हां, मैं पूर्णतः समानता का समर्थक हूं - HP Joshi

मैं टैक्सपेयर हूं। 
मैं भारत का आम नागरिक हूं।
मैं मनुष्य हूं और मानवता का समर्थक।

चाहे क्यों न मेरे बच्चे प्राइवेट स्कूल कॉलेज में पढ़ते हो या चाहे क्यों न मेरा पूरा परिवार निजी अस्पताल में इलाज करवाता हो।

फिर भी ..
मैं चाहता हूं कि स्वास्थ्य और शिक्षा पूर्णतः निःशुल्क होनी चाहिए।

क्योंकि मैं मानव हूं मानव मानव एक समान और जम्मो जीव हे भाई बरोबर के सिद्धांत का समर्थक हूं।

क्या??
क्या तुम्हें ...... 
क्या तुम ........

हां, हां मैं चाहता हूं कि सब समान हों, मानव मानव में कोई भेदभाव न हो।

हां, मैं चाहता हूं कि जो आज निर्धन है गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे हैं उनके बच्चे भी अच्छे विद्यालय में पढ़ सकें, मेरे बच्चों के समान उन्नति कर सकें।

हां, मैं चाहता हूं कि गरीबों को भी उनके मेहनत का पूरा पूरा श्रेय उन्हें ही मिले, उन्हें भी मेहनत करने और उन्नति करने का अवसर मिले।

हां, मैं चाहता हूं कि जो गरीब हैं वे भी आनंद के साथ जीवन जी सकें, परिवार के साथ समय बिता सकें। अच्छे सेवन स्टार होटल में खाना खा सकें, होटल ताज में रात बिता सकें और विदेश टूर में जा सकें।

हां, मैं चाहता हूं कि गरीबों के बच्चे भी यूपीएससी और देश के प्रमुख प्रतियोगी परीक्षाओं की कोचिंग फ़्री में कर सकें, आईएएस आईपीएस अधिकारी बन सकें, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर और प्रोफेसर बन सकें।

हां, मैं चाहता हूं कि उन्हें भी इतना सम्मान मिल सके कि वह देश के सर्वोच्च पदों में नियुक्त और निर्वाचित हो सके, इसके लिए उनकी आर्थिक स्थिति उन्हें न रोके।

हां, मैं चाहता हूं कि गरीबों के बच्चे भी मेरे बच्चों से आगे आ जाएं, उन्हें भी अपनी योग्यता साबित करने के लिए समान अवसर मिल सके।

हां, मैं चाहता हूं कि गरीबों के बच्चे भी एसी बस से स्कूल कॉलेज का सकें, एसी कमरे में रह कर अध्ययन कर सकें, आईआईटी आईआईएम में पढ़ सकें।

हां, हां, हां, मैं पूर्णतः समानता का समर्थक हूं, क्योंकि मैं जानता हूं मेरिट अवसर का प्रतिफल है सुविधाओं का प्रतिबिंब है इसलिए मेरिट और ज़ीरो के सिद्धांत में बदलाव की अपेक्षा करता हूं।

एचपी जोशी
नवा रायपुर, छत्तीसगढ़
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क्या? अकेला एक आदमी भी बड़े मीडिया घराने को टक्कर दे सकता है?

जब तक संपादकीय अच्छी नहीं होगी कोई आपका पुस्तक, पेपर या वेबपोर्टल नहीं पढ़ेगा।

यदि आपके संपादकीय में अच्छे शब्द और तर्क जो लोगों को प्रेरित न कर सके और यदि उनके अनुकूल न हो तो सोशल मीडिया में भी लोग आपके पोस्ट को देखकर अनदेखा कर देते हैं।

यदि आपके समाचार का टाईटल उस संबंधित व्यक्ति के इंट्रेस्ट से यदि न जुड़ा हो तो कोई आपके यूआरएल/लिंक या पोस्ट को क्यों देखेगा?

