Friday, October 09, 2020

पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता : श्री हुलेश्वर जोशी

पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता : श्री हुलेश्वर जोशी

"पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था ही नहीं वरन ऐसे सोच को भी समाप्त करना आवश्यक है; जब तक ऐसे अमानवीय व्यवस्थाएं समाप्त नही हो जाते आपके बहन, बेटियों के साथ अन्याय, अत्याचार, प्रताड़ना और हिंसा होते रहेंगे।" ऐसे सभी प्रकार के परंपराओं, व्यवस्थाओं और मानसिकता को समाप्त करने की जरूरत है जो मानव को मानव से जन्म, जाति, वर्ण, धर्म, सीमा और लिंग के आधार पर भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। मेरा मानना है कि पूरे ब्रम्हांड के लगभग सारे वर्गीकरण अमानवीय और अधार्मिक हैं, जितना जल्दी हो सके वर्गीकरण के सिद्धांतों को शून्य करने की जरूरत है। हालांकि वर्गीकरण रहित सामाजिक, राजनैतिक व्यवस्था बनाना इतना सरल नहीं हैं, यदि ऐसा होता तो हमसे पहले जन्में लाखों बुद्धजीवी में से कुछ इसे पहले ही समाप्त कर चुके होते। बेहतर होगा कि हम ऐसे सभी वर्गीकरण को बहुत कम समय में ही समाप्त करते जाएं, क्योंकि वर्गीकरण का क्रम निरंतर चलते ही रहेगा। कोई वर्गीकरण चाहे बहुत पुराने हो या नए जब उसके हानिकारक प्रभाव अधिक होने लगे तो तत्काल ऐसे वर्गीकरण को शून्य कर देनी चाहिए। वर्गीकरण के किसी भी सिद्धांत को सिरे से खारिज कर देना अनुचित हो सकता है जैसे जाति और वर्ण के विभाजन को ही ले लें वर्तमान में यह तत्काल एक क्षण विलंब किये बिना ही समाप्त करने लायक हो चुका है जबकि संभव है यह उस समय के लिए अच्छा रहा हो, हालांकि इस आधार पर शूद्रों खासकर अछूतों के साथ हुए अन्याय, अमानवीय और अधार्मिक कृत्य किसी भी शर्त में अच्छे नहीं हो सकते। 

महिला केवल हमारी पत्नी ही नहीं बल्कि माता, बहन और बेटी भी है; हर पुरुष के हिस्से में केवल एक ही महिला होगी जो उनकी पत्नी बनेगी जिसके साथ वह अत्याचार, घरेलू हिंसा जैसे अमानवीय कृत्य कर सकता है। जबकि माता, बहन और बेटी के रूप में 5 महिला तक हो सकती है आपके हिस्से में केवल ये 5 महिलाएं ही नहीं बल्कि सैकड़ों महिलाएं आपके सगे संबंधियों में शामिल हैं जिनके साथ ये अमानवीय सिद्धांत अन्याय, अत्याचार और हिंसा करने के लिए पर्याप्त है। अरे मूर्ख अमानुष जब आप अपनी पत्नी के साथ अमानवीय व्यवहार, प्रताड़ना और घरेलू हिंसा करते हो, उन्हें गुलाम की तरह कैद में रखते हो तब छद्मपुरुषार्थ का अनुभव करते हो मगर जब आपके बहन खासकर बेटियों के साथ उनके पति छद्मपुरुषार्थ के लिए ऐसे कृत्य करते हैं तो आपको पीड़ा होती है क्योंकि जिसके साथ अमानवीय व्यवहार हो रहा होता है उनसे आप प्रेम करते हैं। "यदि कोई पागल अपनी पत्नी को अपना प्रॉपर्टी, सेविका, दासी या गुलाम समझता हो तो उन्हें इस बात का भी ख्याल रखना चाहिए कि उनके ही सिद्धांत के आधार पर उनकी अपनी बहन और बेटी को भी कोई दूसरा वैसे ही समझेगा जैसा वह अपनी पत्नी या बहु को समझता है।"

