भारतीय परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय की दिशा में निजी क्षेत्र में आरक्षण की आवश्यकता और औचित्य
भारतीय समाज की ऐतिहासिक संरचना गहन सामाजिक स्तरीकरण पर आधारित रही है। जाति, वर्ण और आर्थिक विभाजन ने सदियों तक समाज के एक बड़े वर्ग को अवसरों से वंचित रखा। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् भारतीय संविधान ने सामाजिक न्याय को राष्ट्र-निर्माण का मूलाधार बनाया। अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण की व्यवस्था इसी उद्देश्य से की गई कि ऐतिहासिक अन्याय की भरपाई की जा सके।
इसी संदर्भ में साहित्यकार और चिंतक हुलेश्वर प्रसाद जोशी का यह कथन अत्यंत सारगर्भित है— “समूचे ब्रह्मांड में ऐसा कोई संगठित सभ्यता नहीं जहां, किसी न किसी रूप में आरक्षण न हो।”
यह कथन आरक्षण की अवधारणा को केवल संवैधानिक नीति के रूप में नहीं, बल्कि एक सार्वभौमिक सामाजिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है।
आरक्षण: एक प्राकृतिक एवं सामाजिक व्यवस्था
यदि हम समाज की मूल इकाई—परिवार—को देखें, तो वहाँ भी आरक्षण की अवधारणा स्वाभाविक रूप से विद्यमान है।
- परिवार में नवजात शिशु को विशेष संरक्षण दिया जाता है।
- बच्चों के लिए भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य की प्राथमिक व्यवस्था सुनिश्चित की जाती है।
- वृद्धजनों और बीमार सदस्यों के लिए विशेष देखभाल की जाती है।
क्या यह भी एक प्रकार का "पारिवारिक आरक्षण" नहीं है?
यह व्यवस्था योग्यता या प्रतिस्पर्धा के आधार पर नहीं, बल्कि आवश्यकता और संरक्षण के सिद्धांत पर आधारित होती है। परिवार यह नहीं कहता कि नवजात शिशु ने कोई परीक्षा उत्तीर्ण की है, इसलिए उसे सुविधा मिले; बल्कि उसकी कमजोरी और आवश्यकता को देखते हुए विशेष अधिकार दिए जाते हैं। इसी प्रकार समाज में भी जो वर्ग ऐतिहासिक रूप से वंचित और कमजोर रहे हैं, उन्हें विशेष अवसर देना सामाजिक न्याय का स्वाभाविक सिद्धांत है।
सामाजिक न्याय और निजी क्षेत्र की भूमिका
1991 के आर्थिक उदारीकरण के पश्चात भारत की अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र की भूमिका अत्यधिक बढ़ी है। सूचना प्रौद्योगिकी, बैंकिंग, सेवा, विनिर्माण और बहुराष्ट्रीय कंपनियों में रोजगार के अवसरों का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र में केंद्रित है। आज सरकारी नौकरियों का प्रतिशत सीमित है, जबकि रोजगार सृजन का मुख्य आधार निजी क्षेत्र बन चुका है। ऐसे में यदि आरक्षण केवल सरकारी क्षेत्र तक सीमित रहे, तो सामाजिक न्याय की प्रक्रिया अधूरी रह जाएगी। जब राष्ट्र की अर्थव्यवस्था का बड़ा भाग निजी संस्थानों के हाथों में है, तब सामाजिक समावेशन की जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए।
निजी क्षेत्र में आरक्षण की आवश्यकता
1. ऐतिहासिक असमानता का संतुलन : वंचित वर्गों को सदियों तक शिक्षा, संसाधन और अवसरों से दूर रखा गया। आज भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और नेटवर्किंग तक उनकी पहुंच सीमित है। केवल “समान अवसर” की घोषणा पर्याप्त नहीं; प्रारंभिक असमानता को संतुलित करना आवश्यक है।