आज यदि एक अकेला आदमी एक बड़ा मीडिया बन सकता है बिना लागत के और बड़े बड़े मीडिया घराने को टक्कर दे सकता है तो इसके पीछे उसका अच्छा संपादकीय, लोक लुभावने हेडिंग, सत्यता को लिखने और करोड़पति बनने के सपने से दूरी बनाए रखना हो सकता है। हालांकि उन्हें भी गूगल ऐडसेंस तथा राष्ट्रीय पर्व,  राजनैतिक लोगों और आम लोगों द्वारा दिए जाने वाले व शासन स्तर पर मिलने वाले विज्ञापन से कमाई करेगा तभी तो अपनी बेरोजगारी दूर करेगा।

"क्या? अकेला एक आदमी भी बड़े मीडिया घराने को टक्कर दे सकता है?"
हां, सर बिल्कुल। आपने सही सुना।

"बताओ भला कैसे?"
छोटे से स्टेप्स और पूरी ईमानदारी और निष्ठा से कार्य करने से। इसके लिए वे कुछ ऐसे स्टेप्स फॉलो करते हैं......
1- पीआईबी के वेबसाइट से प्रेस विज्ञप्ति में संपादकीय, रोज लगभग 10 से अधिक विज्ञप्ति जारी होते हैं जिसमें 2-4 में संपादकीय कर सकते हैं इसके अलावा अपने संबंधित राज्य के जनसंपर्क विभाग से जारी प्रेस विज्ञप्ति।
2- मंत्रिमंडल के निर्णय और मंत्रियों, नेताओं, फिल्म स्टार, सामाजिक कार्यकर्ता, आरटीआई कार्यकर्ता और खिलाड़ियों के सोशल मीडिया एकाउंट की निगरानी करना।
3- क्राइम रिपोर्टिंग के लिए कुछ स्थानीय जिलों के पुलिस फेसबुक पेज का सहारा लिया जा सकता है।
4- लगभग सभी विभाग से प्रेस विज्ञप्ति जारी किया जाता है, इसके मिलने के सोर्स से समन्वय।
5- विपक्षी दलों के नेताओं से समन्वय और उनके सोशल मीडिया पर सक्रिय रहना और निष्पक्ष समीक्षा करना।
6- सोशल मीडिया में ट्रेंड हो रहे पोस्ट की समीक्षा, कि वह फर्जी है या सही?
7- कुछ दार्शनिक, विचारकों, लेखकों और संपादकों से समन्वय बनाकर रखना।
8- कुछ पुलिस अधिकारी/कर्मचारी, अधिवक्ता, डॉक्टर से समन्वय बनाकर रखना।
9- राष्टीय और राज्य स्तर के मामलों के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट और माननीय उच्च न्यायालय के आदेशों का अवलोकन करते रहना।
10- लोकसभा और राज्यसभा टीवी चैनल पर निगरानी
11- अन्य, अपने कार्यक्षेत्र और चॉइस के अनुसार ....

"ये तो कितना आसान उपाय है अब तो मैं भी अपना अकेले का वेबपोर्टल न्यूज चैनल बनाऊंगा..."
  • मुझे पता था, आप ऐसे ही कुछ सोचोगे। मगर क्या आपमें संपादकीय योग्यता और अनुभव है?
  • क्या समाचार बनाने की अनुभव है?
  • कभी किसी झांसे में आकर उपर नीचे मत लिख देना, बहकावे और आवेश में आकर, खोजी पत्रकारिता के नाम पर ऐसा कोई तथ्य पर दावे पेश मत कर देना, किसी की सामाजिक/राजनैतिक चरित्र का हनन मत कर देना, किसी के आस्था विश्वास को आघात मत पहुंचा देना। किसी अधिकारी, नेता या संस्था के खिलाफ झूठे दावे को सही मानकर अपना टीआरपी मत बढ़ा लेना। 
  • क्या आप संविधान, नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत और देश/राज्य में प्रभावी कानूनों की जानकारी है?


ये तो नहीं है यार!
तब तो वेबपोर्टल न्यूज चैनल चलाने की मत सोचो। लेख पढ़ने के लिए धन्यवाद.....

