पाली और संस्कृत की उत्पत्ति: BCE गणना के आलोक में एक भाषावैज्ञानिक शोध-निबंध
यह शोध-निबंध पाली और संस्कृत भाषाओं की उत्पत्ति, विकास-क्रम और पारस्परिक संबंध का अध्ययन BCE (ईसा-पूर्व) समय-सीमा के आधार पर करता है। भाषावैज्ञानिक साक्ष्य—ध्वन्यात्मक परिवर्तन, व्याकरणिक संरचना, छंद-विन्यास, तथा अभिलेखीय प्रमाण—के आधार पर यह प्रतिपादित किया गया है कि संस्कृत का वैदिक रूप दूसरी सहस्राब्दी BCE में सुस्पष्ट रूप से उपस्थित था, जबकि पाली मध्य-इंडो-आर्यन चरण में, लगभग छठी से पहली शताब्दी BCE के बीच साहित्यिक रूप में स्थापित हुई। अध्ययन यह भी स्पष्ट करता है कि पाली, संस्कृत की “उत्पत्ति” नहीं, बल्कि उसी इंडो-आर्यन भाषिक परिवार की एक उत्तरवर्ती विकासधारा है।
1. प्रस्तावना
भारतीय आर्य भाषाओं का विकास इंडो-यूरोपीय परिवार की इंडो-आर्यन शाखा से हुआ। भाषावैज्ञानिक पुनर्निर्माण (comparative reconstruction) के आधार पर प्रोटो-इंडो-आर्यन का विभाजन लगभग 2000 BCE या उससे कुछ पूर्व माना जाता है। इसके बाद पुरातन (Old Indo-Aryan) चरण में वैदिक संस्कृत का उद्भव हुआ, जिसने भारतीय बौद्धिक परंपरा की आधारभूमि तैयार की। मध्य-इंडो-आर्यन (Middle Indo-Aryan) चरण में विभिन्न प्राकृत रूप विकसित हुए, जिनमें पाली एक मानकीकृत साहित्यिक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई।
2. संस्कृत की उत्पत्ति और BCE समय-निर्धारण
संस्कृत का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत है, जिसका प्रमुख स्रोत Rigveda है। भाषिक, छंदात्मक और ऐतिहासिक विश्लेषण के आधार पर इसका रचनाकाल लगभग 1500–1200 BCE (कुछ विद्वानों के अनुसार 1700–1100 BCE की व्यापक सीमा) माना जाता है। वेदिक संस्कृत की विशेषताएँ—जैसे जटिल संधि-नियम, विभक्ति-प्रणाली की समृद्धि, तथा ध्वनियों का अपेक्षाकृत प्राचीन रूप—इसे पुरातन इंडो-आर्यन स्तर पर स्थापित करती हैं।चौथी शताब्दी BCE के आसपास Panini द्वारा रचित अष्टाध्यायी ने संस्कृत के व्याकरण को मानकीकृत किया। इससे स्पष्ट होता है कि उस समय तक संस्कृत एक परिपक्व, व्यवस्थित भाषा बन चुकी थी, जिसकी जड़ें कई शताब्दियों पूर्व तक जाती हैं।
3. पाली की उत्पत्ति और ऐतिहासिक साक्ष्य
पाली को मध्य-इंडो-आर्यन श्रेणी में रखा जाता है। यह भाषा बौद्ध धर्म के थेरवाद परंपरा से संबद्ध है और उसका प्रमुख ग्रंथ-समूह Tipiṭaka है। ऐतिहासिक दृष्टि से बुद्ध का जीवनकाल लगभग 6वीं–5वीं शताब्दी BCE माना जाता है। बौद्ध उपदेश प्रारंभ में मौखिक रूप में संरक्षित रहे। पाली कैनन का लिखित संकलन श्रीलंका में पहली शताब्दी BCE के आसपास माना जाता है। भाषावैज्ञानिक विश्लेषण से स्पष्ट है कि पाली में संस्कृत की अपेक्षा ध्वनि-सरलीकरण (जैसे “ऋ” का “अ” या “इ” में रूपांतरण), संधि-नियमों का लोप, तथा व्याकरणिक रूपों का संक्षेपण मिलता है। ये लक्षण उसे मध्य-इंडो-आर्यन विकास-चरण में स्थापित करते हैं।
4. तुलनात्मक विश्लेषण
यह तुलनात्मक तालिका दर्शाती है कि संस्कृत और पाली में विकासात्मक संबंध है, परंतु पाली संस्कृत से प्रत्यक्ष “उत्पन्न” नहीं, बल्कि समान पूर्वज से विकसित उत्तरवर्ती धारा है।
5. निष्कर्ष
BCE गणना और भाषावैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि संस्कृत का वैदिक रूप दूसरी सहस्राब्दी BCE में विद्यमान था, जबकि पाली मध्य-पहली सहस्राब्दी BCE में एक मानकीकृत साहित्यिक भाषा के रूप में उभरी। दोनों भाषाएँ इंडो-आर्यन परिवार की सदस्य हैं, पर उनकी काल-रेखाएँ और विकास-स्तर भिन्न हैं। इस प्रकार वैज्ञानिक अध्ययन यह स्थापित करता है कि संस्कृत भाषिक परंपरा में प्राचीनतर है, जबकि पाली उसी परंपरा का मध्यकालीन, सरलीकृत और लोकाभिमुख रूप है।
Huleshwar Prasad Joshi