मेरे एक बहुत अच्छे मित्र हैं वे अपनी प्रेमिकाओं को गिनते थे तो उन्हें बड़ा आनंद आता था, तब हम सब नाबालिग हुआ करते थे। जिन्हें वे अपनी प्रेमिका बताते थे उनमें से अपने 8वी पास होने तक एक हाथ की उंगली के बराबर लड़कियों से फिजिकल रिलेशन बना चुके थे, उनका लक्ष्य था बालिग होने तक दोनों हाथ पैर के उंगलियों और अंगूठे को गिनती में शामिल करना। इसी बीच उनकी चचेरी बहन बड़ी होने लगी थी, एक समय आया कि एक नाबालिग मित्र उनके नाबालिग बहन से फिजिकल रिलेशन के लिए प्रयास करने लगा यह बात इन्हें भी पता चला तो ये बौखला गए। मैं अपने साथियों में सबसे बड़े उम्र का था सो समझाने बुझाने का जिम्मेदारी मेरा था, जब मीटिंग हुआ तो उस नाबालिग मित्र ने मेरे मित्र से कहा कि आप अधिकतर लड़कियों से फिजिकल रिलेशन का लक्ष्य बनाए हुए हैं मतलब वैचारिक और आध्यात्मिक रूप से आप सबको अपवित्र कर चुके हैं तो मैं किसे अपनी प्रेमिका मानूं, मेरे नजर में तो केवल हम दोस्तों की ही बहन ही बची हैं जो पवित्र हैं, जिसे एक पल के लिए भी कोई अपना प्रेमिका नहीं समझा है इसलिए मैं तो आपके बहन को ही अपनी प्रेमिका मानूंगा, आपके बहन का नाम हर दोस्तों को बताऊंगा कि वह मेरी प्रेमिका है, अपने कॉपी पुस्तक में आपके बहन का ही नाम लिखूंगा, कहीं अकेले दिखने से पीछा करूँगा, आभा मारके सायरी सुनाऊंगा, अंततः आपके बहन से ही फिजिकल रिलेशन का प्रयास करूंगा। आप मुझे रोकने का प्रयास करोगे तो ठीक नहीं होगा आपके टारगेट के सारे लड़कियों के बाप और भैया को बता दूंगा, आपके घर से लेकर डिंडोरी स्कूल तक उन लड़कियों के साथ आपके नाम को दीवालों और सड़क में लिख दूंगा। ये विवाद कई घंटों के बाद समाप्त हुआ और तय हुआ कि मेरे मित्र आज के बाद किसी भी लड़की को फ्लर्ट नहीं करेगा और दूसरा मित्र भी इनके बहन को सगी बहन के बराबर सम्मान देगा। ये उन लड़कों की कहानी है जो पिछले 2साल पहले राहेन नदी में निर्वस्त्र होकर नहाया करते थे, सार्वजनिक तालाब में भी बिना गमछा या टॉवल के चड्डी बदलते थे, ये सारे बच्चे तब एक गोलाई में बैठकर नदी किनारे टॉयलेट करते थे। इस उम्र में ही जब हमें स्त्री भोग की वस्तु लगने लगी थी तो भला बताओ हम स्त्री का सम्मान कैसे कर पाएंगे। हमारी सामाजिक मानसिकता भी बड़े गजब की है, इतनी दूषित इतनी गंदी कि मुझे लिखने में और आपको पढ़ने में लज्जा आ जाये, मगर जिस हद तक मैं लिख सकता हूँ उस आंटी की भी बेशर्मी लिखूंगा। ये मानसिकता केवल उस आंटी की नहीं जिसके बारे में लिख रहा हूँ, समाज की कुछ अधिकतर महिलाओं की भी है, कुछ महिलाओं को कई बार इन मानसिकता के साथ वार्तालाप में मशगुल देखा हूँ। मैं तब 12वीं का स्टूडेंट था लगभग 20साल का हो चुका था फिर भी स्वभाव से अपने शक्ल जैसे ही स्वीट था जिसके कारण अधिकतर लोग मुझे युवा नहीं जान पाते थे। मैं किराए के मकान में रहता था जहां बड़े भैया कंप्यूटर सेंटर के शाखा प्रबंधक और शिक्षक हुआ करते थे। कभी कभी मैं भी शिक्षक का काम करता कंप्यूटर सिखाता था हालांकि वहीं मेरा स्कूल था जहां मैं पढ़ता था। अक्सर शाम को मैं छत में ही टहला करता था, एक लड़की मुझे भी पसंद थी जिसका छत मेरे छत से कुछ दूर था जब वह अपने छत में होती तो कपड़े के पहनावा और छत में टहलने की गति से उसे पहचान सकता था। चूंकि मैं माता श्यामा देवी का शिष्य हूँ इसलिए मेरे मन में किसी भी लड़की, युवती या महिला के लिए अश्लील विचार कम आते थे, मैं प्रेम में फिजिकल रिलेशन का कट्टर विरोधी था जिसके कारण मेरे दोस्त जोगीबाबा तो कहते ही थे, पीठ पीछे मेरे पुरुषार्थ को लेकर मेरा उपहास भी करते थे। उस दिन मैं शाम को छत में ही था उस मकान के लगभग सारे किरायेदार शाम को छत के अलग अलग कोने में बने चिमनी के ऊपर और आसपास बैठकर मन हल्का करते थे, तब डिंडोरी में केवल एक एसटीडी पीसीओ था जो सायद कॉन्फ्रेंस के माध्यम से आईएसडी की सुविधा भी मुहैया कराता था और दो दुकान में डब्ल्यूएलएल फोन था जहाँ से केवल राज्य के टेलीफोन और मोबाइल में बात हो सकती थी, मकान मालिक के घर एक ब्लेक एंड व्हाइट टीवी था और हम 6-7 किरायेदार में एक और टीवी था सायद रंगीन था। आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मनोरंजन का साधन नहीं था इसलिए आपस मे मिलजुल कर रहना ही रहना विकल्प था; हालांकि कुछ महिलाएं जातिगत भेदभाव और छुआछूत जैसे नीच मानसिकता से ग्रसित भी थीं जो अपने बच्चे को दूसरे बच्चों से खेलने से मना करती थी खासकर मोहल्ले के बच्चों से। छत बहुत बड़ा था, सायद उस कस्बे की सबसे बड़ा छत था फिर भी कुछ कोनो से दूसरे कोने की बात सुनी जा सकती थी।आज कुछ आंटियां छत में बैठकर किसी लड़की के चारित्रिक गुण अवगुण पर चर्चा करते हुए लड़की के माता-पिता के परवरिश पर उंगली उठा रहे थे। उस औरत के 2 या 3 लड़के थे, ठीक से याद नहीं आ रहा है। वह औरत बहुत ठेठ हिंदी छत्तीसगढ़ी में अपना पक्ष रखते हुए बोल रही थी "लड़के तो भौरा जात होते हैं, मेरे लड़का का क्या दोष? लड़की (नाम लेकर) के माता पिता को अपनी बेटी सम्हालकर रखना चाहिए, उन्हें होश होना चाहिए कि उनकी बेटी जवान हो रही है, घर में सम्हाल के रखना चाहिए, कहाँ कहाँ आती जाती है, किसके साथ जाती है? क्या कर रही है? किसके साथ क्या गुल खिला रही है? जो माता पिता अपनी बेटी को सम्हाल नहीं सकते वे पैदा ही क्यों करते हैं बेटियों को?" इतना सब कुछ सुनकर मेरे मन में आया बड़ा सा पत्थर उठाकर अपने भीतर के रावण को जिंदा कर दूं मगर वहां कोई पत्थर नहीं था हालांकि ईंट से काम चला सकता था। मेरे क्रोध का कारण था कि मेरी बहनें हैं और मैं उन्हें अपने भांति ही बराबर का आजादी देने का पक्षधर हूँ। मैं जब अपने बचपन में रात में गम्मत, सांस्कृतिक कार्यक्रम, टीव्ही, वीसीआर देखने की बात करता था तो मेरे बड़े भैया श्री देव जोशी एक ही बात बोतले थे जहां आप मोनू (मेरी बहन है) के साथ जा सकते हो वहां जरूर जाओ और जहां उन्हें नही ले जा सकते मतलब समझो कि वहां जाने योग्य नहीं है। मोनू को भी साथ ले जाओ और चले जाओ तुम्हें फूहड़ सांस्कृतिक कार्यक्रम या वीसीआर देखने जाना है। मैं इस प्रकार के शर्त इतने बार सुन चुका था कि बड़े भैया का संदेश मुझे समझ में आ चुका था और दूसरी सबसे प्रमुख बात लड़कों और पुरुषों के मानसिकता को भली भांति जानता था।

हम हजारों साल पहले के कुछ साहित्य पढ़ें तो पता चलता है कि पुरुष प्रधान समाज होने के कारण पुरुष हमेशा से महिलाओं को भोग विलास की वस्तु मानने की मानसिकता के साथ जन्म लेता है, पत्नी और संतान जिसमे बेटियां भी शामिल है को अपना संपत्ति मानता है जबकि महिलाओं के लिए ऐसे अवधारणा बनाई गई है जिसमें पति को परमेश्वर, भगवान या देवता मानकर उनके हर इच्छा के लिए समर्पित रहने और उनके सेवा करने को उनका धर्म बना दिया गया है। पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में महिलाओं की दुर्दशा ऐसी रही कि स्त्री को अपने पति का नाम लेने का भी अधिकार नही था और ऐसे अमानवीय परंपराओं में हम गौरव करने का हुंकार भरते हैं। स्त्री को संपत्ति मानकर जुआ में खेल जाना, पुत्र को बेच देना या पुत्री को दान कर देना कहाँ तक उचित था? हम जिसे गौरवशाली परंपरा मानते हैं उसमें पत्नी को वस्तु की भांति मानी जाती थी। फिर हम स्त्री के साथ, नारी के साथ या महिला के साथ मित्रता कैसे कर सकते हैं? उनके समान अधिकार को बर्दाश्त कैसे कर सकते हैं? मगर धर्म, परंपरा और संस्कृति के नाम पर आखिर कब तक महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित रखा जाए? 

अब वह दिन बहुत जल्दी ही आएगा जिसमें हम सब मिलकर पुरुष प्रधान सामाजिक मानसिकता को समाप्त कर देंगे; यदि हम ऐसा नहीं कर पा रहे हैं तो इसका तात्पर्य यह है कि हम आज भी जानवर की भांति ही हैं। पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को हिलाने के लिए बुद्धजीवियों के साथ स्त्री को भी आगे आना होगा, लड़ना होगा। पुरुषों से पहले अपनी खुद की दुषित हो चुकी मानसिकता से उन्हें मुक्त होना होगा अन्यथा उन्हें अधिक दिनों तक यथास्थिति सहते रहना पड़ेगा। स्त्री को, महिला को, नारी को या लड़कियों को माँ, बहन, बेटी, पत्नी या बहु होकर नहीं बल्कि मनुष्य होकर जीवन जीना होगा अपने हक के लिए उन्हें अपनी लड़ाई खुद लड़ना होगा ठीक ख़ुशी की तरह। खुशी आज अपने ससुराल में पूरा परिवार चला रही है, सही अर्थों में परिवार की मुखिया है क्योंकि परिवार का इकलौता कमाऊ सदस्य है। खुशी मानसिक रूप से मुझसे भी अधिक आज़ाद है हालांकि पुरुष प्रधान सामाजिक मानसिकता वाले समाज में उन्हें हजारों चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।