यह लेख केवल एक ब्यंग है।
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मृत शरीर को जलाने या दफनाने से न मोक्ष मिलती है, न आत्मा को शांति मिलती है और न अमरता की प्राप्ति होती है - एचपी जोशी

अंगदान धरती में सबसे बड़ा दान है इससे बडा और श्रेष्ठ दान कुछ हो ही नहीं सकता - एचपी जोशी

मृत शरीर को जलाने या दफनाने से न मोक्ष मिलती है, न आत्मा को शांति मिलती है और न अमरता की प्राप्ति होती है - एचपी जोशी

मृतशरीर को जलाना/दफनाया जाना केवल रूढ़िवादी परम्परा, अब इसे समाप्त करने की जरूरत है - एचपी जोशी

आओ मरणोपरांत अंगदान का संकल्प लें और दूसरों को भी प्रेरित करें - एचपी जोशी

अंगदान सबसे बड़ा जीवन दान है इससे बडा और श्रेष्ठ दान कुछ हो ही नहीं सकता। आपके अंगदान करने से 5 से 10 लोगों को जीवन/बेहतर जीवन मिल सकता है। इसलिए आपसे अनुरोध है कि आज ही National Organs and Tissues Transplant Organization [Ministry of Health and Family Welfare] Govt. of India के वेबसाइट http://notto.nic.in/ में जाकर मृत्यु पश्चात अंगदान का संकल्प लें।

यहां यह उल्लेखनीय है कि अंगदान करने से मरणोपरंत आपके मृत शरीर में से उपयोगी Organs एवम Tissues को NOTTO (Govt. of India)  उपयोग में ले लेता है अर्थात आपके मृत शरीर निकालकर किसी जरूरतमंद व्यक्ति के शरीर में प्रतिस्थापित कर देता है और उसके बाद शेष शरीर को आपके परिजन को लौटा देती है। जिसका आपके परिजन द्वारा धार्मिक/समाजिक रितिरिवाज एवं परम्परा के अनुसार कार्यवाही की जा सकती है।

चाहे आप अंगदान के पक्ष में हों या फिर विपक्ष में मगर एक बार लेखक के तर्क को जरूर पढ़िए, जरूर एक बार स्वयं से प्रश्न करके देखें कि आप क्यों अंगदान नही कर सकते? अंगदान करने से क्या हानि है? एक बार जरूर सोचें आपके मृत शरीर को यदि जलाया या दफनाया जाएगा तो आपको या आपके परिवार को क्या मिलेगा? एक बार इसपर जरूर विचार करें, एक बार जरूर सोचें? आखिर क्यों?

चलो अब प्रश्न से आगे बढ़कर, मृत शरीर को जलाने और दफनाने के पीछे के राज से पर्दा उठाने का प्रयास करते हैं, चलो एक सकारात्मक तर्क को पढ़ने और समझने का प्रयास करते हैं। बिते दिनों की बता हो या चाहे वर्तमान की बात हो यदि मृत शरीर को आबादी क्षेत्र मे, खुले स्थान में छोड़ दिया जाएगा तो उसमें कीडे लग जाएंगे और आसपास बदबु फैलेगी, इससे महामारी फैलने की भी पूरी गारंटी रहती। इसलिए हमारे पुर्वजों ने इससे बचने के लिए बडे चालाकी के साथ इसे आस्था, विश्वास और धर्म से जोड़ते हुए मृत शरीर को जलाने अथवा दफनाने के लिए प्रेरित किया, जो सर्वथा उचित और सर्वोत्तम उपाय है हालांकि मृत शरीर को जलाने और दफनाने की परंपरा आज भी उचित परम्परा है। मृत शरीर के जलाने और दफनाने के पीछे एक मात्र उद्देश्य मृत शरीर को खुला छोडने के बाद फैलने वाले महामारी/हैजा को रोकना और मनुष्य के मन में भी अपने भविष्य में होने वाले मृत्यु के बाद दुर्गति और घृणा के भावना को रोकना ही था। मृत शरीर को जलाने या दफनाने से न तो आत्मा को शांति मिलती है, न मोक्ष मिलता है और न तो पुनः अमरता को प्राप्त होता है, ऐसा दावा करना केवल कोरी कल्पना मात्र है। इसलिए मरणोपरांत अंगदान के संकल्प से केवल लाभ ही होगा, मानवता की रक्षा ही होगी, ऐसा करके आप किसी दूसरे जरूरतमंद मनुष्य को अच्छे जीवन का वरदान ही देंगे। यह भी तर्क है कि यदि आप किसी मनुष्य अथवा जीव को जीवन दे सकते हैं या खुसी दे सकते हैं तो यह आपकी महानता ही होगी ऐसे ही वरदान देने वाले ऐसे ही दूसरे को खुसी देने वाले लोग आज पूजे जाते हैं।

