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शुक्रवार, जुलाई 31, 2026

सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी

सूचना का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब झूठी और भ्रामक सूचना पर होगी जवाबदेही : अधिवक्ता डी.पी. जोशी
The Right to Information will be meaningful only when there is accountability for false and misleading information: Advocate D.P. Joshi

#एक नज़र में
• लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना देना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की भावना के विपरीत है।
• सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के अंतर्गत दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
• धारा 20(2) के तहत सूचना आयोग संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।
• प्रत्येक गलत सूचना दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है जब यह सिद्ध हो कि सूचना जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण अथवा अभिलेखों के विपरीत दी गई है।
• रिकॉर्ड छिपाना, सूचना नष्ट करना या जानबूझकर गुमराह करना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
• पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही सूचना है, जबकि भ्रामक सूचना लोकतंत्र और विधि के शासन पर जनता के विश्वास को कमजोर करती है।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है जिसने शासन को जनता के प्रति अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जवाबदेह बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम केवल सूचना प्राप्त करने का कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है। नागरिकों को सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक कार्यवाही तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के अभिलेखों तक वैधानिक पहुँच प्रदान करना इसका मूल उद्देश्य है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब सरकार के कार्य जनता की निगरानी के दायरे में हों और जनता को सही एवं प्रमाणिक जानकारी समय पर प्राप्त हो।

इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer – PIO) होता है। उसकी जिम्मेदारी केवल सूचना भेज देना नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सही, पूर्ण, प्रमाणिक और समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर गलत, अपूर्ण अथवा भ्रामक सूचना देता है, रिकॉर्ड के विपरीत उत्तर देता है, सूचना छिपाता है या सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करता है, तो वह केवल एक नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को भी आघात पहुँचाता है।

इसी उद्देश्य से अधिनियम की धारा 20 में दंडात्मक व्यवस्था की गई है। यदि केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग यह पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार किया, निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई, जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना दी, सूचना नष्ट कर दी अथवा सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न की, तो आयोग उस अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 20(2) के अंतर्गत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।

हालाँकि, कानून का उद्देश्य प्रत्येक त्रुटि पर दंड देना नहीं है। न्याय का मूल सिद्धांत है कि दंड तभी लगाया जाए जब यह प्रमाणित हो कि अधिकारी ने दुर्भावना से कार्य किया, उपलब्ध अभिलेखों के विपरीत उत्तर दिया या जानबूझकर सत्य तथ्यों को छिपाया। इसलिए प्रत्येक मामले में सूचना आयोग तथ्यों, अभिलेखों और परिस्थितियों का स्वतंत्र परीक्षण करता है।

भारतीय न्यायपालिका ने भी सूचना के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना है। सर्वोच्च न्यायालय ने State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (1975) में स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनता को शासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि सरकार अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी है। इसी प्रकार S.P. Gupta v. Union of India (1981) में न्यायालय ने कहा कि खुलापन (Openness) लोकतांत्रिक शासन का अनिवार्य तत्व है और गोपनीयता अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।

बाद में CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना है, किन्तु इसका प्रयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक व्यवस्था अनावश्यक रूप से बाधित हो जाए। यह निर्णय नागरिकों के अधिकार और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।

इसी प्रकार Manohar v. State of Maharashtra (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सूचना आयोगों को अधिनियम के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए तथा जहाँ आवश्यक हो, वहाँ दंडात्मक प्रावधानों का उपयोग भी करना चाहिए। यह निर्णय इस सिद्धांत को बल देता है कि सूचना का अधिकार तभी प्रभावी होगा जब उसके उल्लंघन पर उत्तरदायित्व भी तय किया जाए।

आज अनेक मामलों में देखा जाता है कि सूचना मांगने वाले नागरिकों को गोलमोल, अधूरी या विषय से असंबंधित जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद "सूचना उपलब्ध नहीं है" कह दिया जाता है या ऐसे उत्तर दिए जाते हैं जिनसे वास्तविक तथ्य छिप जाएँ। ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं करतीं, बल्कि पूरे सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। यदि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह जाएगा।