ख़ुशी (परिवर्तित नाम) पड़ोस की बुआ और उनके पति के रिश्ते को देखकर पति जैसे रिश्ते को दरिंदा समझ बैठी है। उनके नजर में अधिकांश पुरुष महिला को जिसे वह पत्नी मानते हैं शराब पीकर पीटते हैं, गुलाम की तरह घर के चारदीवारी में कैद रहने को मजबूर करते हैं। इसलिए वह 6-7 साल की नन्ही सी बच्ची निश्चय कर चुकी है कि वह कभी विवाह ही नही करेगी। आगे जब लगभग 10साल और बड़ी होकर कक्षा 12वी की स्टूडेंट रहती है तब थोड़ा उदार होकर विवाह की संभावना को स्वीकारते हुए सोचती है कि वह स्वयं पहले आर्थिक रूप से सक्षम होगी उसके बाद विवाह करेगी। ठीक इसी साल वह झमलु के प्रेम का शिकार हो जाती है, भीतर ही भीतर वह झमलु को अपना सर्वस्व स्वीकार लेती है मगर कुछ ही दिनों में वह खुद को पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से जकड़ी हुई गुलाम पाती है। माँ लोकलाज की दुहाई देकर उनके जीवन को निष्प्राण कर जाती है, अब हर क्षण उनके शरीर के भीतर आत्मा और मानसिकता की लड़ाई होती रहती है अब उसका शरीर शरीर नहीं बल्कि कुरूक्षेत्र का मैदान हो चुका है। कुछ समय तक जिन्हें अपना पति के रूप में पाने को संकल्पित थी, जिसे स्वप्न देखा करती थी खुद को उससे दूर करने का अथक प्रयास करती रहती है, कल्पना जो खुशी की ममेरी बहन है झमलु को भैया मानती है इस नाते खुशी को भाभी कहती है और खुशी उन्हें ननद। सुमन जो खुशी और झमलु की सहपाठी है उनका मानना था कि ये आदर्श प्रेम श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम से अधिक गहरा भले न हो मगर उससे अधिक आदर्श और पवित्र जरूर है। जब खुशी की टोली बैठती थी तो एक ही विषय हुआ करता वह है झमलु और खुशी के प्रेम; झमलु के प्रेम में होते हुए भी खुशी अपने टोली के सामने जाहिर करने की साहस नही कर पाती क्योंकि वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित खुद को मर्यादाओं की गुलाम बना चुकी है। मानसिकता के गुलामी के कारण खुशी को अक्सर सुमन और कल्पना सहित अन्य सखियों से खरी खोटी सुननी पड़ती थी, खुशी ऐसे स्थिति में थी कि वह न तो अपना प्रेम जाहिर कर पा रही थी और न तो नकार सकती थी कि उन्हें झमलु से प्रेम नही है। अब झमलु कस्बा छोड़कर परदेश जा चुका था, खुशी और झमलु एक दूसरे से दूर होने के बाद आपस में बात किये बिना भरपेट भोजन नहीं कर पाते थे क्योंकि जब तक झमलु उसके कस्बे में था रोज पोस्ट ऑफिस के बहाने उसके घर के सामने से गुजर ही जाता जिसे वह छत, खिड़की या दरवाजा के सामने से देख लेती थी। बहुत दिनों में खुशी को झमलु का मोबाइल नंबर मिला था तो वह उसे दोस्त के रूप में नए रिश्ते बरकरार रखने को आग्रह कर रोज कमसेकम एक बार बात करने के लिए राजी कर चुकी है। इस बीच खुशी विवाह योग्य हो चुकी थी, वह अपने कस्बे के ही स्कूल में पढ़ाती थी उनसे विवाह के लिए कई रिश्ते आते मगर वह मूर्ति बनकर सामने उपस्थित हो जाती थी। कुछ दुसरे या तीसरे क्रम में दुर्ग से उनके लिए रिश्ता आया वे शादी के लिए तैयार हो गए थे बारम्बार उनके घर जाते और सामाजिक दबाव के साथ विवाह के लिए आग्रह करते। यह पहली बार था जब खुशी अपना मुंह खोली और स्पष्ट शब्दों में बोल दी थी कि उनके कुछ शर्त हैं यदि शर्त स्वीकारेंगे तो ही मैं विवाह करूंगी, अन्यथा नहीं। शर्त की बात सुनकर खुशी और लड़के के परिवार और रिश्तेदार सहित लड़का भी चुप हो गया, लड़के के पिताजी पसीने से तरबतर हो गए फिर भी खुद को सम्हालते हुए बोले बताओ बेटा आपकी हर शर्त मंजूर है। खुशी फिर से बोलती है सोच लीजिये पिताजी मेरा जो शर्त है वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के ख़िलाफ है जिसे सुनकर लोगों की रूह कांप जाती है। लड़के के पिता जी बोले बताओ बेटा हमें आपकी शर्त मंजूर है, हम ऐसे किसी मानसिकता से ग्रसित नही हैं जो महिला और पुरुष में भेद करता हो। अंततः खुशी बोलने लगी :
1- मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हूँ और आगे भी आत्मनिर्भर बने रहूंगी। 
2- मैं किसी भी शर्त में पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता के अनुरूप गुलामी की जिंदगी नहीं जियूंगी।
3- मैं अकेले ही घरेलू काम नही करूंगी, मेरे होने वाले पति को भी मेरे साथ खाना बनाना होगा, बर्तन धोना होगा, झाड़ू पोछा करना होगा और कपड़े धोने जैसे सारे काम करने होंगे।
4- मैं पति परमेश्वर है, ईश्वर है, भगवान है, स्वामी है या देवता है जैसे फरेबी मानसिकता को नहीं मानती, मैं अपने पति का दोस्त होना चाहती हूँ।
5- मुझे बहु जैसे नहीं रहना है बल्कि बेटा जैसे सारे आजादी चाहिए।
6- किसी भी शर्त में मैं प्रताड़ना का शिकार नही होना चाहती, यदि मुझे मेरे पति शराब पीकर या बिना पीए मारपीट करेंगे तो उसे सहूंगी नहीं बल्कि मैं भी डंडे और लात घुसे से मारूँगी। यदि मेरे पति शराब पीकर घर या घर के बाहर हुड़दंग मचाएंगे तो मैं भी उनका साथ दूंगी, साथ में शराब पियूंगी और हुड़दंग मचाऊंगी।
7- मैं घूंघट, पर्दा और श्रृंगार अपने इच्छा के अनुसार करूंगी अर्थात ससुराल में बेटी की तरह ही रहूंगी।
8- मैं शादी होकर जाऊंगी मगर अपने माता पिता को त्यागूँगी नहीं, बल्कि कमसेकम 50% समय अपने पति सहित आकर अपने मायके में भी रहूंगी क्योंकि विवाह के बाद अपने पिताजी से संपत्ति में बटवारा लुंगी।
9- यदि मेरे शर्त स्वीकार हो तो मैं शादी करने तैयार हूं, मैं आपको वचन देती हूं कि अपने ससुराल के आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में और परिवार के लोगों का सम्मान करने में कोई कमी नही करूंगी।
10- मैं यह भी वचन देती हूं कि मैं विवाह के बाद जीवन पर्यंत साझे परिवार में रहने का प्रयास करूंगी और अपने सास ससुर की अपने माता पिता के बराबर ही सेवा और सम्मान करूंगी।

दांतों तले उंगली दबाए सब कुछ सुनते रहने के बाद लड़के के दादाजी एक पाँव में खड़े हुए और हाथ जोड़कर बोले "धन्य हैं आपके माता पिता जिन्होंने आपको जन्म और ऐसे संस्कार दिए, मैं भी चाहूंगा कि मेरी बेटी ऐसे सोच रखे मगर बेटा खुशी हम माफी चाहते हैं।" केवल इतना ही बोलकर घर से निकल गए, उसके साथ साथ उनके सारे रिस्तेदार चुपचाप निकल गए, किसी ने किसी से कुछ नही कहा। खुशी के माता पिता भी खुशी के शर्त और शब्दों की तैयारी सुनकर चौंक गए थे चूंकि खुशी के पापा शिक्षक हैं, बहुत सज्जन पुरुष हैं और सबसे खास बात यह कि वे खुशी के पापा हैं सो वे बोले बेटा मुझे गर्व है कि "मैं आपके पापा हूँ मैं आपके शर्त से सहमत हूँ क्योंकि मैं जानता हूं कि पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता महिलाओं के लिए समानांतर बिलकुल नहीं है। अधिकतर पुरुष हर शर्त में स्वयं को सर्वोच्च मानते हैं और महिलाओं के हक, अधिकार और आजादी के खिलाफ ही रहते हैं।" तीसरे दिन खुशी अपने टोली के साथ छत में बैठी हुई है कल्पना रट्टा मारके खुशी के शर्त को सुना रही है आज उनके ठहाके पड़ोसी को भी सुनाई दे रही है। सुमन कहती है "आपके शर्त इस शर्त में ही पूरे हो सकते हैं कि आपके पति के परिवार आर्थिक रूप से थोड़ा कमजोर हों, मानसिक दिवालियेपन से ग्रसित न हों और सबसे खास बात आपके पति का उम्र आपसे कम हो।" अन्यथा आपको भविष्य में अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। कल्पना कहती है "दी, यदि अभी कोई आपके हाँ में हाँ मिलाकर आपसे विवाह कर ले फिर सुहागरात मनाने के बाद या एकात संतान पैदा करने के बाद आपको धोखा दे दे तो क्या करोगी? खुशी कहती है आर्थिकरूप से सक्षम रहूंगी मतलब तलाक दे सकूंगी। इतना सब कुछ सुनने के बाद सुमन खुशी को सुझाव देती है :
1- अपने स्वयं से कम उम्र के लड़के से शादी करना, ताकि उसकी हिम्मत न हो आपसे गाली गलौज करने और मारपीट करने की।
2- आपके जैसे सोच वाली लड़कियों को स्वयं कमाऊ होना चाहिए जबकि जीवनसाथी के रूप में आर्थिक रूप से कमजोर अर्थात पत्नी के ऊपर आश्रित रहने योग्य लड़के से शादी करनी चाहिए।
3- अपने से कम अकादमिक योग्यता और कम स्किल वाले लड़के से शादी करना, ताकि आपके सामने ज्यादा होशियारी न मारे।
4- यदि विवाह के बाद भी पता चले कि आपके पति शराबी, जुआरी अथवा सट्टेबाज हो तो तत्काल उसे तलाक दे देना।
5- पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता से ग्रसित लोग आकश्मिक स्थिति में अपनी पत्नी को त्यागकर अनेक विवाह कर लेने के लिए तैयार रहते हैं वैसे ही लड़कियों को भी अपना सोच विकसित रखने की जरूरत है; किसी भी प्रकार से शारिरिक मानसिक प्रताड़ना को बर्दाश्त किये बिना कानून/न्यायालय का शरण लेने अथवा तलाक देने के लिए तैयार रहना होगा।
6- किसी भी शर्त में आत्महत्या करना व्यर्थ और अमानवीय है। 
7- हम लड़कियों को दहेज प्रताड़ना अथवा घरेलू हिंसा के झूठे मामले में फसाने वाली मानसिकता से बचकर रहना चाहिए। 

