The Right to Information will be meaningful only when there is accountability for false and misleading information: Advocate D.P. Joshi
#एक नज़र में
• लोक सूचना अधिकारी (PIO) द्वारा जानबूझकर गलत, अपूर्ण या भ्रामक सूचना देना सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की भावना के विपरीत है।
• सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20(1) के अंतर्गत दोषी लोक सूचना अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगाया जा सकता है।
• धारा 20(2) के तहत सूचना आयोग संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा कर सकता है।
• प्रत्येक गलत सूचना दंडनीय नहीं होती। दंड तभी लगाया जाता है जब यह सिद्ध हो कि सूचना जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण अथवा अभिलेखों के विपरीत दी गई है।
• रिकॉर्ड छिपाना, सूचना नष्ट करना या जानबूझकर गुमराह करना केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है।
• पारदर्शी शासन की सबसे बड़ी पहचान सही सूचना है, जबकि भ्रामक सूचना लोकतंत्र और विधि के शासन पर जनता के विश्वास को कमजोर करती है।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 भारतीय लोकतंत्र की उन ऐतिहासिक उपलब्धियों में से एक है जिसने शासन को जनता के प्रति अधिक पारदर्शी, उत्तरदायी और जवाबदेह बनाने का मार्ग प्रशस्त किया। यह अधिनियम केवल सूचना प्राप्त करने का कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आत्मा है। नागरिकों को सरकारी निर्णयों, सार्वजनिक धन के उपयोग, प्रशासनिक कार्यवाही तथा सार्वजनिक प्राधिकरणों के अभिलेखों तक वैधानिक पहुँच प्रदान करना इसका मूल उद्देश्य है। लोकतंत्र तभी सशक्त होता है जब सरकार के कार्य जनता की निगरानी के दायरे में हों और जनता को सही एवं प्रमाणिक जानकारी समय पर प्राप्त हो।
इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी लोक सूचना अधिकारी (Public Information Officer – PIO) होता है। उसकी जिम्मेदारी केवल सूचना भेज देना नहीं, बल्कि उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर सही, पूर्ण, प्रमाणिक और समयबद्ध सूचना उपलब्ध कराना है। यदि कोई अधिकारी जानबूझकर गलत, अपूर्ण अथवा भ्रामक सूचना देता है, रिकॉर्ड के विपरीत उत्तर देता है, सूचना छिपाता है या सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न करता है, तो वह केवल एक नागरिक के अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि सूचना के अधिकार अधिनियम की मूल भावना और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को भी आघात पहुँचाता है।
इसी उद्देश्य से अधिनियम की धारा 20 में दंडात्मक व्यवस्था की गई है। यदि केंद्रीय या राज्य सूचना आयोग यह पाता है कि लोक सूचना अधिकारी ने बिना उचित कारण सूचना देने से इनकार किया, निर्धारित समय सीमा में सूचना उपलब्ध नहीं कराई, जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना दी, सूचना नष्ट कर दी अथवा सूचना उपलब्ध कराने में बाधा उत्पन्न की, तो आयोग उस अधिकारी पर ₹250 प्रतिदिन की दर से अधिकतम ₹25,000 तक का आर्थिक दंड लगा सकता है। इसके अतिरिक्त, धारा 20(2) के अंतर्गत संबंधित अधिकारी के विरुद्ध विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई की अनुशंसा भी की जा सकती है।
हालाँकि, कानून का उद्देश्य प्रत्येक त्रुटि पर दंड देना नहीं है। न्याय का मूल सिद्धांत है कि दंड तभी लगाया जाए जब यह प्रमाणित हो कि अधिकारी ने दुर्भावना से कार्य किया, उपलब्ध अभिलेखों के विपरीत उत्तर दिया या जानबूझकर सत्य तथ्यों को छिपाया। इसलिए प्रत्येक मामले में सूचना आयोग तथ्यों, अभिलेखों और परिस्थितियों का स्वतंत्र परीक्षण करता है।
भारतीय न्यायपालिका ने भी सूचना के अधिकार को लोकतंत्र का महत्वपूर्ण आधार माना है। सर्वोच्च न्यायालय ने State of Uttar Pradesh v. Raj Narain (1975) में स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र में जनता को शासन के कार्यों की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार है, क्योंकि सरकार अंततः जनता के प्रति उत्तरदायी है। इसी प्रकार S.P. Gupta v. Union of India (1981) में न्यायालय ने कहा कि खुलापन (Openness) लोकतांत्रिक शासन का अनिवार्य तत्व है और गोपनीयता अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।
बाद में CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि सूचना का अधिकार अधिनियम का उद्देश्य पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाना है, किन्तु इसका प्रयोग इस प्रकार नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक व्यवस्था अनावश्यक रूप से बाधित हो जाए। यह निर्णय नागरिकों के अधिकार और प्रशासनिक दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
इसी प्रकार Manohar v. State of Maharashtra (2012) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सूचना आयोगों को अधिनियम के प्रावधानों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना चाहिए तथा जहाँ आवश्यक हो, वहाँ दंडात्मक प्रावधानों का उपयोग भी करना चाहिए। यह निर्णय इस सिद्धांत को बल देता है कि सूचना का अधिकार तभी प्रभावी होगा जब उसके उल्लंघन पर उत्तरदायित्व भी तय किया जाए।
आज अनेक मामलों में देखा जाता है कि सूचना मांगने वाले नागरिकों को गोलमोल, अधूरी या विषय से असंबंधित जानकारी देकर औपचारिकता पूरी कर दी जाती है। कई बार रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बावजूद "सूचना उपलब्ध नहीं है" कह दिया जाता है या ऐसे उत्तर दिए जाते हैं जिनसे वास्तविक तथ्य छिप जाएँ। ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल एक व्यक्ति के अधिकारों का हनन नहीं करतीं, बल्कि पूरे सूचना तंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। यदि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई नहीं होगी, तो सूचना का अधिकार अधिनियम केवल कागज़ी अधिकार बनकर रह जाएगा।
दूसरी ओर, नागरिकों को भी यह समझना होगा कि सूचना का अधिकार प्रतिशोध का माध्यम नहीं, बल्कि जनहित और पारदर्शिता का संवैधानिक साधन है। यदि उन्हें प्राप्त सूचना गलत या भ्रामक प्रतीत होती है, तो उन्हें अभिलेखों और प्रमाणों के आधार पर प्रथम अपील, द्वितीय अपील अथवा सूचना आयोग के समक्ष शिकायत प्रस्तुत करनी चाहिए। प्रमाण-आधारित आपत्ति ही न्यायिक और प्रशासनिक दृष्टि से अधिक प्रभावी होती है।
आज आवश्यकता केवल सूचना उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि सही सूचना उपलब्ध कराने की है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में शासन और जनता के बीच विश्वास का आधार सत्य, प्रमाणिक और पारदर्शी सूचना होती है। इसलिए ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोक सूचना अधिकारियों को संरक्षण और प्रोत्साहन मिलना चाहिए, जबकि जानबूझकर गलत या भ्रामक सूचना देने वालों के विरुद्ध सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 20 के प्रावधानों का निष्पक्ष, प्रभावी और समयबद्ध उपयोग सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यही सुशासन की पहचान, लोकतंत्र की मजबूती और विधि के शासन का वास्तविक सम्मान है।
अधिवक्ता डी.पी. जोशी
एल.एल.बी., एल.एल.एम. (क्रिमिनल लॉ)
मोबाइल नंबर : 9893354327