दूसरी ओर, नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सूचना का अधिकार प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनहित और पारदर्शिता का संवैधानिक साधन है। यदि उन्हें प्राप्त सूचना गलत या भ्रामक प्रतीत होती है, तो उन्हें अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर प्रथम अपील, द्वितीय अपील अथवा सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए। प्रमाण-आधारित आपत्ति ही न्यायिक और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक प्रभावी होती है।

आज आवश्यकता केवल सूचना उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सही सूचना उपलब्ध कराने की है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच विश्वास का आधार सत्य, प्रमाणिक और पारदर्शी सूचना होती है। इसलिए ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोक सूचना अधिकारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के प्रावधानों का निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यही सुशासन की पहचान, लोकतंत्र की मजबूती और विधि के शासन का वास्तविक सम्मान है।

अधिवक्ता डी.पी. जोशी
एल.एल.बी., एल.एल.एम. (क्रिमिनल लॉ)
मोबाइल नंबर : 9893354327

गुरुवार, जुलाई 23, 2026

क्या है आपका अधिकार ? जानें क्या कहता है "भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क)"


क्या है आपका अधिकार ? जानें क्या कहता है "भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(क)"

# लोकतंत्र की आत्मा : अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार
{आलेख : एच.पी. जोशी}

What are your rights? Find out what "Article 19(1)(a) of the Indian Constitution" says.
भारतीय संविधान विश्व के सर्वश्रेष्ठ लोकतांत्रिक संविधानों में से एक माना जाता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल शासन की संरचना निर्धारित नहीं करता, बल्कि प्रत्येक नागरिक की स्वतंत्रता, गरिमा और मौलिक अधिकारों का भी संरक्षण करता है। संविधान के भाग-III में वर्णित मूल अधिकार व्यक्ति और राज्य के मध्य संतुलन स्थापित करते हैं तथा यह सुनिश्चित करते हैं कि राज्य की शक्तियाँ नागरिकों की स्वतंत्रता का अनुचित हनन न कर सकें।

इन्हीं मूल अधिकारों में अनुच्छेद 19(1)(क) प्रत्येक भारतीय नागरिक को वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करता है। यह अधिकार केवल बोलने तक सीमित नहीं है, बल्कि लिखने, प्रकाशित करने, विचार व्यक्त करने, सरकार की नीतियों की आलोचना करने, सूचना के आदान-प्रदान, कला, साहित्य, पत्रकारिता तथा अन्य शांतिपूर्ण माध्यमों से अपनी बात रखने की स्वतंत्रता भी प्रदान करता है। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक कितनी निर्भीकता से अपने विचार व्यक्त कर सकते हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर अपने अनेक ऐतिहासिक निर्णयों द्वारा इस अधिकार की संवैधानिक महत्ता को स्पष्ट किया है।

पश्चिम बंगाल राज्य बनाम प्रोटेक्शन ऑफ डेमोक्रेटिक राइट्स समिति, पश्चिम बंगाल के मामले में यह अभिनिर्धारित किया गया है कि भारतीय संविधान के भाग तीन द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार नैसर्गिक अधिकार है और उसे किसी संवैधानिक संशोधन या अन्य अधिनियम के तहत समाप्त नहीं किया जा सकता है।

भाग 3 में दिए गए अधिकार राज्य की शक्ति के विरोध गारंटी है, न कि सामान्य व्यक्तियों के अवैध कृत्यों के विरुद्ध।

44वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 के द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है कि "अनुच्छेद 19(1)(क)" में प्रदत्त अधिकारों को अब केवल देश पर युद्ध या बाह्य आक्रमण के कारण देश की सुरक्षा के लिए संकट उत्पन्न होने की दशा में ही निलंबित किया जा सकता है। "सशस्त्र विद्रोह" के आधार पर मूल अधिकारों को निलंबित नहीं किया जा सकता है।

इसी प्रकार ए.आर. अंतुले बनाम आर.एस. नायक के मामले में उच्चतम न्यायालय की सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह अभिनिर्धारित किया है कि न्यायालय ऐसे आदेश या निर्देश नहीं दे सकता है जो नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्लंघन करता हो।