महिलाओं के मानवाधिकार और उनके लिए पुरुषों के बराबर समान आचार संहिता लागू करने के लिए आवश्यक है कि आप अपनी बेटियों को ऐसे शिक्षा दें कि वह पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता का नाश करने में अपना योगदान दे सके। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब आपकी बेटी गुलामी और गुमनामी की जिंदगी जीने के लिए मजबूर हो, दामाद शराब पीकर आपके बेटी की पिटाई करे अंतत आपकी बेटी आत्महत्या कर ले। यदि आपको खून की आँसू नही रोना है तो मेरे साथ आओ आज ही पुरूष प्रधान समाज की गंदी मानसिकता का नाश करने के लिए काम शुरू करें। यदि आप चाहते हैं कि आपकी बेटी का बलात्कार न हो, आपकी बेटी प्रताड़ना, हिंसा अथवा हत्या से सुरक्षित रहे तो बेटियों की आजादी और उनके कपड़े पर रोक लगाने से अधिक आवश्यक है कि आप अपने बेटा को लड़कियों/ महिलाओं की इज्ज़त करना सिखाइए, उनके नजरिया को बदलिए। आज हमारे समाज को बलात्कारी बनाने में बड़े पर्दे और छोटे पर्दे के सिनेमा और सोशल मीडिया का सबसे अहम योगदान है क्योंकि यहीं से अश्लीलता परोसी जा रही है इसके पहले हमारा समाज भले ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार और आजादी नही दे पाए मगर महिलाओं के लिए इतनी गंदी सोच नहीं था। आज टेलीविजन और सिनेमा महिलाओं को सशक्त करने में अवश्य महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा हो मगर लड़कियों/महिलाओं के कपड़े छोटे करने और लड़कों/पुरुषों के मानसिकता को गंदे करने में सबसे आगे है। जितना जल्दी आप और आपके पुत्र सहित पुरुष वर्ग लड़कियों/महिलाओं को भोग की वस्तु समझने के बजाय बेटी, बहन या मित्र स्वीकार लेंगे नाबालिग लड़कियों और महिलाओं जिसमें आपकी बहन और बेटियां शामिल हैं के साथ बलात्कार और क्रूरता पूर्ण हिंसा भी समाप्त हो जाएंगे। पुरुषों को अपनी गंदी मानसिकता को छोड़ना होगा, मैं अपने आसपास के अधिकतर लोगों को जानता हूँ जो आज तक भले ही किसी बलात्कार के प्रकरण में शामिल नहीं हुए हैं अर्थात बलात्कार के आरोपी नही हैं या बलात्कार नही किये हैं मगर उनकी नजरें और मानसिकता इतने गंदे हैं कि पवित्र और सार्वजनिक स्थान में खड़ी, बैठी या झुकी हुई लड़कियों और महिलाओं का भी .. .. .. कर जाते हैं। जिन लोगों को मैं जानता हूँ उनमें से अधिकतर लोग अपने संतान से भी कम उम्र के लड़कियों/महिलाओं के शारीरिक बनावट को घूरते रहते हैं ऐसे नीच लोग अंदर ही अंदर नहीं बल्कि साथियों को बोलकर भी फिजिकल रिलेशन की इच्छा जाहिर कर जाते हैं और शारीरिक बनावट को आकर्षण का केंद्र बना लेते हैं यही कारण है कि आज पुरुषों की मानसिकता अधिक गंदे होते जा रहे हैं, छोटे छोटे लड़के भी बलात्कार के आरोपी हो रहे हैं। अभी तक हुए और होने वाले सभी बलात्कार और क्रूरता के लिए मैं और आप दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं; अपनी बहन बेटियों के साथ होने वाले प्रताड़ना, हिंसा और क्रूरता के लिए भी हम सब बराबर के जिम्मेदार हैं। नाबालिग लड़कियों के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य के बाद मोमबत्ती जलाने या सरकार को कोसने के बजाय अपने संस्कार को बदलिए अपने विचार बदलिए बेहतर होगा कि अश्लीलता फैलाने वाले सारे फिल्मों और धारावाहिक में रोक लगाने में लग जाओ। 
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उल्लेखनीय है कि यह लेख श्री हुलेश्वर जोशी के आत्मकथा "अंगूठाछाप लेखक" (अबोध लेखक के बईसुरहा दर्शन) का एक अंश है।
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Wednesday, October 07, 2020

पुलिस विभाग ने शिव मंदिर का करवाया जीर्णोद्धार और रंगरोगन

पुलिस विभाग ने शिव मंदिर का करवाया जीर्णोद्धार और रंगरोगन

सन 1943 में पुलिस थाना निर्माण के बाद पुलिस अधिकारी/कर्मचारियों द्वारा निर्माण कराया गया शिव मंदिर जो पुराना पुलिस लाइन, नारायणपुर में स्थित है। यह मंदिर लंबे दिनों से जीर्णशीर्ण हो चुका था। जिसे श्री रोशन लाल गर्ग एवं श्रीमती सीमा गर्ग के विशेष योगदान से तथा रक्षित निरीक्षक श्री दीपक साव एवं पुलिस अधिकारी/कर्मचारियों द्वारा श्रमदान में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेकर मंदिर के जीर्णोद्धार में अपना अहम भूमिका निभाया। सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर के दीवाल में शिव पार्वती और अर्धनारीश्वर शिव की चित्रकारी आरक्षक श्री चमन निषाद द्वारा किया गया है।

उल्लेखनीय है कि कल दिनांक 04/10/2020 को पुलिस अधीक्षक श्री मोहित गर्ग के जन्मदिन के उपलक्ष्य में उनके पिता श्री रोशन लाल गर्ग एवं माता श्रीमती सीमा गर्ग द्वारा भगवान शिव की पूजा अर्चना कर हवन कराया गया उसके बाद भंडारा का आयोजन कर सुंदरकांड का पाठ किया गया। बाद श्री गर्ग द्वारा स्कूली बच्चों के साथ मिलकर केक काटकर उपहार बांटे गए। इस दौरान सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री जयंत वैष्णव, रक्षित निरीक्षक श्री दीपक साव, रक्षित निरीक्षक श्री प्रदीप जोशी सहित रक्षित केंद्र में तैनात अधिकारी/कर्मचारी व उनके परिवार बारी बारी से पूजा, हवन और भंडारा में शामिल होकर श्री गर्ग के सुखमय, निरोगी और दीर्घायु जीवन के लिए कामना किये।

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Saturday, September 26, 2020