यह बात उन दिनों की है जब मै (लेखक-हुलेश्वर जोशी) वर्ष 2003-04 में नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, डिण्डौरी, तहसील लोरमी, जिला बिलासपुर में कक्षा-12वीं का छात्र था, किसी बात पर मुझे मेरे कुछ सहपाठी हस रहे थे, जिसके कारण मैं उनसे नाराज था। ठीक मेरे नाराज होने के समय ही हमारे अर्थशास्त्र के गुरुजी श्री महेन्द्र सिंह मार्को जी कक्षा में प्रवेश किये और उन्होने मेरा चेहरा देखकर नाराजगी का कारण जाना और समझाते हुए कहा कि ‘‘कोई मनुष्य यदि किसी को खुशी दे सकता है, मुस्कराने का अवसर दे सकता है, किसी के कष्ट को हर सकता है तो वह उनके लिए ईश्वर से, माता पिता से अथवा किसी अन्य आराध्य से कम नहीं हो सकता है।’’ 

ज्ञातव्य हो, कि मैंने दिनांक 24/01/2018 को मृत्यु उपरांत अपने शरीर के समस्त Organs एवम Tissues को दान करने का संकल्प लिया है। मैंने अपने मृतशरीर को व्यर्थ जलने/दफन होने से बचाने का प्रयास किया है, मेरे द्वारा ऐसा करना एक रूढ़िवादी परंपरा को समाप्त करने के लिए छोटा सा प्रयास है। यदि मेरे मृत शरीर को जलाया जाएगा तो पर्यावरण प्रदुषित होगा और किसी नदी के पवित्र जल को मेरे हड्डी दुषित करेंगे और यदि मेरे शरीर को दफनाया जाएगा तो धरती के भीतर उसे सड़-गल जाना ही तो है। यदि मेरे मरने के बाद भी मेरा कोई अंग किसी व्यक्ति को बेहतर जीवन देने में सक्षम है तो इसे व्यर्थ जलने/दफनाने के लिए आखिर क्यों छोड दूं? मैंने अंगदान किया, इसे शेयर करना अच्छी बात है। यह बहुत अच्छा होता कि आप स्वयं अंगदान कर लें। मेरे अंगदान की सूचना देते हुए ज्ञात हुआ कि मुझसे पहले लगभग देशभर के 1लाख से अधिक लोगों ने अंगदान का संकल्प लिया है। - एचपी जोशी
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पर्यावरण संरक्षण, ईश्वर और मूल धर्म पर Durgamya और Tattvam के मध्य संवाद - HP Joshi

पर्यावरण संरक्षण, ईश्वर और मूल धर्म पर Durgamya और Tattvam के मध्य संवाद - HP Joshi

वर्तमान परिवेश के अनुरूप पर्यावरण संरक्षण, ईश्वर और धर्म को नए दिशा देने की अत्यंत आवश्यकता है इसलिए आज हम दो नन्हें बच्चों के संवाद के माध्यम से समाज को एक नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं इस संवाद का उद्देश्य पूर्णतः लोकहित और कल्याण को समर्पित है यह लेख धर्म निरपेक्षता का समर्थन करता है और धर्म के आधार पर आपसी मतभेद को मिटाने का प्रयास करता है। 

आइए हम Durgamya और Tattvam के मध्य हुए काल्पनिक संवाद को जानने का प्रयास करते हैं। वास्तव में ये दोनों नन्हे पात्र Durgamya पीपी2 की स्टूडेंट्स है और Tattvam अभी 2वर्ष का अबोध बालक है।

Durgamya: सूर्य न होता तो ?? यदि सूर्य न होता, यदि पृथ्वी न होती, यदि चंद्रमा न होता, यदि आक्सीजन न होता, यदि कार्बन डाइऑक्साइड न होता तो और यदि पानी न होती तो क्या आप होते??
क्या इनमे से एक भी नहीं होगा तो आप जीवित रहने में सक्षम होंगे?