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ख) प्रत्येक नागरिक को बिना हथियार के शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन करने का अधिकार प्रदान करता है। लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में यह अधिकार नागरिकों को अपने विचार सामूहिक रूप से रखने, जनमत निर्माण करने तथा संविधान सम्मत तरीके से अपनी असहमति व्यक्त करने का अवसर प्रदान करता है। यही कारण है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सम्मेलन का अधिकार लोकतंत्र के दो ऐसे स्तंभ हैं जिन पर उत्तरदायी शासन व्यवस्था आधारित रहती है।

हालाँकि यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि अनुच्छेद 19(1)(क) द्वारा प्रदत्त स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष (Absolute) नहीं है। संविधान के अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य भारत की संप्रभुता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय की अवमानना, मानहानि तथा अपराध के लिए उकसावे जैसे आधारों पर विधि द्वारा युक्तियुक्त प्रतिबंध लगा सकता है। इसलिए अधिकार और उत्तरदायित्व दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं।

लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि नागरिकों की स्वतंत्र चेतना, तर्कशीलता, असहमति को सम्मान देने की संस्कृति तथा शासन की उत्तरदायित्वपूर्ण समीक्षा में निहित होती है। जहाँ प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता समाप्त हो जाती है, वहाँ लोकतंत्र धीरे-धीरे औपचारिकता बनकर रह जाता है।

मेरा विश्वास है कि जिस प्रकार धर्म केवल उच्च आदर्शों, मानवीय मूल्यों और कर्तव्यों से नहीं वरन् तर्क और विज्ञान की कसौटियों पर खरा उतरने से महान होता है ठीक उसी प्रकार से कोई देश कितना महान है ये इस बात पर निर्भर करता है कि नागरिकों को सरकार के विरुद्ध कितना अधिक कारगर तरीके से बोलने और अभिव्यक्ति रखने की आजादी मिलती है। यदि किसी राष्ट्र में नागरिकों को बोलने और अभिव्यक्ति की आजादी; शांतिपूर्ण और बिना हथियार सम्मेलन का अधिकार; शिक्षा, स्वास्थ्य और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति का अधिकार; और गरिमामय जीवन जीने का अधिकार प्राप्त नहीं है तो ये प्रमाणित है कि वो राष्ट्र वास्तव में राजतंत्र है और वहां के नागरिक गुलाम।

भारतीय संविधान का उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं, बल्कि एक ऐसे समाज की स्थापना करना है जहाँ प्रत्येक व्यक्ति सम्मान, समान अवसर और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के साथ जीवन व्यतीत कर सके। संविधान की यही भावना भारत को एक सशक्त, उत्तरदायी और लोकतांत्रिक गणराज्य बनाती है।

"जब तक नागरिक निर्भय होकर सत्य बोल सकते हैं, तब तक लोकतंत्र जीवित रहता है; और जब सत्य बोलना अपराध बन जाए, तब लोकतंत्र का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है।"

(H.P. Joshi)
लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी
श्री हुलेश्वर प्रसाद जोशी मानव अधिकारों के जानकार और "मानव अधिकार के अनछुए पहलू" के लेखक हैं।

मंगलवार, जुलाई 21, 2026

बरसात : जीवनदायिनी या बीमारियों और मौत का सौदागर ?


बरसात : जीवनदायिनी 'या' बीमारियों और मौत का सौदागर ?
@जानें बरसात में स्वस्थ और निरोगी रहने के उपाय
लेखक : एच.पी. जोशी