Facebook हैकिंग और ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के उपाय : श्री हुलेश्वर जोशी

Facebook हैकिंग और ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के उपाय : श्री हुलेश्वर जोशी How to Secure Online Banking Frauds and Hacking of Facebook

तकनीकी युग में केवल आप और हम ही नहीं बल्कि क्रिमिनल्स भी अपडेट हो चुके हैं जो रोज नए तरीकों के साथ क्राइम करने का प्रयास करते हैं। ऐसे में हमें सायबर अपराध से बचने के लिए सावधान रहने की जरूरत है। अभी पिछले कुछ समय से सोशल मीडिया साइट्स विशेषकर फेसबुक हो हैक कर मैसेंजर में परिचितों अथवा फेसबुक फ्रेंड्स से रुपये मांगने की सूचनाएं आम होती जा रही है इसलिए अपने फेसबुक एकाउंट की सूरक्षा को नजरअंदाज न करें।

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3/ उसके बाद फेसबुक और ट्विटर इत्यादि सोशल मीडिया एकाउंट का पासवर्ड बदलियेगा।
4/ अपने सोशल मीडिया एकाउंट अथवा व्हाट्सएप्प के माध्यम से अपने दोस्तों को अवगत करावें कि आपके फेसबुक अकॉउंट को हैक कर लिया गया है; आपको रुपये/ सहयोग की जरूरत नहीं है।
संभव है इन तीन स्टेप को फॉलो करने से पुनः आपका फेसबुक हैक नही किया जा सकेगा। 

ऑनलाइन फ्रॉड से बचने के लिए कुछ महत्वपूर्ण सुझाव :
# सोशल मीडिया सहित अन्य एप्प और वेबसाइट के पासवर्ड बदलते रहें। 
# बैंकिंग क्षेत्र के पासवर्ड से मिलता जुलता पासवर्ड को सोशल मीडिया में न रखें।
# हर वेबसाइट या एप्प का मिलता जुलता या एक जैसे पासवर्ड न रखें, प्रयास करें ओटीपी बिना आपका कोई भी अकॉउंट ओपन न हो।
# ऑनलाइन शॉपिंग से संबंधित साइट्स में अपना डेबिट अथवा क्रेडिट कार्ड की डिटेल्स सुरक्षित न करें।
# सोशल मीडिया साइट्स में अपना जन्मदिन को पब्लिक न करें अथवा गलत तिथि डालें।
# किसी भी वेबसाइट में जब तक अति आवश्यक न हो अपना अकॉउंट न बनाएं, यदि बनाते हैं तब भी सेपरेट पासवर्ड डालें। ओटीपी बेस्ड लॉगिन का चयन करें।
# अपने स्मार्टफोन के अलावा एक कीपैड फ़ोन जरूर रखें, जिसमे ओटीपी प्राप्त हो।
# किसी भी शर्त में किसी भी व्यक्ति को अपना व्यक्तिगत डेटा, खाता नम्बर, क्रेडिट/डेबिट कार्ड का नम्बर, पासवर्ड और ओटीपी न दें।
# सोशल मीडिया में अनजान व्यक्ति से मित्रता न करें। 

जनहित में जारी....
HP Joshi
Narayanpur, Chhattisgarh
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Saturday, September 12, 2020

ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर, नारायणपुर की गाथा

# ऐसा ऐतिहासिक मंदिर जिसका पुलिस विभाग कर रहा है जीर्णोद्धार और सौन्दर्यीकरण।

रक्षित निरीक्षक श्री दीपक साव और पूर्व रक्षित निरीक्षक श्री एसएस विध्यराज का है विशेष योगदानl

ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर, यहां माता दंतेश्वरी देवी निवास करती हैं, पहाडी मंदिर जिला मुख्यालय, नारायणपुर में स्थिति अकेला प्रमुख धार्मिक स्थल है। यह मंदिर नारायणपुर से कुकराझोर मार्ग में कुम्हारपारा के पास ही उंचे पहाड़ी में स्थित है। चूंकि कुम्हारपारा में ही रक्षित केन्द्र स्थित है इसलिए पुलिस विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों विशेषकर पुलिस अधीक्षक और रक्षित निरीक्षकों ने समय-समय पर अपना अमूल्य योगदान देते हुए लगभग अपनी पहचान खो चूके ऐतिहासिक मंदिर का जिर्णोद्धार कराया। यह मंदिर कई दशकों से स्थित है जो अपने आप में दर्शनिक व प्राकृतिक सौन्दर्य का केंद्र बना हुआ है, नवरात्रि एवं महाशिवरात्रि जैसे पर्व के अलावा भी प्रतिदिन श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है। 


उल्लेखनीय है कि सर्वप्रथम रक्षित निरीक्षक श्री एस.एस. विंध्यराज द्वारा तात्कालीन पुलिस अधीक्षक श्री राहूल भगत और पुलिस अधीक्षक श्री मयंक श्रीवास्तव के मार्गदर्शन में अपने कार्यकाल में रक्षित केन्द्र में तैनात पुलिस अधिकारी/कर्मचारियों के सहयोग से वर्ष 2008-2013 के मध्य पहली बार मंदिर के जिर्णोद्धार का कार्य प्रारंभ करते हुए सीढ़ियों में स्टील की रेलिंग, हनुमान जी की मंदिर और जल आपूर्ति हेतु बोरिंग, मोटर और पानी की टंकी इत्यादि का निर्माण कराया था। उसके बाद से निरंतर रक्षित केन्द्र, नारायणपुर के अधिकारी/कर्मचारियों द्वारा समय समय पर छोटी-बडी निर्माण कार्य करवाया जाता रहा है।  


हाल ही में, कोरोना महामारी के दौरान पुलिस अधीक्षक श्री मोहित गर्ग की अध्यक्षता में गठित करूणा फाउण्डेशन के सहयोग एवं मार्गदर्शन में रक्षित निरीक्षक श्री दीपक साव के नेतृत्व में करूणा फाउण्डेशन तथा रक्षित केन्द्र नारायणपुर के अधिकारी/कर्मचारियों के सहयोग से पुनः ऐतिहासिक पहाड़ी मंदिर के सौन्दर्यीकरण का कार्य किया गया है। इसके तहत् पहाड़ी मंदिर प्रांगण में पुराने कलस की साफ सफाई कर रंगों से कलाकृति फ्लॉवर पॉट गमला बनाया गया, रेलिंग, टाइल्स, हवन यज्ञ तैयार किया गया तथा जिर्णोद्धार, सौदर्यीकरण, प्लांटेशन, पत्थरों में चित्रकारिता एवं साज सज्जा के साथ सेल्फी पॉइंट तैयार किया गया, 5नए स्थायी कूड़ादान तैयार कराया गया तथा यात्री प्रतीक्षालय का मरम्मत कार्य व पहाडी मंदिर में टीन शेड का निर्माण भी कराया गया है। करूणा फाउण्डेशन के उपाध्यक्ष श्री रोहित साव के द्वारा हाल ही में 4 अगस्त 2020 को पहाडी मंदिर में राम दरबार की स्थापना भी कराया गया है। 


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Sunday, August 16, 2020

देश की अखण्डता और आंतरिक सुरक्षा के लिए आम नागरिकों का योगदान भी आवश्यक - श्री हुलेश्वर जोशी

देश की अखण्डता और आंतरिक सुरक्षा के लिए आम नागरिकों का योगदान भी आवश्यक - श्री हुलेश्वर जोशी
स्वतंत्रता दिवस पर विशेष लेख

आज स्वतंत्रता दिवस है, आज ही के दिन सन 1947 को हमारा भारत वर्षों के गुलामी से मुक्त हुआ। स्वतंत्रता दिवस केवल अंग्रेजी साम्राज्य से मुक्त होने का महज फार्मेलिटी नहीं है। स्वतंत्रता दिवस पावन पर्व है, हर भारतीय के लिए उत्सव है, हर धार्मिक सामाजिक उत्सव/त्योहार से बड़ा और महान उत्सव है। स्वतंत्रता दिवस ऐसा पर्व है ऐसा उत्सव है जो हमें मनुष्य होने पहचान और अधिकार देता है। आज पर्व है दासता और गुलामी से मुक्ति का; आज पर्व है समानता और न्याय सहित लाखों प्रकार के अधिकार हासिल करने का। इसलिए यह महज़ अंग्रेजों से आज़ादी का नहीं बल्कि अधिकारों की गारंटी का उत्सव है।

