर्स और फिल्म स्टार को भगवान मानते है उनके नहीं होने पर भी आपके देश और आपका जीवन सुरक्षित हो सकता है मगर देश में फौजी, सशस्त्र बल और पुलिस के जवान और किसान नही होंगे तो आप न तो सुरक्षित होंगे न आपका जीवन रहेगा इसलिए ही स्वतंत्र भारत के द्वितीय प्रधानमंत्री माननीय लालबहादूर शास्त्री जी ने ‘‘जय जवान और जय किसान’’ का नारा देते हुए इसे ही जय हिन्द का आधारशिला बताया है। 

साथियों, जिस किताब को 03-04 दिन में पढ़ने का लक्ष्य बनाया था, उसे बिना ब्रेक के अभी लगभग साढ़े 4घंटे में पूरी तरह पढ़ लेने के बाद रिव्यू लिखकर आपको शेयर कर रहा हूँ। पुनः आपसे अनुरोध है इस पुस्तक को जरूर पढियेगा... मैं दावा करता हूँ ये किताब आपको बहुत अच्छा लगने वाला है।


एच.पी. जोशी
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़
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