भारत में बरसात केवल एक मौसम नहीं, बल्कि जीवन का उत्सव है। जैसे ही काले बादल आसमान में छाते हैं और पहली वर्षा की बूंदें धरती को स्पर्श करती हैं, वातावरण में एक नई ऊर्जा का संचार होने लगता है। सूखी धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, खेतों में नई उम्मीदें अंकुरित होती हैं, नदियाँ और तालाब जीवन से भर उठते हैं तथा पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक सभी वर्षा का स्वागत करते हैं। भारतीय कृषि, अर्थव्यवस्था, जैव विविधता और पेयजल का बड़ा हिस्सा आज भी मानसून पर निर्भर है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में वर्षा को सदैव जीवनदायिनी, समृद्धि की दूत और प्रकृति का अमूल्य उपहार माना गया है। किन्तु प्रकृति का यही वरदान यदि लापरवाही, गंदगी और वैज्ञानिक जागरूकता की कमी के साथ जुड़ जाए, तो यही मौसम अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है। मानसून के आगमन के साथ ही अस्पतालों में मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ने लगती है। कहीं डेंगू और मलेरिया के रोगी भर्ती होते हैं, कहीं टाइफाइड, हैजा और डायरिया के मामले सामने आते हैं, तो कहीं वायरल बुखार, निमोनिया और त्वचा संक्रमण लोगों को परेशान करने लगते हैं। अनेक परिवारों में यह मौसम खुशियाँ लेकर आता है, तो कई परिवारों के लिए चिंता, आर्थिक बोझ और कभी-कभी अपूरणीय क्षति का कारण भी बन जाता है। हर वर्ष लाखों लोग मानसून से जुड़ी बीमारियों से प्रभावित होते हैं। इनमें सबसे अधिक जोखिम छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं, बुजुर्गों तथा पहले से किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को होता है। इसलिए यह समझना आवश्यक है कि समस्या स्वयं वर्षा नहीं, बल्कि वर्षा के बाद बनने वाली परिस्थितियाँ हैं।

# क्या वास्तव में बारिश बीमारियाँ फैलाती है ?
यह प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या बारिश होने से लोग बीमार पड़ते हैं? विज्ञान इसका उत्तर स्पष्ट रूप से "नहीं" देता है। क्योंकि वर्षा स्वयं किसी रोग का कारण नहीं होती। बीमारी तब फैलती है जब वर्षा के कारण वातावरण में ऐसे परिवर्तन होते हैं जो बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद, परजीवी और रोग फैलाने वाले मच्छरों के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार कर देते हैं। मानसून के दौरान वायु में आर्द्रता बढ़ जाती है, तापमान में परिवर्तन होता है, अनेक स्थानों पर जलभराव हो जाता है, नालियाँ उफनने लगती हैं, सीवर का पानी पेयजल स्रोतों में मिल सकता है और भोजन अपेक्षाकृत जल्दी खराब होने लगता है। यही परिस्थितियाँ संक्रामक रोगों के प्रसार का मार्ग प्रशस्त करती हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO), भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR), राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) तथा भारत सरकार का स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय प्रत्येक वर्ष मानसून के दौरान विशेष सावधानी बरतने की सलाह देता है, क्योंकि यह मौसम जलजनित, मच्छरजनित और भोजनजनित रोगों के लिए अत्यंत अनुकूल माना जाता है

# जानें क्या है वर्षा और सूक्ष्मजीवों का विज्ञान ?
हमारे चारों ओर लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीव मौजूद रहते हैं। इनमें बैक्टीरिया, वायरस, फफूंद और परजीवी शामिल हैं। सामान्य परिस्थितियों में इनमें से अनेक सूक्ष्मजीव लंबे समय तक जीवित नहीं रह पाते, लेकिन नमी और मध्यम तापमान इनके विकास के लिए आदर्श वातावरण प्रदान करते हैं। बारिश के बाद वातावरण में नमी बढ़ने से बैक्टीरिया और फफूंद तेजी से बढ़ते हैं। कई प्रकार के वायरस भी अधिक समय तक सक्रिय बने रहते हैं। दूषित जल में मौजूद रोगजनक जीवाणु भोजन और पेयजल के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। यही कारण है कि मानसून में डायरिया, हैजा, टाइफाइड, पीलिया, फूड पॉइजनिंग और अन्य जलजनित रोगों की घटनाएँ बढ़ जाती हैं।