हमारे भारत के लिए, हम भारतीयों के लिए बड़े गर्व का विषय है कि हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अपने प्राणों की आहुति देकर हमें गुलामी से मुक्त किया और लाखों अधिकार दिए। हमें उनके योगदान और संघर्ष से प्रेरणा लेकर देश के लिए समर्पित रहने की जरूरत आज भी है, आज हमें अपने देश को आजाद रखने के साथ साथ देश के हर नागरिकों को समान अधिकार देने के लिए संकल्प लेकर काम करने की जरूरत है अर्थात जाति, धर्म, समाज अथवा सीमा से परे रहकर सबको साथ लेकर चलने की जरूरत है।

देश की अखण्डता और संप्रभुता की रक्षा का दायित्व केवल तीनों सेनाओं से ही संभव नही है, बल्कि केंद्रीय और राज्य सशस्त्र बलों, जिला पुलिस बल और विशेष पुलिस अधिकारियों सहित आम नागरिकों के योगदान की भी जरूरत होती है। किसी भी देश की सुरक्षा के लिए विदेशी दुश्मनों, आतंकवाद, सीमा सुरक्षा और नक्सलवाद से सुरक्षा ही पर्याप्त नहीं है बल्कि आंतरिक सुरक्षा भी अहम है; जिसके लिए प्रत्येक नागरिक को अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने की जरूरत है।

आम जनता से अनुरोध है कि वे देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए स्थानीय पुलिस और प्रशासन का सहयोग करें; विशेषकर छत्तीसगढ़ के बस्तर और सरगुजा संभाग के सभी जिले, दुर्ग संभाग के राजनांदगांव, बालोद और कबीरधाम जिला तथा रायपुर संभाग के धमतरी, महासमुंद और गरियाबंद जिला के आम लोगों से विशेष अनुरोध है कि वे किसी भी प्रकार के नक्सल गतिविधियों की जानकारी तत्काल स्थानीय पुलिस को दें। क्योंकि नक्सलवाद किसी भी स्थिति में देश, राज्य अथवा समाज के विकास में सहायक नहीं हो सकता बल्कि वे आपके हिस्से के आजादी को छीन लेते हैं, आपको भय और आतंक के साए में जीने को विवश करते हैं और आपको वर्तमान युग से पीछे खींच कर अपने दासता के लिए विवश करते हैं। 

आज नक्सलियों का केवल एक ही मकसद है सरकार और आम लोगों को परेशान करना, ठेकेदारों आम लोगों को आतंकित करके रुपये ऐठना और खुद अच्छे जीवन एन्जॉय करना। नक्सली जो सड़क, पुल पुलिया, अस्पताल और स्कूल या सरकारी भवन को तोड़ते हैं वह आम नागरिकों को ही परेशान करते हैं; नक्सली नही चाहते कि सरकार मूलनिवासी लोगों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अनेक प्रकार के सुविधाओं से सुसज्जित गांव और शहर में रहने का अवसर न दे सके। नक्सलियों द्वारा जो सरकारी संपत्ति को नष्ट कर रहे हैं वह आपके ही हिस्से के प्रॉपर्टी को नष्ट करके आपको ही सुविधाओं से वंचित करके आपके विकास के गति को अवरूद्ध कर रहे हैं। इसलिए आपसे अनुरोध है नक्सल मूवमेंट की जानकारी स्थानीय पुलिस को जरूर दें; यदि आप किसी नक्सली के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से संपर्क में हैं तो उन्हें आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित करें। छत्तीसगढ़ सरकार द्वारा आत्मसमर्पित करने वाले लोगों को समाज के मुख्यधारा में जोड़ने के लिए नीति निर्माण किया गया है जिसके तहत उन्हें और उनके परिवार को बेहतर जीवन की गारंटी दी जाती है।

अंत में; यही कहना चाहूंगा कि देश के हर नागरिक अपने संवैधानिक अधिकारों और कर्तव्यों के लिए जागरूक रहे। देश की अखंडता और सुरक्षा के लिए अपना योगदान दे ताकि युगयुगान्तर तक हम अपने आजादी का जश्न मना सकें; किसी भी परिस्थिति में हमसे हमारी आजादी न छीन सके। हम अपने हर प्रकार के नागरिक अधिकारों का लाभ ले सकें, किसी भी नागरिक के मानव अधिकारों का हनन न हो।
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आपको भी आ सकता है हार्ट अटैक - स्वास्थ्य जागरूकता पर आधारित लेख

Heart Attack के कारण और बचाव के उपाय - श्री हुलेश्वर जोशी

(स्वास्थ्य जागरूकता पर आधारित लेख)

यदि आप नशीले पदार्थों का सेवन करते हैं या जंकफूड खाते हैं; कठोर परिश्रम या योगा अथवा व्यायाम नहीं करते और स्मार्टफोन अथवा लेपटॉप / कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करते हैं तो सावधान 50% से अधिक गारंटी है कि आपको Heart Attack होगा।

महिलाओं में हार्ट अटैक से बचने के लिए पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता होती है, मगर यदि कोई महिला नशीले पदार्थों का सेवन, जंकफूड का सेवन और स्मार्टफोन अथवा लेपटॉप/कंप्यूटर का अधिक इस्तेमाल करती हो तो मोनोपॉज के 5-10 साल के बाद पुरुषों के बराबर ही संभावना होगी कि उन्हें भी Heart Attack आ जाए। इसलिए महिलाओं को नशीले पदार्थों के सेवन से बचना चाहिए।

खराब और असंयमित दिनचर्या के कारण अब 30 साल से कम उम्र के युवाओं में भी Heart Attack की संभावना दिनोंदिन बढ़ती जा रही है; इसलिए सीने में अधिक दर्द होने की स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय सहायता लें।

Heart Attack से बचाव कैसे संभव है?
# कभी भी किसी भी शर्त में नशीले पदार्थों का सेवन न करें।
# जंकफूड अर्थात अधिक तेल में तले भोज्यपदार्थों का सेवन न करें। भोजन में सलाद और कम पके सब्जियों को शामिल करें। अधिक मसालेदार भोजन आपके सेहत के लिए हानिकारक ही होगा। अपने भोजन में न्यूनतम मात्रा में ही नमक को शामिल करें।
# स्मार्टफोन, गैजेट्स, लेपटॉप अथवा कंप्यूटर सिस्टम का न्यूनतम इस्तेमाल करें।
# नितमित रूप से कठोर शारीरिक परिश्रम करें; अर्थात अपने सारे काम खुद करें। यदि संभव न हो तो योगा अथवा व्यायाम करें।
# भरपूर नींद लें और तनावमुक्त रहें।
# मोटापा से बचें।
# बेवजह औषधियों के प्रयोग से बचें।

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आवश्यक सूचना : उपरोक्त जानकारी लेखक के जानकारी के आधार पर लिखे गए हैं, यह किसी भी प्रकार से दावा अथवा गारंटी नहीं है।
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Wednesday, August 12, 2020

कृष्ण जन्माष्टमी और गुरु बालकदास जयंती पर विशेष लेख - श्री हुलेश्वर जोशी

कृष्ण जन्माष्टमी और गुरु बालकदास जयंती पर तुलनात्मक अध्ययन- श्री हुलेश्वर जोशी


एतद्द्वारा मैं हुलेश्वर जोशी (लेखक) समस्त ब्रम्हांड के जीवजंतुओं को कृष्ण जन्माष्टमी और गुरु बालकदास जयंती की शुभकामनाएं देता हूँ; चूंकि आज भगवान कृष्ण और गुरु बालकदास का जन्मोत्सव है इसलिए उनके संबंध में कुछ सामान्यतः समान रोचक तथ्य बताना चाहता हूं :-


भगवान श्रीकृष्ण और गुरु बालकदास का जन्म हिंदी कैलेंडर के अनुसार एक ही मास- भाद्रपद, पक्ष - अंधियारी (कृष्ण), दिवस - अष्टमी को हुआ था। इसलिए भगवान कृष्ण के जन्म को कृष्ण जन्माष्ठमी के रूप में मनाया जाता है तो गुरु बालकदास के जन्म को उनके जयंती के रुप में मनाया जाता है।


