Tuesday, June 02, 2020

मेरे हिस्से का निर्णय मैं ही लूंगा; अपना धर्म, अपने धर्मगुरू और अपना आराध्य स्वयं तय करूंगा - श्री हुलेश्वर जोशी

मेरे हिस्से का निर्णय मैं ही लूंगा; अपना धर्म, अपने धर्मगुरू और अपना आराध्य स्वयं तय करूंगा - श्री हुलेश्वर जोशी
I will decide my religion  - Mr. Huleshwar Joshi

मुझपर हजारों सालों से बोझ लाद दिया गया, मुझे गेरआ से बांध दिया गया, इतने में मन नही भरा तो मेरे पीछे एक लाठी लगा दिया गया; तब से जबकि मेरा जन्म भी नही हुआ था, मेरे माता पिता का भी जन्म नही हुआ था, मेरे दादी दादी का भी जन्म नही हुआ था, मेरे परदादा परदादी और उनके भी सैकड़ों परदादाओं परदादियों का जन्म नही हुआ था। उनके होने के पहले से आज तक मुझपर बोझ लाद दिया गया, मेरे बुद्धि और शक्ति को नियंत्रित कर दिया गया; मतलब उसी गेरआ से मुझे भी पूरी तरह से बांध दिया गया जिससे मैं अपनी कारी को बांधता था। मैं कारी को लंबे दिनों तक बहन मानता रहा फिर अचानक वह माँ के समान गोरस देने वाली हो गई थी क्योंकि कारी मेरी गाय थी। कारी मेरी बहन जैसे थी या फिर क्यों न वह माँ जैसे थी, जो भी हो वह बांधी क्यों जाती थी? मैं जब बच्चा था तब समझ में नही आ रहा था। अब कारी बुधवरिया को जन्म दे चुकी थी, वह बुधवरिया से बहुत प्रेम करने लगी थी, पेउस निकालने के बाद कारी और बुधवरिया को ढील दिया गया था आंगन में दोनों विचरण कर रहे थे मैं कुएं से स्नान करके घर जा रहा था। सूर्य के मीठे धूप में कारी और बुधवरिया बहुत अच्छी लगती थी इसलिए मैं बुधवरिया के साथ खेलने के लिए उसे पकड़ लिया यह बात कारी को पसंद नही आया वह मुझे मारने के लिए दौड़ने लगी; इस घटना के बाद जब दोनों खुले होते तो कभी उनसे प्रेम करने नहीं जाता, कईबार बुधवरिया से खेलने के लिए एक डंडा रख लेता ताकि कारी मुझे मारने दौड़ा न सके। कारी और बुधवरिया ही नहीं सारे भैंस और उनके पड़वा पडरु 15-16 घंटे से कुछ अधिक समय तक गेरआ से बांधे जाते थे और उसके बाद जब उन्हें घांस चराने जाते तब भी लाठी लेकर नियंत्रित रखते थे। मतलब सारे पशुओं को सदैव नियंत्रण में ही रखा जाता था, एक समय सीमा के भीतर उन्हें थोड़ी आजादी मिलती थी, होलिकादहन के बाद से लेकर बोवारा शुरू होने तक उन्हें उरला छोड़ दिया जाता था, हालांकि मैं लाठी लेकर बाहरा, नरवा या नदिया के आसपास ही रहता था; क्योंकि हमें उनके कहीं अन्य स्थान में भागने का, गुम होने का संदेह जो था। ये नियंत्रण केवल कारी, बुधवरिया, भूरी, मुरली और अन्य पशुओं पर ही लागू नही था, मुझपर भी बराबर है। यह बात अलग है क्योंकि संभव है कि मेरे गले की गेरआ आपको दिखाई नही दे रहा हो, मेरे पीछे लगे लाठी आपको दिखाई नही दे रहा हो मगर वास्तविकता दिखाई देने से भिन्न है।

मेरे गले की गेरआ और पीछे घूम रहा लाठी मेरे लिए कितना आवश्यक है या अनावश्यक है संभव है इसकी समीक्षा किसी 100 - 500 ग्रंथों में लिखा नही जा सके। समीक्षा के बावजूद सही निष्कर्ष निकलना भी सायद सम्भव न हो इसलिए गले की गेरआ और लाठी के साथ जीवन को बेहतर मान लेना मेरे लिए ही नहीं बल्कि आपके लिए भी अच्छा खासा मजबूरी है। मगर ख्याल रखना मैं तो इस गेरआ और लाठी जैसे नियंत्रणकारी सिद्धांतों को कमजोर करने की सोच रहा हूँ, मेरा प्रयास रहेगा कि ये नियंत्रण मेरे मर्जी के बिना मुझपर काम न करे अर्थात जिस बिंदु तक किसी दूसरे मनुष्य अथवा जीव जंतुओं के अधिकारों का हनन होना संभव है ठीक उसके पहले तक मुझे आजादी चाहिए।