# जानें कैसे बढ़ता है मच्छरों का साम्राज्य ?
यदि मानसून में इंसानों और जानवरों सबसे बड़ा दुश्मन किसी एक जीव को कहा जाए, तो वह मच्छर है। वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार केवल पाँच से सात दिन तक जमा रहने वाला पानी मच्छरों के हजारों लार्वा विकसित करने के लिए पर्याप्त होता है। डेंगू फैलाने वाला एडीज एजिप्टी (Aedes aegypti) मच्छर साफ और रुके हुए पानी में पनपता है। इसके विपरीत मलेरिया फैलाने वाला एनोफिलीज (Anopheles) मच्छर विभिन्न प्रकार के जलस्रोतों में विकसित हो सकता है। चिकनगुनिया भी मुख्यतः एडीज मच्छर के माध्यम से फैलता है। कूलर, पानी की टंकियाँ, गमलों की तश्तरियाँ, पुराने टायर, टूटे बर्तन, नारियल के खोल और छत पर जमा पानी मच्छरों के सबसे सुरक्षित प्रजनन स्थल बन जाते हैं।

@ क्या आप जानते हैं?
* डेंगू फैलाने वाला मच्छर सामान्यतः दिन में अधिक सक्रिय रहता है।
* केवल एक चम्मच जितना रुका हुआ पानी भी मच्छरों के अंडे देने के लिए पर्याप्त हो सकता है।
* घर के भीतर जमा साफ पानी भी डेंगू का बड़ा कारण बन सकता है।

# जानें सबसे अधिक खतरा किसे ?
बरसात का मौसम सभी के लिए समान रूप से जोखिमपूर्ण नहीं होता। कुछ वर्गों में संक्रमण की संभावना और जटिलताएँ अधिक होती हैं।
@ बच्चे : बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली पूरी तरह विकसित नहीं होती। वे स्कूल, खेल और सामूहिक गतिविधियों के कारण जल्दी संक्रमण की चपेट में आते हैं। डायरिया, वायरल बुखार, डेंगू और निमोनिया उनके लिए गंभीर रूप ले सकते हैं।
@ गर्भवती महिलाएँ : गर्भावस्था के दौरान शरीर में कई जैविक परिवर्तन होते हैं। संक्रमण होने पर माँ और गर्भस्थ शिशु दोनों प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए गर्भवती महिलाओं को दूषित भोजन, संक्रमित पानी और मच्छरों से विशेष सुरक्षा की आवश्यकता होती है।
@ बुजुर्ग : बढ़ती उम्र के साथ प्रतिरक्षा क्षमता कम होने लगती है। यदि मधुमेह, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, अस्थमा या गुर्दे की बीमारी पहले से मौजूद हो, तो साधारण संक्रमण भी गंभीर जटिलताओं में बदल सकता है।
@ दीर्घकालिक रोगों से पीड़ित व्यक्ति : कैंसर, एचआईवी, प्रतिरक्षा-दमित रोगी, स्टेरॉयड लेने वाले मरीज और प्रत्यारोपण (Transplant) करा चुके लोगों में संक्रमण का खतरा सामान्य लोगों की तुलना में कहीं अधिक होता है।

# बरसात में होने वाली प्रमुख बीमारियाँ कौन कौन सी हैं ?
1. डेंगू : डेंगू एक वायरल रोग है, जो एडीज एजिप्टी मच्छर के काटने से फैलता है। यह मच्छर प्रायः सुबह और शाम के समय अधिक सक्रिय रहता है तथा साफ और रुके हुए पानी में अंडे देता है।
इसके प्रमुख लक्षण हैं—
- तेज बुखार
- सिर एवं आँखों के पीछे दर्द
- शरीर और जोड़ों में तीव्र दर्द
- त्वचा पर लाल चकत्ते
- कमजोरी और प्लेटलेट्स की संख्या में कमी
अधिकांश रोगी सामान्य उपचार से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में डेंगू रक्तस्रावी (Hemorrhagic Dengue) या डेंगू शॉक सिंड्रोम का रूप लेकर जानलेवा बन सकता है। इसलिए तेज बुखार होने पर स्वयं दवा लेने के बजाय चिकित्सकीय जांच कराना आवश्यक है।

