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कानून नहीं, जागरूक समाज ही बचाएगा बचपन; पॉक्सो के बढ़ते मामलों के बीच संविधान, न्यायपालिका और समाज की साझा जिम्मेदारी - अधिवक्ता डी.पी. जोशी
It is an aware society, not just the law, that will safeguard childhood; amidst rising POCSO cases, the Constitution, the judiciary, and society share a collective responsibility – Advocate D.P. Joshi.
एक नज़र में
* बच्चों की सुरक्षा केवल कठोर कानूनों से नहीं, बल्कि जागरूक परिवार, उत्तरदायी समाज और संवेदनशील संस्थाओं से सुनिश्चित होगी।
* भारतीय संविधान, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) तथा पॉक्सो अधिनियम प्रत्येक बच्चे को गरिमा, सुरक्षा और भयमुक्त बचपन का अधिकार प्रदान करते हैं।
* सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पॉक्सो कानून का मूल उद्देश्य बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of the Child) की रक्षा करते हुए पीड़ित-अनुकूल न्याय व्यवस्था सुनिश्चित करना है।
* डिजिटल युग में साइबर ग्रूमिंग, ऑनलाइन शोषण और सोशल मीडिया बच्चों की सुरक्षा के लिए नई और गंभीर चुनौती बनकर उभरे हैं।
* परिवार, विद्यालय, समाज, मीडिया, पुलिस और न्यायपालिका की साझी जिम्मेदारी से ही सुरक्षित बचपन और सशक्त भारत का निर्माण संभव है।
देश में बालकों को लैंगिक अपराधों से संरक्षण अधिनियम (Protection of Children from Sexual Offences Act, 2012) अर्थात पॉक्सो कानून के अंतर्गत दर्ज मामलों की बढ़ती संख्या स्वाभाविक रूप से चिंता उत्पन्न करती है। किंतु इस वृद्धि को केवल अपराधों की बढ़ोतरी के रूप में देखना उचित नहीं होगा। इसका एक महत्वपूर्ण कारण यह भी है कि जिन घटनाओं पर कभी सामाजिक भय, पारिवारिक दबाव और बदनामी के कारण पर्दा डाल दिया जाता था, वे अब कानून और समाज की बढ़ती जागरूकता के कारण सामने आने लगी हैं। यह परिवर्तन इस दृष्टि से सकारात्मक है कि अब पीड़ितों को न्याय पाने का साहस मिल रहा है। फिर भी यह स्थिति हमें यह सोचने के लिए विवश करती है कि क्या केवल कठोर कानून बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकते हैं? उत्तर स्पष्ट है—नहीं।
भारत का संविधान बच्चों की गरिमा और सुरक्षा को सर्वोच्च संवैधानिक मूल्यों में स्थान देता है। अनुच्छेद 15(3) राज्य को बच्चों के हित में विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार प्रदान करता है, जिसकी न्यायिक व्याख्या में बच्चों की सुरक्षा, सम्मान और मानसिक विकास को भी शामिल किया गया है। अनुच्छेद 21ए शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करता है, जबकि अनुच्छेद 39(e) एवं 39(f) बच्चों के शोषण की रोकथाम और उनके स्वस्थ विकास का दायित्व राज्य पर डालते हैं। अनुच्छेद 45 तथा अनुच्छेद 51A(k) भी बच्चों के समुचित पालन-पोषण और शिक्षा के महत्व को रेखांकित करते हैं।
भारत संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार अभिसमय (UNCRC) का पक्षकार है। इसके अनुच्छेद 3 के अनुसार प्रत्येक निर्णय में बच्चे का सर्वोत्तम हित सर्वोपरि होगा। अनुच्छेद 19 बच्चों को सभी प्रकार की हिंसा और दुर्व्यवहार से सुरक्षा प्रदान करने तथा अनुच्छेद 34 उन्हें यौन शोषण से बचाने का दायित्व राज्यों पर निर्धारित करता है। इस प्रकार पॉक्सो अधिनियम केवल एक दंड कानून नहीं, बल्कि भारत की संवैधानिक और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं का प्रभावी क्रियान्वयन है।
सर्वोच्च न्यायालय ने Sakshi v. Union of India (2004) में बाल यौन शोषण के मामलों में पीड़ित-अनुकूल न्यायिक प्रक्रिया की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि न्यायालय स्वयं बच्चे के लिए मानसिक आघात का कारण न बने। Alakh Alok Srivastava v. Union of India (2018) में न्यायालय ने राज्यों को पॉक्सो मामलों की त्वरित जांच, शीघ्र सुनवाई तथा विशेष न्यायालयों की प्रभावी कार्यप्रणाली सुनिश्चित करने के निर्देश दिए। इन निर्णयों से स्पष्ट है कि बच्चों की गरिमा, गोपनीयता और मानसिक सुरक्षा न्याय प्रक्रिया का अभिन्न अंग हैं।