श्रीकृष्ण माता देवकी और वाशुदेव के आठवें संतान हैं, इनके लालन पालन माता यशोदा और नंद बाबा करते हैं। गुरु बालकदास माता सफुरा और गुरु घासीदास के द्वितीय संतान हैं।


भगवान श्रीकृष्ण जी द्वापर में यादव कुल में जन्म लेकर राजा के संतान न होने के बावजूद राजा बने और सनातन धर्म को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया वहीं गुरु बालकदास भी किसी राजा के संतान न होकर गुरु घासीदास के पुत्र के रूप में जन्म लेकर राजा की उपाधि हासिल किए और सतनाम धर्म के स्थापना के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाया।


श्रीकृष्ण और गुरु बालकदास अपने क्षमता के बल पर राजा तो बनते हैं मगर राज्य नहीं कर पाते हैं बल्कि धर्म की स्थापना के लिए जीवनपर्यंत संघर्ष करते रहते हैं।


श्रीकृष्ण की एक प्रेमिका राधा और 8 पत्नियां रुक्मणि, जाम्बवन्ती, सत्यभामा, कालिन्दी, मित्रबिन्दा, सत्या, भद्रा और लक्ष्मणा थी, जबकि गुरु बालकदास की दो पत्नी नीरा और राधा थी।


श्रीकृष्ण के 80 पुत्र होने के प्रमाण मिलते हैं जिसमें रूखमणी के संतान प्रद्युम्न (ज्येष्ठ पुत्र) और केवल एक बेटी चतुमति हैं; जबकि गुरु बालकदास के केवल एक ही पुत्र साहेबदास हुए, साहेबदास की माता राधामाता हैं जबकि दो बेटियां गंगा और गलारा नीरामाता के गर्भ से जन्म लेती हैं।


श्रीकृष्ण का हत्या गांधारी के श्राप के कारण एक शिकारी के तीर से होता है तो वहीं गुरु बालकदास की हत्या उनके जातिवादी सामंतों द्वारा एम्बुश लगाकर किया जाता है।


जब श्रीकृष्ण जी द्वापर में जन्म लिए तब ऊँचनीच की भावना से समाज बिखरा पड़ा था, उन्होंने स्वयं वर्णव्यवस्था के खिलाफ रहकर प्राकृतिक न्याय के आधार पर काम करते हुए सनातन धर्म के लोगों को दुष्टों और पापियों से मुक्त किया तो वहीं गुरु बालकदास ने समाज में व्याप्त सैकड़ों बुराइयों के खिलाफ काम करते हुए अविभाजित मध्यप्रदेश (छत्तीसगढ़ सहित) में सैकड़ो जातियों और अनेकों धर्म के लोगों को अमानवीय अत्याचार के खिलाफ संगठित कर सतनामी और सतनाम धर्म के अनुयायी बनाये तथा बिना किसी भेदभाव के मानवता की पुर्नस्थापना के लिए सबको समान अधिकार देने तथा महिलाओं के साथ होने वाले अमानवीय अत्याचार जिसमें मुख्यतः डोला उठाने की अमानवीय कृत्य पर रोक लगाया और सतनाम धर्म में अखाड़ा प्रथा का शुरुआत किया।


श्रीकृष्ण जी ने स्वयं तथा पांडवों के साथ मिलकर भारतवर्ष को दुराचारियों से मुक्त करने के लिए लड़ाई लड़ा और सनातन धर्म को सुरक्षित किया तो वहीं गुरु बालकदास ने स्वयं तथा सतनामी लठैतों के साथ मिलकर समाज में व्याप्त हिंसक लोगों के खिलाफ आम लोगों के मानव अधिकार और स्वाभिमान की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ा और भारतवर्ष विशेषकर मध्यप्रदेश के लोगों को समान सामाजिक जीवन प्रदान किया।


श्रीकृष्ण अपने पूर्व के ज्ञानी महात्माओं, देवी देवताओं के दर्शन की समीक्षा करके नवीन वैज्ञानिक दृष्टिकोण का प्रतिपादन किया तो वहीं गुरु बालकदास देश में व्याप्त बुराइयों की संभावनाओं के खिलाफ सशक्त समाज के लिए वैचारिक क्रांति का दर्शन प्रस्तुत किया।


श्रीकृष्ण ने प्रेम, आध्यात्म और दर्शन के माध्यम से अथवा सुदर्शन चक्र के प्रयोग के माध्यम से न्याय को स्थापित करने का काम किया तो गुरु बालकदास ने गुरु घासीदास बाबा के "मनखे मनखे एक समान" के सिद्धान्त को स्थापित करने के लिए रावटी, शांति सद्भावना सभा और शक्ति के माध्यम से दुराचारियों को नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत के आधार पर जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। अर्थात दोनो ही पहले शांति का संदेश लेकर आते हैं और दुष्टों को भी एकमत होने का अनुरोध करते हैं और जब दुष्ट शांति संदेश को मानने से इनकार करके न्याय स्थापित करने में अवरोध पैदा करते हैं तो दुष्ट के नरसंहार के लिए शक्ति का प्रयोग करते हैं ताकि हर मनुष्य को समान जीवन और सम्मान का अधिकार मिल सके।


श्रीकृष्ण और गुरु बालकदास दोनों ही जबतक अत्यंत आवश्यक न हो अर्थात थोड़ा भी शांति और सुलह की संभावना हो तब तक हिंसा के मार्ग का विरोध करते हैं।


श्रीकृष्ण और गुरु बालकदास दोनों ही शाकाहार की बात करते हैं और गाय को माता मानते हैं।


श्रीकृष्ण आत्मा को अजरअमर और शोकमुक्त बताते हैं तथा उनका मानना था कि पुनर्जन्म और मोक्ष और मोक्ष उपरांत पुनः मनवांछित जन्म मिलता है वे इसके लिए भगवान ब्रम्हा को उत्तरदायी समझते हैं तो वहीं गुरु बालकदास जीवन काल में ऐसे कर्म करने का सलाह देते हैं जिससे सतलोक (पृथ्वी) में जीवन के दौरान ही आपका परलोक अर्थात अमरलोक (मृत्य उपरांत नाम की अमरता) निर्धारित हो सके।


श्रीकृष्ण पांच तत्वों की उपलब्धता को साबित करते हुए सृष्टि के संचालन के लिए इन पांचों तत्व को जिम्मेदार बताते हैं तो ठीक कृष्ण के समानांतर ही गुरु बालकदास भी पांच तत्व (सतनाम) को ही सृष्टि की रचना और संचालन के कर्ताधर्ता मानते हैं।


श्रीकृष्ण के अनुयायी उनके जन्मोत्सव मनाने के लिए उनका व्रत उपवास रखते हैं और दहीहांडी खेल का आयोजन करते हैं तो वहीं गुरु बालकदास के अनुयायी जैतखाम और निशाना में पालो चढाते हैं, पंथी नृत्य करते हैं और मंगल चौका आरती गाते हैं।


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माफीनामा : अज्ञानतावश लेखनीय त्रुटियों के लिए मैं हुलेश्वर जोशी (लेखक) सनातन धर्म और सतनाम धर्म के अनुयायियों से माफी चाहता हूं।

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Tuesday, August 11, 2020

मिनीमाता पुण्यतिथि विशेष - श्री हुलेश्वर जोशी

मिनीमाता की पुण्यतिथि पर सादर श्रद्धांजलि - श्री हुलेश्वर जोशी


(15 मार्च 1913 - 11 अगस्त 1972)


आज मिनीमाता की पुण्यतिथि है; वही मिनीमाता उर्फ मीनाक्षी जो स्वतंत्र भारत मे अविभाजित मध्यप्रदेश में प्रथम महिला सांसद हुई जो तीन बार सांसद रही। दिल्ली में विशेषकर मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और असम के लोगों के लिए आश्रयस्थल रही; सतनामी समाज मे जन्मी, साहू समाज द्वारा पालन पोषण की गई और गुरु घासीदास बाबा की बहू अर्थात संविधान निर्माता सांसद गुरु आगम दास की अर्धांगिनी हुई। मिनीमाता मुख्यतः छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और असम में अत्यंत पूज्यनीय है। मिनीमाता हर महिलाओं के लिए प्रेरणास्रोत हैं इनके जीवन और समाज के लिए दिए गए योगदान अत्यंत प्रेरणादायक है।