2. मलेरिया : मलेरिया प्लाज्मोडियम नामक परजीवी से होता है, जो एनोफिलीज मच्छर द्वारा फैलता है। इसके लक्षणों में ठंड लगकर तेज बुखार आना, अत्यधिक पसीना आना, सिरदर्द, उल्टी और कमजोरी शामिल हैं। समय पर उपचार न मिलने पर यह मस्तिष्क, यकृत और गुर्दों को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है।

3. चिकनगुनिया : यह भी मच्छरों से फैलने वाला वायरल रोग है। इसमें तेज बुखार के साथ जोड़ों में इतना अधिक दर्द हो सकता है कि कई रोगियों को महीनों तक चलने-फिरने में कठिनाई होती है। कुछ लोगों में यह दर्द लंबे समय तक बना रह सकता है।

4. टाइफाइड : दूषित पानी और भोजन के माध्यम से फैलने वाला यह रोग साल्मोनेला टाइफी जीवाणु के कारण होता है। यदि समय पर उपचार न मिले तो आंतों में गंभीर संक्रमण और अन्य जटिलताएँ उत्पन्न हो सकती हैं।

5. डायरिया और हैजा : बरसात में दूषित पानी पीना अनेक जलजनित रोगों का सबसे बड़ा कारण है। डायरिया और हैजा शरीर में पानी और लवणों की गंभीर कमी (डिहाइड्रेशन) पैदा कर सकते हैं, जो विशेष रूप से छोटे बच्चों और बुजुर्गों के लिए अत्यंत खतरनाक है।

6. लेप्टोस्पायरोसिस : यह बीमारी संक्रमित पशुओं के मूत्र से दूषित पानी या कीचड़ के संपर्क में आने से फैलती है। बारिश के दौरान जलभराव वाले क्षेत्रों में कार्य करने वाले लोगों को इसका खतरा अधिक रहता है।

7. वायरल हेपेटाइटिस (पीलिया) : दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलने वाले हेपेटाइटिस A और E मानसून के दौरान अधिक देखने को मिलते हैं। इससे यकृत (लीवर) प्रभावित होता है और रोगी को पीलिया, कमजोरी, उल्टी तथा भूख न लगने जैसी समस्याएँ होती हैं।

बरसात में क्या करें?
✔️ केवल गर्म और ताजा भोजन ही खाएं।
✔️ केवल स्वच्छ और सुरक्षित पानी पिएँ। यदि पानी की शुद्धता संदिग्ध हो, तो उसे उबालकर ही उपयोग करें।
✔️ घर और आसपास कहीं भी पानी जमा न होने दें। कम से कम सप्ताह में एक बार कूलर, गमले और पानी के बर्तनों की सफाई करें।
✔️ मच्छरदानी लगाएं, पूरी बाँह के कपड़े पहने और यथा संभव मच्छररोधी क्रीम का उपयोग करें।
✔️ घर का बना ताज़ा और गर्म भोजन ही खाएँ। तिल, मूंगफली और जचकी लड्डू खाएं।
✔️ गुड़ को अपने भोजन में शामिल करें।
✔️ फल और सब्जियों को अच्छी तरह धोकर उपयोग करें।
✔️ बच्चों को खुले में रखे खाद्य पदार्थ खाने से रोकें।
✔️ नियमित रूप से साबुन से हाथ धोने की आदत डालें।
✔️ बुखार, उल्टी, दस्त या सांस लेने में कठिनाई होने पर तुरंत चिकित्सकीय सलाह लें।
✔️ अपनी हेल्थ के अनुसार पानी में भींगने से बचें। खासकर हल्की फुहारों से बचाव के लिए टोपी जरूर पहनें।
✔️ यदि भींगने से एलर्जी हो छतरी, रेनकोट हेलमेट, मास्क लगाएं।
✔️ विशेषकर बच्चों, बुजुर्गों और बीमार लोगों के लिए आवश्यक है कि रात्रि में अथवा सोने के समय शरीर को गर्म रखने के लिए सॉफ्ट और मोटे ब्लैंकेट का उपयोग करें।