Tattvam: नहीं। क्या धर्म नहीं होता तो आप जीवित रहने में सक्षम होंगे?

Durgamya: हां, कथित धर्म की हमें कोई आवश्यकता नहीं है। इन कथित प्रचलित धर्म के बिना भी हम जी सकते हैं जैसे मनुष्य के अलावा सभी प्राणी जीवित हैं।

Tattvam: तो हम धर्म के नाम पर इतना क्यों उलझे हैं? आपस में लड़ क्यों रहे हैं? हिंसा क्यों कर रहे हैं? आपसी भाईचारे को समाप्त क्यों कर चुके हैं?

Durgamya: ये सब धार्मिक नेताओं के मज़े के लिए है उनके मनोरंजन के लिए है। वे आपको इस पचड़े में फंसाकर राज करना चाहते हैं और आपको मानसिक रूप से गुलाम ही रखना चाहते हैं। हम उनके झांसे में आकर फंसे हुए हैं यही वास्तविकता है।

Tattvam: क्या हम सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी के लिए, उसके सुरक्षा के लिए कुछ कर सकते हैं?

Durgamya: वास्तव में सूर्य और चंद्रमा हमारे ईश्वर है, भगवान है, परमात्मा है और यही श्रेष्ठ देवता है। इनके लिए कुछ न करो तब भी चलेगा, क्योंकि कि ईश्वर, भगवान, परमात्मा या देवता आपके पूजा का मोहताज नहीं, यदि कोई स्वयं को पूजने को कहता है तो कुछ तो गड़बड़ है।
आपको अपने जन्मभूमि के लिए अपनी पृथ्वी के लिए पृथ्वी में विद्यमान जल की स्वच्छता के लिए, आक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड की सही मात्रा में उपलब्धता के लिए, इनके सुरक्षा के लिए कार्य करने की जरूरत है क्योंकि ये हमारे लिए अत्यंत उपयोगी ही नहीं जीवन के लिए निहायत जरूरी है, इसके बिना एक पल भी जीवन संभव नहीं है।

Tattvam: दीदी तो बताओ, मैं पृथ्वी, आक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और जल के संरक्षण के लिए क्या करूं? मुझे क्या करना चाहिए?

Durgamya: इसके लिए भी आपको बहुत अधिक कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। आप अधिकाधिक वृक्षारोपण करें, भोजन में फलों के प्रयोग को बढ़ाएं, ताकि आपको आक्सीजन, कार्बन डाइऑक्साइड और आपके और आपके प्रकृति के लिए बराबर मिलता रहेगा। जब आप अधिक से अधिक वृक्ष लगाएंगे तो जलस्तर बढ़ेगी, नदिया नलों और तालाबों में पानी होगी, आप वर्षा के जल को बांध, चेकडैम और हार्वेस्टिंग के माध्यम से भी रोककर जल स्तर बढ़ा सकते हैं ताकि आपके आने वाली पीढ़ियों को पानी की किल्लत न झेलनी पड़े।

पृथ्वी के संरक्षण के लिए केवल एक काम करना है सोलर एनर्जी के इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने की जरूरत है और भूगर्भ के भीतर से निकलने वाले कोयले इत्यादि निकालकर जमीन के भीतर को खोखली होने से बचाओ।

पर्यावरण में वायु के स्वच्छता के लिए जितने भी प्रदूषण कारक पदार्थ हैं जैसे डीजल, पेट्रोल, केरोसिन, लकड़ी, कचरे और फैक्ट्री से निकालने वाले खराब सामग्री उन्हें मत जलाइए, पदार्थ के प्रकृति के अनुसार कचरे का उचित प्रबंधन कीजिए।

Tattvam: दीदी, क्या जिन्हें हमें हमारा मौजूदा धर्म ईश्वर और भगवान कहता है उनकी पूजा करने से स्वर्ग मिल सकता है?