मिनीमाता जगतजननी के रूप में भी विख्यात रही है; जो भी अमीर गरीब लोग दिल्ली स्थित उनके निवास में जाते वे उनके वात्सल्य से पोषित और संरक्षित होने का सौभाग्य प्राप्त करते। मिनीमाता किसी एक जाति, धर्म अथवा सीमाक्षेत्र के लिए ही नहीं वरन सम्पूर्ण भारतीयों के लिए अत्यंत पूज्यनीय है।


लगभग 5 दशक पूर्व आज के दिन ही दिल्ली के निकट विमान हादसे में मिनीमाता सतलोक गमन कर गई थी।

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Monday, August 03, 2020

मुझे नीचता का सर्टिफिकेट दे दो - श्री हुलेश्वर जोशी

मुझे नीचता का सर्टिफिकेट दे दो - हुलेश्वर जोशी

अरे कथित ज्ञानी लोग, तुम उच्च नीच की उपाधि देते हो, नीचता के लिए भी कोई इवेंट करवा दो। मैं भी नीच होने के लिए इवेंट में शामिल होना चाहता हूं, मुझे उच्च की नहीं बल्कि नीच की उपाधि प्रदान करना। 

अच्छे क़्वालिटी के पेपर में रंगीन सजावट वाले सर्टिफिकेट देना प्लीज, ताकि अपने दीवाल में लटका सकूं।

मूर्खों; जिसे तुम जन्म के आधार पर नीच मानते हो उसी पैमाने में खुद की भी समीक्षा करके देखो तब पता चलेगा कि क्या वास्तव में वह नीच और तुम उच्च हो।

अरे मूर्खों; जन्म के आधार पर उच्च नीच की दूषित मानसिकता से ऊपर उठकर मनुष्य बनो।

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रक्षाबंधन विशेष; भाई का संदेश बहनों के नाम - हुलेश्वर जोशी

रक्षाबंधन विशेष; भाई का संदेश बहनों के नाम - हुलेश्वर जोशी

पूरे ब्रम्हांड की समस्त बहनें जो मुझे राखी पहनाती हैं और जो बहनें राखी पहनाए बिना भी मेरे सुखमय, सफलतम और दीर्घायु जीवन के लिये अपने आराध्य से प्रार्थना करती हैं, उन्हें सादर प्रणाम।

मैं उन्हें वचन देता हूँ कि यथासंभव उनके रक्षा के लिए जीवनपर्यंत काम करता रहूंगा। जो बहनें पुरुष प्रधान समाज में पिछले हजारों जन्म से प्रताड़ित हैं उनके रक्षा के लिए मैं पुरूष प्रधान समाज को हिलाकर कमजोर करने तथा नर - नारी में असमानता अर्थात पक्षपात पूर्ण मानसिकता को समाप्त करने के लिए संकल्पित हूँ। 

इस रक्षाबंधन की पावन अवसर पर अपनी बहनों को कुछ गुरुमंत्र देता हूँ, जो पुरूष प्रधान समाज के मानसिकता के खिलाफ तो है मगर मानवता की मूल है और मेरी बहनों के मानवाधिकार के अनुकूल है। ये गुरुमंत्र हमारे धार्मिक सिद्धांतों के आधार पर, इसप्रकार से हैं :-
1- "नर नारायण हैं तो नारी नारायणी है।"
2- "पुरुष देवता हैं तो महिलाएं देवी है।"
3- "नर परमेश्वर हैं तो मादा परमेश्वरी है।
4- "पुरूष भगवान हैं तो महिलाएं भगवती है।"
5- "नर स्वामी हैं तो नारी साम्राज्ञी है।"

उपरोक्त बातों के आधार पर निष्कर्ष निकाला जाए तो हमें ज्ञात होता है कि ब्रम्हांड में नर और मादा अर्थात मनुष्य में महिला और पुरूष का समान रूप से योगदान और पूज्यनीय हैं। यदि; 
1- यदि महिलाएं खाना बना सकती हैं, बर्तन पोछा, कपड़ा धोना और अन्य घरेलू काम कर सकती हैं तो पुरूष इन सारे काम को कर सकते हैं यदि कोई पुरूष अपंग न हो।
2- यदि पति(पुरूष) पत्नी(महिलाओं) को दासी समझने की मानसिकता से ग्रसित हैं तो पत्नी(महिलाएं) भी पति(पुरुषों) को अपना दास अथवा गुलाम मान सकते हैं।
3- यदि पति पत्नी के ऊपर अत्याचार करने लगे तो पत्नी को प्रताड़ित होते रहने के बजाय अत्याचार के मुहतोड़ जवाब देने अर्थात अपनी रक्षा करने का अधिकार है।
4- यदि पत्नी पति का पैर दबाती है मालिश करती है तो पति का भी दायित्व है कि वह आवश्यक होने पर पत्नी की पैर दबाए और मालिश करे।
5- अर्थात सारांश यह कि जिस तरह के मानसिकता से हम ग्रसित हैं उससे ऊपर उठकर बेहतर और समान जीवन पद्धति को अपनाएं। 
6- केवल बेटियां ही व्याह कर बहु बनने न जाएं बल्कि किसी बेटा को व्याहकर उसे घर जमाई बनाएं।
7- पुरूष अक्सर अपने से छोटी उम्र की लड़की से विवाह करता है ताकि उसपर अपना हक जमा सके उसपर अत्याचार कर सके; इसलिए लड़कियां भी अपने से कम उम्र और योग्यता के लड़के से शादी करे ताकि पति उन्हें प्रताड़ित करने के बजाय डर सके।
8- यदि लड़की अपनी काबिलियत से कमाने अर्थात परिवार की जरूरत के बराबर रुपये कमाने में सक्षम हैं तो बेरोजगार और बेकार लड़के से ही शादी करे और नौकरानी रखने के बजाय अपने पति से सारे घरेलू काम करवाए।
9- बहनों से भी निवेदन है किसी भी शर्त में दहेज प्रताड़ना अथवा अन्य प्रताड़ना के झूठे मुकदमे दर्ज न करवाएं; एक व्यक्ति की गलती की सजा उनके पूरे परिवार को न दें। यदि आपको विश्वास है कि आपके पति आपके योग्य नहीं अथवा आपको खुश नहीं रख सकेंगे तो तत्काल उनसे अलग हो जाएं, अलग रहकर दूसरे किसी के उकसावे से परे रहकर स्वयं निर्णय लें कि आपको तलाक देना है कि अपने अधिकार के लिए लड़ना है।
10- विवाहित और अविवाहित महिलाओं को जिस प्रकार से अपने मनपसंद वस्त्र और श्रृंगार की आजादी है ठीक उतनी ही आजादी विधवा महिलाओं को भी है।
11- बालकों का लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम, घरेलू हिंसा और कार्यस्थल में महिलाओं के संरक्षण संबंधी नियमों की जानकारी रखें साथ ही भारतीय संविधान को पढ़ें ताकि आप अपने अधिकारों से भलीभांति परिचित हो सकें।

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उल्लेखनीय है कि लेखक श्री हुलेश्वर जोशी, पुलिस अधिकारी हैं जो कुरीतियों के खिलाफ सामाजिक जागरूकता का काम कर रहे हैं।
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Fight With Corona - Lock Down

Citizen COP - Mobile Application : छत्तीसगढ़ पुलिस की मोबाईल एप्लीकेशन सिटीजन काॅप डिजिटल पुलिस थाना का एक स्वरूप है, यह एप्प वर्तमान में छत्तीसगढ़ राज्य के रायपुर एवं दुर्ग संभाग के सभी 10 जिले एवं मुंगेली जिला में सक्रिय रूप से लागू है। वर्तमान में राज्य में सिटीजन काॅप के लगभग 1 लाख 35 हजार सक्रिय उपयोगकर्ता हैं जो अपराधमुक्त समाज की स्थापना में अपना योगदान दे रहे है। उल्लेखनीय है कि इस एप्लीकेशन को राष्ट्रीय स्तर पर डिजिटल इंडिया अवार्ड एवं स्मार्ट पुलिसिंग अवार्ड से सम्मानित किया गया है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि इसे शीघ्र ही पूरे देश में लागू किये जाने की दिशा में भारत सरकार विचार कर रही है। अभी सिटीजन काॅप मोबाईल एप्लीकेशन डाउलोड करने के लिए यहां क्लिक करिए - एच.पी. जोशी

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