विभिन्न उच्च न्यायालयों ने भी यह प्रतिपादित किया है कि पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य बच्चों को अधिकतम संरक्षण प्रदान करना है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक मामले की निष्पक्ष, वैज्ञानिक और संवेदनशील जांच आवश्यक है। किसी भी शिकायत को हल्के में लेना उतना ही अनुचित है, जितना बिना विधिसम्मत प्रक्रिया के किसी व्यक्ति को दोषी मान लेना। न्याय का मूल सिद्धांत यही है कि पीड़ित को संरक्षण मिले और प्रत्येक आरोपी को निष्पक्ष सुनवाई का संवैधानिक अधिकार भी प्राप्त रहे।
आज बच्चों के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में डिजिटल संसार भी शामिल हो चुका है। स्मार्टफोन, सोशल मीडिया, ऑनलाइन गेमिंग और इंटरनेट ने अवसरों के साथ अनेक खतरे भी उत्पन्न किए हैं। साइबर ग्रूमिंग, फर्जी पहचान, ऑनलाइन ब्लैकमेल, अश्लील सामग्री तथा डिजिटल शोषण जैसी घटनाएँ तेजी से बढ़ रही हैं। इसलिए डिजिटल सुरक्षा अब केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि बाल संरक्षण की अनिवार्य आवश्यकता बन चुकी है।
किशोरावस्था जीवन का अत्यंत संवेदनशील दौर है। इस अवस्था में भावनात्मक परिवर्तन स्वाभाविक हैं, किंतु कानून बच्चों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है। इसलिए विद्यालयों और महाविद्यालयों में जीवन कौशल, लैंगिक संवेदनशीलता, साइबर सुरक्षा, सम्मानजनक व्यवहार और कानूनी साक्षरता पर नियमित प्रशिक्षण आवश्यक है। बच्चों को यह विश्वास दिलाया जाना चाहिए कि किसी भी अनुचित व्यवहार की सूचना देना साहस, आत्मसम्मान और आत्मरक्षा का परिचायक है।
परिवार इस पूरी व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। यदि माता-पिता बच्चों के साथ खुलकर संवाद करें, उनकी भावनाओं को समझें और ऐसा वातावरण निर्मित करें जहाँ बच्चा बिना भय के अपनी बात कह सके, तो अनेक संभावित अपराध प्रारंभिक स्तर पर ही रोके जा सकते हैं। केवल नियंत्रण पर्याप्त नहीं, बल्कि विश्वास, संवाद और सतत मार्गदर्शन ही वास्तविक सुरक्षा का आधार हैं।
समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि बच्चों की सुरक्षा केवल पुलिस, न्यायालय या सरकार का दायित्व नहीं है। शिक्षक, सामाजिक संगठन, धार्मिक संस्थाएँ, मीडिया, स्थानीय समुदाय और प्रत्येक नागरिक इस उत्तरदायित्व में समान भागीदार हैं। जन-जागरूकता अभियान, कानूनी साक्षरता, साइबर सुरक्षा प्रशिक्षण तथा विद्यालय आधारित बाल संरक्षण तंत्र को मजबूत करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
पॉक्सो जैसे संवेदनशील विषय पर समाज को संतुलित दृष्टिकोण अपनाना होगा। प्रत्येक शिकायत का गंभीरता, संवेदनशीलता और निष्पक्षता के साथ परीक्षण होना चाहिए। पीड़ित की गरिमा और गोपनीयता की रक्षा हो, वहीं विधिसम्मत प्रक्रिया और निष्पक्ष न्याय के सिद्धांतों का भी पूर्ण पालन हो। यही संवैधानिक शासन और न्याय व्यवस्था की पहचान है।
अंततः, किसी भी राष्ट्र का भविष्य उसके बच्चों के सुरक्षित वर्तमान में निहित होता है। पॉक्सो कानून की वास्तविक सफलता केवल दर्ज मामलों, दोषसिद्धि की दर या न्यायालयों के निर्णयों से नहीं मापी जाएगी, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि हम अपने बच्चों को कितना सुरक्षित, जागरूक, आत्मविश्वासी और सम्मानपूर्ण वातावरण उपलब्ध करा सके। संविधान, न्यायपालिका और अंतरराष्ट्रीय दायित्व हमें एक ही संदेश देते हैं—सुरक्षित बचपन कोई विकल्प नहीं, बल्कि प्रत्येक बच्चे का मौलिक अधिकार है। कानून आवश्यक है, परंतु उससे भी अधिक आवश्यक है एक जागरूक, संवेदनशील और उत्तरदायी समाज। जब समाज स्वयं बच्चों की सुरक्षा का प्रहरी बनेगा, तभी सुरक्षित बचपन और सशक्त भारत का सपना वास्तविकता में बदल सकेगा।
— अधिवक्ता डी.पी. जोशी
रायपुर (छत्तीसगढ़)
मो.: 9893354327