Durgamya: गजब के बेवकूफ बने हो Tattvam; ऐसा कुछ नहीं है। मगर हां यदि तुम आक्सीजन और पानी के लिए, इसके बचत के लिए इनकी पूजा अर्थात संरक्षण के लिए वृक्षारोपण नहीं करोगे तो अवश्य ही नर्क में होगे।

मेरा तात्पर्य भौतिक स्वर्ग से है उस काल्पनिक स्वर्ग नर्क के मूर्खता पूर्ण तर्क से नहीं। स्वस्थ जीवन, स्वच्छ वातावरण और भाईचारे व आत्मीयता पूर्ण सामाजिक सद्भाव वाले समाज, गांव और शहर से है इसे ही मैं स्वर्ग कहूंगी। नर्क के लिए ठीक इसके शर्त को उल्टे पलट दीजिए आपको नर्क मिल जाएगा, अर्थात जहां पीने को साफ पानी न मिले, जीने के शुद्ध आक्सीजन न मिले, खाने को अच्छे भोजन न मिले और रहने के लिए अच्छा सद्भाव पूर्ण समाज न मिले, और शोरगुल से परे शांतिपूर्ण निवास स्थान न मिले तो जान लेना यही नर्क है। समाज में हिंसा व्याप्त हो।

Tattvam: दीदी, मैं धर्म किसे समझूं?

Durgamya: सच्चा धर्म आप सूर्य, चंद्रमा, पृथ्वी, आक्सीजन के प्रकृति को ही मानों, जैसे ये सभी परोपकार के लिए किसी से भेद नहीं करती ऐसे ही किसी भी जीव जंतु से भेद नहीं करना ही धर्म है।

यह काल्पनिक संवाद समाजिक जागरूकता पर आधारित एक लेख है, इसके माध्यम से लेखक देशवासियों ही नही वरन् समस्त मानव समाज से अपील करता है कि पर्यावरण संरक्षण के लिए आगे आएं, जाति/धर्म के नाम पर मानव-मानव में भेद को त्यागें और शांति और शौहार्द्रपूर्ण समाज की स्थापना के लिए आगे आएं। क्योंकि स्वच्छ जल, हवा और प्रदुषण मुक्त पर्यावरण हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव - CG Poem

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव
उबड़ खाबड़ नहीं, पक्का रसदा तोला धरावत हंव

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव।
चना के पेड़ बनाके, तोला नई चढ़ावत हंव।।
गुरतुर बोली बतरस म, तोला नई फसांवत हंव।
मानले संगी मोर बात ल, सत् धरम के रस्ता ल बतावत हव।।1।।

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव।
आगी खाए ल घलो संगी, तोला नई सिखावत हंव।।
‘‘मनखे मनखे एक समान’’ भेद ल बतवात हंव।
‘‘जम्मो जीव हे भाई बरोबर’’ गियान अइसने सिखावत हंव।।2।।

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव।
‘‘शिक्षा ग्रहण पहिलि’’ करे बर मनावत हंव।।
गंजा दारू छोडव संगी, शाकाहार बनावत हंव।
बैर भाव म कांहि नइहे, मया के बात सिखावत हंव।।3।।

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव।
एक घांव मोर संग चलव संगी, अइसे गोहरावत हंव।।
आडम्बर, अमानुषता अउ भेदभाव ल मनखे ले मिटावत हंव।
गौतम बुद्ध, गुरूनानक अउ पेरियार संग, दोसती करावत हंव।।4।।

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव।
कबीर दोहा के संग ओशो घलो के बिचार ल समझावत हंव।।
भगवान बिरसा मुण्डा जइसे लडे ल सिखावत हंव।
"भारत के संविधान सच्चा धरम" ऐहि बात बतावत हंव।।5।।

ओ दिन के सियानी गोठ तोला मैं बतावत हंव
उबड़ खाबड़ नहीं, पक्का रसदा तोला धरावत हंव


