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शुक्रवार, अगस्त 28, 2026

चाँद की बिंदी: भाई के प्रेम की अमर निशानी

चाँद की बिंदी: भाई के प्रेम की अमर निशानी; रक्षाबंधन पर आधारित लोककथा

बहुत पुराने समय की बात है। तब धरती पर रातें बहुत अँधेरी हुआ करती थीं। सूरज के अस्त होते ही चारों ओर अँधेरा छा जाता था। गाँवों के रास्ते सुनसान हो जाते और लोग अपने घरों में दुबक जाते। रात में दूर तक देख पाना कठिन था।

एक छोटे-से गाँव में गुड़िया नाम की एक चंचल लड़की रहती थी। उसका अपने बड़े भाई से बहुत गहरा लगाव था। दोनों एक-दूसरे के सबसे अच्छे साथी थे। रक्षाबंधन का त्योहार आया तो भाई ने गुड़िया से पूछा, “बहन, इस बार राखी पर तुम्हें क्या उपहार दूँ?”

गुड़िया ने कुछ देर सोचा और फिर आसमान की ओर देखते हुए बोली, “भैया, मुझे चाँद चाहिए।”

भाई हँस पड़ा। उसने कहा, “चाँद! वह तो आकाश में रहता है। उसे मैं तुम्हारे लिए कैसे ला सकता हूँ?”

गुड़िया ने तुरंत कहा, “आपने ही तो कहा है कि बहन की इच्छा पूरी करना भाई का धर्म है।”

भाई ने बहन की बात सुनी और मन ही मन निश्चय कर लिया कि वह उसके लिए चाँद अवश्य लाएगा।

उस समय चाँद सूर्य के पास रहता था। लोककथा कहती है कि वह सूर्य का चमकता हुआ साथी था। भाई ने अपनी बहन के प्रेम में सूर्य से चाँद माँगा। सूर्य ने जब भाई के स्नेह को देखा तो चाँद उसे दे दिया।

भाई चाँद को लेकर घर पहुँचा। गुड़िया की खुशी का ठिकाना न रहा। उसने चाँद को अपने माथे पर बिंदी की तरह सजा लिया। उस दिन से वह जहाँ जाती, उसके माथे पर चाँद चमकता रहता। गाँव के बच्चे उसे देखकर कहते, “गुड़िया के माथे पर तो आसमान का एक टुकड़ा है!”

गुड़िया अपने भाई के इस अनोखे उपहार को बहुत सँभालकर रखती थी।

एक दिन रक्षाबंधन के अवसर पर गुड़िया की माँ अपने मायके गईं। उन्होंने अपने भाई की कलाई पर राखी बाँधी। बातचीत और उत्सव में देर हो गई। जब वे वापस लौटने लगीं, तभी अचानक तेज आँधी चलने लगी। धूल के बादल उठे और रास्ता अँधेरे में डूब गया।

माँ रास्ते में ही रुक गईं। उन्हें आगे का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था।

इधर गुड़िया घर के बाहर अपनी माँ की प्रतीक्षा कर रही थी। जब बहुत देर हो गई तो उसे चिंता होने लगी। तभी उसे अपने चाँद की याद आई।

उसने चाँद को माथे से उतारा और उससे कहा, “मेरे प्यारे चाँद, मेरी माँ अँधेरे रास्ते में रुक गई हैं। तुम उनके पास जाओ और उन्हें घर का रास्ता दिखाओ।”

चाँद ने गुड़िया की बात मान ली। वह आकाश में ऊपर उठा और अपनी उजली रोशनी से रास्ते को चमका दिया। माँ को रास्ता दिखाई देने लगा और वे सुरक्षित घर लौट आईं।

माँ ने घर पहुँचकर गुड़िया को गले लगाया। फिर उसकी नजर बेटी के माथे पर गई। वहाँ चाँद की बिंदी नहीं थी।

माँ ने मुस्कुराकर पूछा, “बेटी, तुमने अपना सबसे प्यारा उपहार मेरे लिए दे दिया?”

गुड़िया ने कहा, “हाँ माँ। भैया ने मुझे चाँद दिया था, लेकिन उस चाँद से आपका रास्ता रोशन हो गया।”

माँ कुछ देर चुप रहीं। फिर उन्होंने कहा, “बेटी, तुमने आज बहुत सुंदर काम किया है। लेकिन सोचो, यदि तुम इस चाँद को हमेशा के लिए आकाश में छोड़ देतीं तो?”

गुड़िया ने आश्चर्य से पूछा, “तब क्या होता?”

माँ बोलीं, “तब केवल मेरा रास्ता ही नहीं, पूरी धरती रोशन हो जाती। पहाड़, नदियाँ, जंगल, गाँव और शहर—सबको रात में चाँदनी मिलती। तुम्हारे भैया का उपहार केवल तुम्हारी बिंदी नहीं रहता। वह पूरी दुनिया के लिए रोशनी बन जाता और तुम्हारे भाई का प्रेम सदा-सदा के लिए अमर हो जाता।”

गुड़िया ने आकाश की ओर देखा। उसने अपने भाई को याद किया और कुछ देर तक सोचती रही। फिर उसके चेहरे पर मुस्कान आ गई।

उसने कहा, “माँ, अगर भैया का प्यार पूरी धरती को रोशन कर सकता है, तो चाँद केवल मेरा क्यों रहे?”

गुड़िया ने चाँद से कहा, “आज से तुम मेरी बिंदी नहीं, पूरी धरती की बिंदी हो। आकाश में चले जाओ और सबको अपनी रोशनी दो।”

गुड़िया की बात सुनकर चाँद आकाश में और ऊपर चला गया। वह धरती के चारों ओर घूमने लगा। कभी वह पहाड़ों के ऊपर से गुजरता, कभी समुद्र पर अपनी चाँदनी बिखेरता और कभी गाँवों की छतों पर आकर झाँकता।

कहते हैं, तभी से चाँद धरती का चक्कर लगाने लगा। वह हर रात अपने उजाले से धरती को नहलाता है और लोगों को अँधेरे में राह दिखाता है।

रक्षाबंधन की रात जब चाँद आकाश में चमकता है, तो गाँव के बुजुर्ग बच्चों से कहते हैं, “देखो, आज गुड़िया की चाँद की बिंदी फिर से आकाश में सज गई है।”

गुड़िया ने अपने भाई का दिया हुआ उपहार अपने पास नहीं रखा। उसने उसे पूरी धरती को दे दिया। इसलिए आज भी चाँद को देखकर ऐसा लगता है जैसे वह एक भाई के प्रेम और एक बहन के त्याग की कहानी सुना रहा हो।

कहानी की सीख:
सच्चा प्रेम केवल अपने लिए खुशी पाने का नाम नहीं है। सच्चा प्रेम वह है, जिसमें हम अपनी सबसे प्यारी वस्तु भी दूसरों की खुशी और भलाई के लिए बाँट सकें।

चाँद की बिंदी आज भी आकाश में चमकती है—भाई के प्रेम की अमर निशानी बनकर। 🌙

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