आजादी?
हाँ आजादी।

15 अगस्त 1947 से आजाद ही तो हो?
हाँ, सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक और राजनैतिक रुप से आजाद हूँ, इसके अलावा मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी संविधान ने आजादी दी है अर्थात जितना आवश्यक है मेरे लिए पूरी आजादी मुझे मिली है। मेरा मानना है भारतीय संविधान लागू होने के पहले मुझे 1/2% (आधा - .5%) भी आजादी नही थी, जीवन का अधिकार भी नही था मतलब कबीला प्रमुख अथवा राजाओं के प्रसादपर्यन्त ही मेरा अच्छा जीवन संभव था। इतने अनेकों अत्यावश्यक आजादी मिलने के बावजूद मुझपर मेरे स्वयं के अज्ञानता और मूर्खता के कारण गुलामी की कुछ बेड़ियां लगी हुई है।

अच्छा! कैसी बेड़ियां?
इन बेड़ियों का नाम उजागर करूँगा तो मुझपर आरोप लगेंगे कि मैंने कुछ लोगों के आस्था को आघात पहुचाया है। इसलिए आपके इस प्रश्न का सीधा सच्चा जवाब नही दूंगा, आपके इस प्रश्न का जवाब नही देना ही मेरे हिस्से का निर्णय है यही सच्ची आजादी है जबकि जिस कारण से जवाब नही दे रहा हूँ वह कुछ हद तक सही है मगर कुछ उतने ही हद तक मेरी मानसिक गुलामी है। क्योंकि यदि एक मर्यादा के भीतर रहकर अपने बारे में बताने का अधिकार है फिर भी कुछ बेतुके लोग आकर कहने लगेंगे कि उनके आस्था और विश्वास को आघात पहुचाया गया है।

चलिए अपने आस्था और विश्वास के बारे में आपको कुछ बातें बताने का प्रयास करता हूँ, प्रयास इसलिए क्योंकि इसमें पूरी ईमानदारी है इसके बावजूद अधूरी जानकारी आपसे शेयर करता हूँ:-

1- "मैं माता श्यामा देवी को अपना कुल देवी, धर्मगुरु और जननी मानता हूं।" निःसंदेह यह सही और जायज है, आप भी इन्हें धर्मगुरु मान सकते हैं क्योंकि इन्होंने हमें अनेकों बात सिखाई है जिसमें एक है "शिक्षा ग्रहण पहले और भोजन ग्रहण नहले"। अब यदि मैं माता श्यामा देवी को लेकर यह कहूँ कि माता श्यामा देवी आपकी भी कुल देवी है, आपकी भी धर्मगुरु है और आपकी भी जननी है तो समझिए ये जो आपके हिस्से का मैं निर्णय ले रहा हूं वही आपके साथ अन्याय है। मेरे द्वारा अपने धार्मिक आस्था और विश्वास को आपके लिए अनिवार्य करने का मेरा प्रयास नाजायज है। क्योंकि आप उनके संतान हैं ही नहीं, तो माता श्यामा देवी आपकी जननी कैसे हो सकती है? फिर भी आपके ऊपर इस बात को थोप दिया जाए और आप उन्हें अपनी जननी मानने को मजबूर हो जाएं तो आप आजाद नही हैं, तो आप अपने वास्तविक जननी के साथ अन्याय कर है। ख्याल रखना माता श्यामा देवी की एक निर्धारित सीमा थी काम करने की, महिलाओं को आत्मनिर्भर और आत्मसम्मान से जीने की कला सिखाने की; इसके बावजूद उनके योगदान को असीमित क्षेत्रों के लिए बताकर यदि पूरे विश्व के लोगों के ऊपर थोप दूँ तो मैं गलत हूँ यदि आप मेरे झांसे में आ जाएं तो यह और अधिक गलत होगा। गलत उनके साथ जो आपके क्षेत्र सीमा के भीतर माता श्यामा देवी जैसे, उससे कम या अधिक योगदान दिए हैं। यदि मैं इस आत्मकथा में माता श्यामा देवी का वर्णन न करूं तो यह भी अन्याय ही था, माता श्यामा देवी के प्रति हमारा अहसानफरामोशी ही होती।