 बरसात में क्या न करें?
✘ सड़क किनारे खुले खाद्य पदार्थों का सेवन न करें।
✘ बासी रोटी, भोजन इत्यादि न खाएँ।
✘ तेज बुखार में बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक या दर्दनाशक दवाएँ न लें।
✘ डेंगू की आशंका होने पर बिना चिकित्सकीय सलाह के ऐसी दर्दनिवारक दवाओं से बचें जो रक्तस्राव का जोखिम बढ़ा सकती हैं।
✘ घर के आसपास कचरा या पानी जमा न रहने दें।
✘ बीमारी के शुरुआती लक्षणों को हल्के में न लें तत्काल नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र जाएं


जानें क्या है मिथक ?

बारिश में भीगने से ही बुखार आता है।
सत्य: बीमारी का कारण संक्रमण है, केवल भीगना नहीं।

डेंगू का मच्छर केवल गंदे पानी में पनपता है।
सत्य: यह साफ और रुके हुए पानी में भी पनपता है।

हर बुखार में एंटीबायोटिक जरूरी है।
सत्य: वायरल संक्रमण में एंटीबायोटिक प्रभावी नहीं होती।

केवल गरीब बस्तियों में डेंगू होता है।
सत्य: डेंगू किसी भी क्षेत्र में फैल सकता है यदि मच्छरों के प्रजनन की परिस्थितियाँ मौजूद हों।


क्या आप जानते हैं?
- विश्व में मच्छर सबसे अधिक मानव मृत्यु से जुड़े जीवों में गिने जाते हैं।
- केवल 20 सेकंड तक साबुन से हाथ धोने की आदत अनेक संक्रामक रोगों के प्रसार को काफी हद तक रोक सकती है।
- अधिकांश मानसूनी बीमारियों की रोकथाम स्वच्छता, सुरक्षित पानी और मच्छर नियंत्रण से संभव है।

अंततः हम इस निष्कर्ष में पहुंचते हैं कि बरसात जीवनदायिनी तो है किंतु बीमारियों और मौत का सौदागर नहीं! यह प्रकृति का अनुपम उपहार है, जो मानव जीवन, कृषि, पर्यावरण और जल संसाधनों का आधार है। किंतु जब स्वच्छता की अनदेखी होती है, दूषित जल का उपयोग किया जाता है, मच्छरों को पनपने दिया जाता है और बीमारी के प्रारंभिक लक्षणों की उपेक्षा की जाती है, तब यही मौसम अनेक गंभीर बीमारियों का कारण बन जाता है। ऐसी स्थिति में हम बरसात को दोषारोप करते हुए कह सकते हैं कि बरसात केवल जीवनदायिनी नहीं बल्कि बीमारियों और मौत का सौदागर भी है। विज्ञान हमें बताता है कि मानसून का आनंद और सुरक्षा दोनों साथ-साथ संभव हैं। इसके लिए आवश्यक है कि प्रत्येक नागरिक स्वच्छता को जीवनशैली का हिस्सा बनाए, सुरक्षित पेयजल का उपयोग करे, संतुलित आहार ले, मच्छरों के प्रजनन को रोके और बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर समय पर चिकित्सा सहायता प्राप्त करे। बरसात हमें केवल प्रकृति की सुंदरता का अनुभव ही नहीं कराती, बल्कि यह भी सिखाती है कि जीवन की रक्षा के लिए जागरूकता, अनुशासन और वैज्ञानिक सोच कितनी आवश्यक है।

"बारिश प्रकृति का आशीर्वाद है; इसे अभिशाप केवल हमारी अर्थात इंसानों की लापरवाही ही बनाती है। आइए, इस मानसून स्वच्छता अपनाएँ, मच्छरों को पनपने से रोकें, सुरक्षित भोजन और स्वच्छ पानी का उपयोग करें तथा स्वयं, अपने परिवार और समाज को स्वस्थ रखने का संकल्प लें।"

(एच.पी. जोशी)
लेखक, विचारक, दार्शनिक एवं पुलिस अधिकारी

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