2. प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना : उच्च प्रबंधन, तकनीकी और कॉर्पोरेट पदों पर वंचित वर्गों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम है। निजी क्षेत्र में आरक्षण से सामाजिक विविधता और संतुलन बढ़ेगा।
3. संवैधानिक आदर्शों की पूर्ति : भारतीय संविधान की प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की स्थापना का संकल्प है। जब निजी कंपनियाँ सार्वजनिक संसाधनों, कर-रियायतों और अवसंरचना का लाभ उठाती हैं, तब उनसे सामाजिक उत्तरदायित्व निभाने की अपेक्षा स्वाभाविक है।
4. आर्थिक सशक्तिकरण ही वास्तविक सामाजिक परिवर्तन : रोजगार आर्थिक स्वतंत्रता का आधार है। जब वंचित वर्ग निजी क्षेत्र में भी समान भागीदारी पाएंगे, तब सामाजिक समरसता और आत्मसम्मान की भावना सुदृढ़ होगी।
आरक्षण: योग्यता के विरुद्ध नहीं, अवसर की समानता के पक्ष में
आरक्षण को अक्सर योग्यता के विरुद्ध बताया जाता है। परंतु यह तर्क अपूर्ण है। आरक्षण प्रतिस्पर्धा को समाप्त नहीं करता; बल्कि प्रतिस्पर्धा की प्रारंभिक रेखा को संतुलित करता है। जिस प्रकार परिवार में कमजोर सदस्य को अतिरिक्त संरक्षण देना अन्य सदस्यों के अधिकारों का हनन नहीं, बल्कि संतुलन की प्रक्रिया है, उसी प्रकार सामाजिक आरक्षण भी संतुलन का साधन है। हुलेश्वर प्रसाद जोशी का कथन इसी सार्वभौमिक सिद्धांत की ओर संकेत करता है कि हर संगठित समाज में किसी न किसी रूप में प्राथमिकता, संरक्षण और विशेष अवसर की व्यवस्था होती है। यही आरक्षण का मूल दर्शन है।
संभावित चुनौतियाँ और समाधान
निजी क्षेत्र में आरक्षण लागू करने में कुछ व्यावहारिक चुनौतियाँ हैं—
- वैश्विक प्रतिस्पर्धा
- कानूनी जटिलताएँ
- निवेश पर संभावित प्रभाव
- किन्तु इनका समाधान संतुलित और चरणबद्ध नीति से संभव है।
संभावित उपाय:
- कौशल विकास कार्यक्रमों में वंचित वर्गों की प्राथमिकता
- कॉर्पोरेट विविधता नीति (Diversity Policy)
- सामाजिक ऑडिट और पारदर्शिता
- प्रोत्साहन आधारित मॉडल (टैक्स लाभ आदि)
निजी क्षेत्र में आरक्षण की मांग केवल राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय का तार्किक विस्तार है। जब राष्ट्र की आर्थिक संरचना में निजी क्षेत्र की निर्णायक भूमिका है, तब सामाजिक समावेशन की जिम्मेदारी भी साझा होनी चाहिए। परिवार में नवजात शिशु को दिया गया संरक्षण जिस प्रकार स्वाभाविक और न्यायसंगत है, उसी प्रकार समाज के वंचित वर्गों को दिया गया आरक्षण भी न्यायसंगत है।
हुलेश्वर प्रसाद जोशी का यह कथन कि— “समूचे ब्रह्मांड में ऐसा कोई संगठित सभ्यता नहीं जहां, किसी न किसी रूप में आरक्षण न हो।” आरक्षण को एक सार्वभौमिक सामाजिक सिद्धांत के रूप में स्थापित करता है।
अतः भारतीय परिप्रेक्ष्य में सामाजिक न्याय की पूर्ण स्थापना हेतु निजी क्षेत्र में आरक्षण पर गंभीर, संवेदनशील और नीतिगत पहल समय की मांग है। यही समतामूलक और समावेशी भारत की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होगा।







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