2 - पूज्यनीय श्री मालिक मुंगेली और कबीरधाम जिले के कुछ गांव में शांति का संदेश देते रहे, जिन गांवों में उन्होंने लोगों को उनके आपसी विवाद से मुक्त कराया। वे उन्हें पिता के समान मानते थे अधिकांश लोग उन्हें भगवान जैसे मानते थे। यदि ये लोग अपने आजादी के सहारे श्री मालिक को पूरे विश्व के मनुष्य का पिता अथवा भगवान बताने का प्रचार करने लगें और एक दिन अचानक एक बुद्धिमान बालक जो अमेरिका या टोरेंटों से है कह दे कि श्री मालिक उनके लिए कुछ नही किये वे श्री मालिक को पिता अथवा भगवान नही मानते तो बिल्कुल सही कहने के बावजूद आप उनके ऊपर अपने आस्था और विश्वास को ठेस पहुंचाने का आरोप लगा देंगे। वह बालक बिल्कुल सही कह रहा है जबकि आप उनके हिस्से का निर्णय लेकर उनके ऊपर थोप रहे हैं, बेजाकब्जा आप करें, गुनाहगार आप रहें और सजा टोरेंटों के बेगुनाह को सजा मिले। यही स्थिति मुझे प्रेरित करती है कि अपने हिस्से का निर्णय मैं खुद लूं।

3- पूज्यनीय श्री लालाराम जोशी मेरे परदादा के पिता हैं, अत्यंत न्यायप्रिय और समानता के पक्षधर थे। सितलकुंडा (मुंगेली) के गौटिया थे, आसपास के लोग उनके धन और शक्ति से पोषित थे। आसपास के कुछ परिवार उन्हें आज भी भगवान जैसे मानते हैं। जब टेसुआ नाला जो कवर्धा और मुंगेली के रास्ते में सिलतकुंडा के पास पड़ता है बरसात में बाढ़ आता तो वे अपने नौकरों के साथ स्वयं नाव लेकर चले जाते और लोगों को नदी पार कराते, जब नाव नही बनवाये थे तब वे रस्सी और बर्तन के माध्यम से नदी पार कराते थे, जो लोग बैल गाड़ी से आये होते या जिन्हें नदी पार करवाना संभव न होते ऐसे लोगों को रात रुकने के लिए आश्रय और भोजन भी देते थे। आसपास के कुछ लोग उन्हें पालनहार, गुरु और भगवान मानते थे, मेरा भी धार्मिक आचरण उनसे ही प्रभावित है इसलिए उन्हें धर्मगुरु मानता हूं, मुझे अपने धार्मिक आस्था और विश्वास को प्रचारित करने का अधिकार है इसलिए यदि उन्हें पालनहार और धर्मगुरु अथवा भगवान के रूप में प्रचारित करने लग जाऊं तो आपको आपत्ति का अधिकार नही है। अच्छा प्रचार हो जाए तो संभव है भारत सहित अन्य देशों के कुछ लोग भी लालाराम जोशी को धर्मगुरु मामने लग जाएं, मगर जो उन्हें नही मानते अथवा जो उनसे लाभान्वित अथवा प्रेरित नहीं हुए उन्हें अपने हिस्से का सत्य बोलने का भी अधिकार छीन लिया जाए? क्या उन्हें यह बोलने का अधिकार नही रहेगा कि श्री लालाराम केवल मुंगेली जिला के कुछ चंद लोगों के पालनहार थे, कुछ चंद लोगों के ईश्वर थे, अधिकांश लोग उन्हें गुरु मानते हैं मगर मैं उन्हें धर्मगुरु नही मानूंगा क्योंकि मेरे लिए लालाराम ने कुछ विशेष नही किया है।

मुझे लगता है ये तीन कहानी आपके लिए पर्याप्त है जो आपको समझाने में सफल हो कि आप अपने हिस्से के कुछ निर्णय स्वयम लें। अभी ख़ासकर टेलीविजन चैनलों और सोशल मीडिया साइट्स के कारण जो धार्मिक आस्था का व्यापार है उसका दायर बहुत आगे और अतिसंयुक्तिपूर्ण तरीके से बढ़ जो आपके आस्था के योग्य नही कहीं वह भी आपके आस्था और विश्वास का हिस्सा तो नही हो गया, थोड़ा जांच लीजिए। कहीं जापान में ही जन्में, पले बढ़े और संकुचित रहने के बावजूद आप लालाराम जोशी, माता श्यामा देवी और श्री मालिक को अपना सबकुछ तो नहीं मान बैठे? यदि ऐसा है तो जरा समीक्षा करिए अपने मान्यता और विश्वास का। मेरे द्वारा फैलाये अफवाह के झांसे में मत आइये, अपने आदर्श खुद चुनिए, अपना गुरु खुद बनाइए, अपना ईश्वर खुद तय करिए। अपनी जननी उन्हें मानिए जिन्होंने आपको जन्म दिया है। अपना गुरु उन्हें मानिए जो आपको ज्ञान दिए हों, अपना गुरु उन्हें मानिए जो आपको रास्ते दिखाते हों। अपना पालनहार उन्हें मानिए जो आपको प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से भोजन, आवास अथवा अन्य आवश्यक वस्तुएं उपलब्ध करा रहे हों। आप अपना ईश्वर उन्हें मानिए जिन्होंने आपको जन्म दिया, पाला पोसा बढ़ाया अथवा आपकी जानमाल की कभी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप से रक्षा किया हो।