रचना: एचपी जोशी, नवा रायपुर, अटल नगर, छत्तीसगढ़
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गुरू नानकदेव ने हमें भाईचारा, एकता और मानवता का पाठ पढ़ाया - एचपी जोशी

गुरू नानकदेव ने हमें भाईचारा, एकता और मानवता का पाठ पढ़ाया - एचपी जोशी

मै पूरे मानव समाज को गुरू नानकदेव जयंति अर्थात प्रकाश पर्व की शुभकामना देता हूं।

उल्लेखनीय है कि गुरू नानकदेव जी का जन्म कार्तिक पूर्णिमा के दिन अर्थात आज ही के दिन 550 वर्ष पहले हुई थी, उनके जयंति को हम प्रकाश पर्व के रूप में मनाते हैं। उन्होनें हमें भाईचारा, एकता और मानवता के सिद्धांत पर चलने का रास्ता दिखाया। हम गुरू नानकदेव के चीरऋणी हैं जिन्होने हमें धर्म निरपेक्षता के लिए प्रेरित किया, इसीलिए सभी धर्म के अनुयायी उनके शिष्य बने और उनका अनुसरण कर अमरता को प्राप्त हुए। गुरू नानकदेव मानते थे कि अहंकार मनुष्य का सबसे बडा दुश्मन है अतः उन्होनें सेवाभाव को अपने आचरण में शामिल करने के लिए प्रेरित किया, उन्होनें मानव समाज में व्याप्त उंच-नीच, जाति-पाति, छुआछूत और भेदभाव को मिटाने के लिए लंगर की शुरूआत किया, जिसमें सभी जाति-धर्म के लोग एक ही पंक्ति में भाईचारा के साथ प्रसाद पाते हैं और सेवा करते हैं।

गुरू नानकदेव ने मानव समाज को बताया कि भंवसागर में एक ही ईश्वर है जो हमारा पिता है अर्थात हम एक ही ईश्वर के संतान हैं। उन्होनें ईमानदार रहकर संयमित जीवन जीनें, परोपकार करने और स्त्री का आदर करने का संदेश दिया।

हमें गुरू नानकदेव से प्रेरित होकर जीवन जीनें की आवश्यकता है, सच्चे अर्थो में मानव होने के लिए गुरू नानकदेव जी के मार्ग में चलना अत्यंत आवश्यक है।
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न्याय का साथ दें, न्याय समस्त जीव का अधिकार - एचपी जोशी

न्याय का साथ दें, न्याय समस्त जीव का अधिकार

अयोध्या विवाद में हमें शीघ्र ही न्याय मिलने वाला है। हम न्याय के साथ हैं, अमन और शांति के साथ हैं, प्रेम और भाईचारे के साथ हैं, मंदिर मस्जिद में भेदभाव के खिलाफ हैं क्योंकि हम मानव हैं।

न्याय सबका अधिकार है इसलिए जिस वर्ग को भी न्याय मिलेगा उसके खिलाफ जाकर अन्याय नहीं करेंगे।

चाहे हम हिन्दू हैं, चाहे हम मुस्लिम हैं, चाहे हम ईसाई हैं या फिर चाहे हम अन्य भारतीय धर्म के अनुयाई।

हिंसा किसी भी शर्त में बेहतर विकल्प नहीं हो सकता और न तो धर्म हिंसा को आदर्श के रूप में स्वीकार सकता है। अहिंसा में ही धर्म का सर्वोच्चता और महानता निहित है इसलिए अयोध्या में न्याय का समर्थन समस्त देशवासी ही नहीं वरन् पूरे विश्व के मानव समूदाय का परम कर्तव्य है।

अयोध्या मसले में मानव-मानव एक समान, जम्मो जीव हे भाई बरोबर और वसुधैव कुटुम्बकम से प्रेरित होने की जरूरत है। इन विचारधारा से प्रेरित होना भारत के महानता का परिचायक होगा अन्यथा देश में पैदा होने वाले अशांति और हिंसा हमें बर्बर मानव के उपाधि से ही सम्मानित करेगी।

आइये न्याय का सांथ दें, माननीय सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करेें।
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