आप आजाद हैं अपना स्वयं के लिए धार्मिक सिद्धांत बनाने के लिए, आप आजाद हैं किसी भी दूसरे बने बनाए सिद्धांत को मानने के लिए, आप आजाद हैं मेरे झांसे में आकर फसने के लिए। आप अपने आजदी की भरपूर और ईमानदारी से स्तेमाल करिए, मेरे बेईमानी में मत उलझिए... मेरे जैसे अनेकों लोग हैं जो अपने गणित में आपको उलझा रहे होंगे, मेरे जैसे अनेकों कुटिल लोग हैं जो झूठे आदर्श और झूठे सिद्धांत से आपको लाद रहे होंगे। समीक्षा करिए, जांचिए, जो आवश्यक और उचित हो उन्हें आत्मसात करिए और जो आपको उचित नही लगते उन्हें त्याग दीजिए। अपने हिस्से का हर संभव निर्णय स्वयं लीजिए, मैं भी ऐसा ही कर रहा हूँ। 

मैं अपना आंख खोल रहा हूँ तो समझ मे आ रहा है मेरे शरीर, घर और आंगन में ढेरों कचरे पड़े हुए हैं। सफाई के लिए अपना झाड़ू खुद पकड़ लिया हूँ, माँ और पत्नी अपने हिस्से के कचरे साफ कर रही हैं घर आंगन तो कचरा मुक्त हो सकता है मगर मेरे अपने शरीर और शरीर के भीतर के कचरे मुझे खुद ही साफ करने हैं। घर के सजावट में कई बार मेरे छोटे बच्चे दुर्गम्या और तत्वम भी सहयोग करते हैं वे सफाई के लिए झाड़ू पोछा भी पकड़ लेते हैं मगर अपने हिस्से का सफाई मुझे ही करना है। अपने बालकनी और बरामदे में हमनें कुछ हरे और फूलदार पौधे लगा रखे हैं, पीपल और तुलसी के भी पौधे लगाए हैं, आम, काजू और अनार भी लगाए हैं। पीपल और तुलसी के बारे में मुझे जानकारी है कि वह 24 घंटे आक्सीजन अर्थात प्राण वायु देता है वातावरण को शुद्ध करता है मगर जब उनके पत्ते पीले होकर गिर जाते हैं तो कचरे फैलाते हैं इसलिए गिरे हुए पत्ते फेंक देते हैं, ठीक आम, काजू और अनार के साथ है ये हमें फल देते हैं मगर जब फूल या पत्ते गिर जाते हैं तो गिरे हुए पत्ते और फूल हमारे लिए व्यर्थ होते हैं। सदाबहार के फूल देखने मे अत्यंत मनमोहक होते हैं हमें सबको पूरे परिवार को पसंद है मगर जैसे ही फूल गिरकर गमले में आ जाएं और एकात सप्ताह उसे सफाई न किया जाए, केवल पानी ही डाला जाए तो हजारों जीवाणु पैदा हो जाते हैं कीड़े बिनबीनाते रहते हैं। इसलिए सफाई अभियान चलाइए... सफाई करिए, अनावश्यक वस्तुओं और सिद्धान्तों का त्याग करिए। अपनी उपयोगिता खुद तय करिए अपने हिस्से का निर्णय स्वयं लीजिए।

मैं अपना धर्म अपनी जाति और अपना वर्ण स्वयं निर्धारित करूँगा, दूसरे के थोपे गए को नहीं अपनाउंगा। कोई भी व्यक्ति अथवा धार्मिक नेता अपनी धार्मिक आस्था और विश्वास मुझपर नहीं थोपेगा, क्योंकि अपना धर्म तय करने में मैं सक्षम हूँ। वह चाहे कोई भी हो मेरे लिए ईश्वर अथवा धर्मगुरु नहीं बना सकेगा, मैं उसे ईश्वर मानूंगा उन्हें धर्मगुरु मानूंगा जो वास्तव में उसके लायक मेरे दृष्टिकोण में हो, क्योंकि मैं जानता हूँ जो आपका पिता है वह मेरा पिता नहीं है जो आपकी माता है वह मेरी जननी नहीं है ठीक वैसे ही आपके आराध्य मेरे लिए आराध्य नहीं हैं, अपना ज्ञान और अपनी बुद्धि अपने लिए चलाइये मेरे लिए आपको मेहनत करने की कोई जरुरत नहीं है। मैं पुनः कह देता हूँ काबिल और सक्षम हूँ मैं अपना रास्ता खुद बना सकता हूँ अपना धर्म, धर्मगुरु और ईश्वर भी तय कर लूंगा। 
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